पाँच साल हो गए है क्या तुम्हें दिल्ली की निर्भया याद है ?



निर्भया अर्थात जो भय से शून्य हो, जिसे किसी का भय न हो। वही निर्भया जब अपना वजूद बचाने के लिए लड़ती है और हार जाती है।  तेरह दिनों की जिल्लत और तकलीफ भरी जिंदगी से लड़ने के बाद वह इस दुनिया से रुख़्सत हो जाती है। आज पाँच साल गुजर गए उस निर्भया को गुजरे मगर उसकी कमी खलने नहीं दी इस समाज ने। आये दिन हमें रोजाना कई निर्भया से रूबरू करता यह है समाज।

 वो निर्भया केवल जिंदगी से नहीं हारी बल्कि इस समाज से भी हार गई। रोते रोते इस दुनिया से विदा लेने वाली वो निर्भया आज भी जब किसी को याद आती है तो उनकी आँखें नम कर देती है। मगर हमारा समाज हमें उस निर्भया को भूलने नहीं देता। रोजाना किसी न किसी निर्भया से मुलाकात जरूर करवा देता है।

आज जब दिल्ली के बहुचर्चित और सभी की रूह कँपा देने वाला सामूहिक बलात्कार काण्ड को पाँच साल से अधिक और उसकी पीड़िता की मौत को पाँच साल हो गए हैं तो पूरे देश में इसको लेकर चर्चा है। कहीं शोक सभा आयोजित की जा रही हैं तो कहीं महिला जागरूकता अभियान तो कहीं नारी सुरक्षा अभियान वगैरह वगैरह कई कार्यक्रम आयोजित किये जा रहे हैं। 

हर वर्ष इस मौके ऐसा ही माहौल होता है बल्कि यह प्रयास तो साल के बारहों महीने चलता रहता है। मगर मुद्दे की बात यह है कि इन सबका प्रभाव किस पर और कितना पड़ता है। निश्चित तौर पर यह विचार करने की बात है क्योंकि रोजाना बढ़ती छेड़छाड़ और बलात्कार की घटनाएँ इससे उलट दिशा में इशारा करती हैं। अगर आंकड़ों पर नजर डालें तो वह तो जैसे काट खाने को दौड़ते हैं। और फिर ये आंकड़ें तो सिर्फ वही हैं जिनकी रिपोर्ट दर्ज हुई है। असलियत तो और भयावह है।

ग्रामीण इलाकों में आज भी लोग छेड़छाड़ और बलात्कार के विरुद्ध रिपोर्ट लिखवाने से कतराते हैं और जो रिपोर्ट दर्ज भी कराने जाते हैं उसमें से कितनों को तो किसी राजनेता, बाहुबली या किसी राजनैतिक दल के दबाव में बिना रिपोर्ट दर्ज किए ही भगा दिया जाता है। अगर रिपोर्ट किसी तरह दर्ज भी हो जाती है तो जजों की कमीं की वजह से केस कितने सालों तक लंबित पड़ा रहता है। 

इन घटनाओं को रोकने के लिए कितनी ही कोशिश की जा रही हैं। सरकार इस कड़े कानून बना रही है फिर भी चिंताजनक स्थिति बनी हुई है। ढोंगी बाबाओं का ढोंग तो उस पर जले पर नमक की तरह मालूम होता है। धर्म और आस्था की आड़ में ये किस प्रकार मानवता को शर्मसार करते हैं।

 मानवीय मूल और मानवता क्या इतनी नीचे गिर गयी है कि एक मानव की हवस ही दूसरे मानव को नोंचने पर आमादा है। समाज में साँसें ले रहे कुछ हैवानों की जड़ पड़ चुकी चेतना नजाने कब जागेगी और इस कुकृत्य से हमारे समाज को मुक्ति मिलेगी।



By - गोपाल यादव

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