अरुणाचलम मुरुगनाथम : मर्द जिसने औरत को अपने औरतपने की गरिमा के साथ जीना सिखाया।




कोयम्बटूर, तमिलनाडु के एक स्कूल ड्रॉपआउट अरुणाचलम मुरुगनाथम का विवाह हो गया था। नाम था उसकी बीवी का शांति। अरुणाचलम मुरुगनाथम की जिंदगी एक आम दंपति की तरह आगे बढ़ रही थी। इसी बीच एक दिन उन्होंने अपनी बीवी शांति को माहवारी के दौरान अनहैजेनिक तरीके से उससे निपटते हुए देखा। उन्होंने अपनी बीवी को ऐसा करने से रोका तो जवाब आया कि तुम्हारा इससे कोई सरोकार नही है।

शांति ने कहा कि उसे पता है कि ये असुरक्षित है और सैनिटरी नैपकिन का प्रयोग करना चाहिए। मगर यदि वो और  उसकी बहनें अपने मायके में सैनिटरी नैपकिन का उपयोग करती तो उन्हें अपने मिल्क बजट में कटौती करनी पड़ती मने इनकी कीमत इतनी है कि जो आम महिलाओं की जद से बाहर है।

नवोन्मेषी प्रकृति के मुरुगनाथम साहब ने इसी 'अफोर्डबिलिटी' को पूरा करने के लिए ख़ुद से इसे बनाने का निश्चय किया। बाज़ार से सैनिटरी नैपकिन बनाने वाली मशीनों का पता करवाया तो उनके दाम सुन के इनके होश फ़ाख्ता हो गए। इसी उधेड़बुन में उन्हें ये ख्याल आया कि क्यों न सस्ते नैपकिन बनाने की जगह सस्ती नैपकिन बनाने वाली मशीन ही बना दी जाएं।
 
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फ़िर क्या था! युद्ध स्तर पर जुट गए मशीन बनाने में और कुछेक समय मे उन्होंने सस्ती मशीन बना भी डाली।  मुरुगनाथम साहब ने अपने एक इंटरव्यू में बताया कि प्रोडक्ट का आउटपुट होने के बाद उसकी टेस्टिंग में भी उन्हें अपार समस्या का सामना करना पड़ा, उनकी खुद की पत्नी ने उन्हें तलाक़ का नोटिस भिजवा दिया। वो तो अपने को ही 'फर्स्ट पैडमैन ऑन द ग्लोब' कहते है। ख़ैर! परीक्षणों में उनकी बनाई गई सैनिटरी नैपकिन एकदम खरी उतरी।

अब ऐसे अविष्कार के बाद लोगबाग 'भारतीय पेटेंट कार्यालय' पहुँचकर अपने ईजाद किये गए अविष्कार के लिए  पेटेंट का आवेदन करते है मगर वो ख़ालिस उद्यमी प्रकृति के व्यक्ति होते। इन सबसे अलहदा  मुरुगनाथम साहब तो सामाजिक उद्यमी थे। उन्होंने इसका पेटेंट न लेते हुए इसे ओपन सॉफ्टवेयर की तरह सबको समर्पित कर दिया।

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मुरुगनाथम  ने इस मशीन से औरत के स्वाभिमान की रक्षा तो को ही, अपनी इस खोज के द्वारा उसे आय का जरिया भी मुहैया कराया। अपनी इस मशीन को वो सिर्फ़ औरत की शुचिता के लिए काम कर रही एनजीओ को देते है, चूँकि ग्रामीण इलाकों में पैड का उपयोग करने वाली महिलाओं का आकंड़ा दहाई प्रतिशत में भी नही है , इसलिए वो ग्रामीण इलाकों में महिलाओं के स्वयं सहायता समूह को भी ये मशीने उपलब्ध कराते है।


By- संकर्षण शुक्ला



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