भारतीय राजनीति को रसातल से उबारने पर सेमिनार।



गांव जैसा कुछ..सारे किसान शहर गए हैं मजदूरी करने, रिक्शा चलाने..औरतें पानी लेने पांच किलोमीटर दूर सूखने को उतारू जोहड़ की ओर..बड़े बच्चे ताज़ा ताज़ा बने शौचालय नाम की कुठारिया में तीन पत्ती खेल रहे, तो थोड़ा और बड़े वाह पान मसाला चबा रहे..बूढ़े-बुढ़ियों का पता नहीं..शायद कहीं डांडिया खेल रहे हैं..

चौपाल के चबूतरे पर दो गधे, चार सुअर और आठ कुत्ते सभी शंकाओं का निवारण और सूखा गीला विसर्जन कर एक कागज को बीच में रख कुछ मगजमारी कर रहे है..सामने सूखे तालाब के किनारे इलाके का एक मात्र सीनियर सिटिज़न टाइप बैल अच्छे दिनों की इंतज़ार में बैठा है और गाय की ठठरी कसाई के आने की बाट जोह रही है..

रसातल के पेंदे को छू रही भारतीय राजनीति को लेकर चिंतित गांव के बचे खुचे इस बुद्धिजीवी वर्ग ने एक सेमिनार आयोजित किया है.. विषय है ‘राजनीति का डाल्फिनीकरण करने के उपाय’..गधों को डाल्फिनीकरण शब्द पर आपत्ति है..उनका कहना है कि जब हमें ही यह समझ में नहीं आ रहा तो राजनीति के चिकनबाजों, दारूबाजों, बटमारों, सेंधमारों और खालिस चार सौ बीसियों को हम क्या खाक समझा पाएंगे..

खैर, समझने-समझाने के लिये चिकने कागज पर बनी डाल्फिन की तस्वीरों की किताब लायी गयी.. तस्वीरों में उछाल मारती, मुंह खोलती, अठखेलियां करती डाल्फिन और उसको गाइड करती एक खूबसूरत युवती देख सुअरों की राय बनी कि क्यों न भारतीय राजनीति को इस युवती जैसा खूबसूरत बनाया जाये..उन्हें समझाना पड़ा कि मामला राजनीति को रसातल से उबारने का है, न कि उसे खूबसूरत बनाने का...

कुत्तों का कहना था कि देश की राजनीति में तभी सुधार आएगा जब संविधान के पन्नों का जूस निकाल कर शहद के साथ चाटा जाए..उनकी राय थी कि इस काम में बाबा बैराम देव की मदद ली जानी चाहिए..

तभी एक मुर्गे ने बांग दी कि क्यों न राजनीति को केंचुआ छाप बनाया जाये!.. अभी क्या कम है क्या, कुछ कौवों ने ठेका लगाया.... 

फिर एक सवाल यहां यह भी उठा कि केंचुए की विष्ठा ज्यादा लाभकारी होती है जबकि हमें सिखाया गया है कि खा जाओ और डकार भी मत लो..इस विरोधाभास के चलते केंचुआ हमारा क्या मार्गदर्शन कर पायेगा..

तभी वामपंथी सा लग रहा बैल रंभाया... मार्क्स ने कहा है कि क्रांति बंदूक की गोली से आती है... एक बार उसका भी इस्तेमाल क्यों न कर के देख लें.. इस पर सुअर, गधा और कुत्ते भड़क गए और बोले -पहली बात तो हमें क्रांति की जरूरत नहीं, वैसे तुम कहना क्या चाहते हो, जिनको हम सुधारने की बात कर रहे हैं वे इस ठांये-ठूं से डर जायेंगे-----भाईजान, उनके पास जेल तक में असलहों की कमी नहीं होती... 

तभी गाय की ठठरी कराही, अरे भाई.. इस तरह तो हम अपनी मंजिल तक ही नहीं पहुंच पायेंगे और भारतीय राजनीति रसातल में नाक तक धंस चुकी होगी.. ऐसा करते हैं कि आज गुजरात में मतदान है..वहां हालात का जायज़ा लेते हैं...तो गधे बोले..वहां कुछ नहीं हो सकता..EVM का कमाल देखो.....पंद्रह दिन बाद फिर मिलते हैं..

सबने ताली बजा कर सेमिनार के सफल समापन का स्वागत किया.. उसके बाद सब ‘चुनावी राजनीति के 58 साल और हमारे इरादे’ विषयक गोष्ठी में हाजिरी बजाने निकल लिए. 

By - राजीव मित्तल
 ( दुनिया की ऐसी-तैसी करने आया पत्रकार )

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