एक वो और एक ये 27 जनवरी।

By - अमित मंडलोई

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सुबह से इसी उधेड़बुन में हूं। सोचता हूं कि वह 27 जनवरी कैसी रही होगी। संविधान लागू होने के ठीक एक दिन बाद वाली। अपने कायदे-कानून वाली हमारी धरती पर सूरज की पहली किरण पड़ी होगी तो उसने क्या सोचा होगा। सुबह आंख खोलने वाले लोग क्या सपना लेकर जागे होंगे। उस वक्त किस तरह के बदलावों की उम्मीद उनके जेहन में अंगड़ाई ले रही होगी। वे बाजारों में अपने काम-धंधों पर निकले होंगे तो उनकी चाल कैसी रही होगी। यदि उन्हें इस वक्त में बुलाकर पूछा जाए तो वे क्या वे अपने सपनों, उम्मीदों और उस आत्मविश्वास को कोई जवाब देने की स्थिति में होंगे? 

उस दौर में झांककर देखने की कोशिश करता हूं तो लगता है जैसे 27 जनवरी को सडक़ों पर निकला हर आदमी अपने हाथ में एक लाठी महसूस कर रहा होगा। अपने कांधों पर एक हाथ उसका हौसला बढ़ा रहा होगा। एक टोपी होगी सिर पर जो भरोसा दे रही होगी। यही कि तू अकेला नहीं है, तेरे साथ इस देश का कानून है। जो तेरे हाथ की ताकत बढ़ाएगा, तेरे कांधों को मजबूत करेगा और तेरे सिर पर भरोसे की छत्रछाया बनकर हमेशा तेरे साथ रहेगा। कभी तेरे कदम न डगमगाएं, तेरा हौसला कमजोर न पड़े, तू तो बस आगे बढ़ता जा। इस जमीं के लिए जो ख्वाब तेरी आंखों में झिलमिला रहे हैं, उन्हें पूरा करने का वक्त आ गया है। 

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लोगों ने इस भरोसे को किस दीवानगी के साथ लिया होगा, अंदाजा लगाना थोड़ा मुश्किल है। असमानताओं से घिरे, उन्हीं के बीच पले-बढ़े हजारों-लाखों लोगों के हाथ में उस दिन कितनी ताकत आ गई होगी। उनके स्नायु उस आत्मविश्वास को पता नहीं कैसे संभाल पाए होंगे। सिंहासन खाली करो कि जनता आती है के भावों ने कैसे रग-रग में तूफान भर दिया होगा कि आ जा ऐ जमाने अब तुझे हम दिखाते हैं कि हिंदुस्तान क्या चीज है। जमीन पर नहीं पड़ रहे होंगे उनके कदम। आसमानों से बात कर रहे होंगे उनके हौसले। लग रहा होगा कि बस जो होना था वह हो चुका, बीत गई सो बात गई। अब एक नया दिन है, नया सवेरा है, नई शुरुआत है। 

और उसके बाद कुछ और 27 जनवरियां भी आई होंगी। हर बार वह इस दिन अपने हौसले की तलवारें भांजता होगा। हर बार अपने खून से निकलती भांप में बदलाव का बड़ा सपना देखता होगा। उसे साकार करने के लिए पसीने की नदियां बहाता ही होगा। बीच का वक्त कैसे गुजरा, क्या हुआ, समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है। जब उसके हाथ से कानून की लाठी छीनकर सियासी रसूख के नीचे दबाई गई होगी, कांधे से हाथ हटाकर उन्हें किसी तमाशे में तालियां बजाने भेजा गया होगा। सिर के साए से किसी की धूप मिटाई गई होगी। उस रोज उसने अपने आपको फिर किसी चौराहे पर खड़ा पाया होगा। एक के बाद एक दिलासे टूटते गए तो उम्मीदों का किरच-किरच होना स्वाभाविक ही होगा। 

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इसके बाद की हर 27 जनवरी सवाल छोडऩे लगी होगी। उम्मीदों के चरागों को रोशन के लिए हौसलों के दीया-बाती भरोसे का तेल मांगने लगे होंगे। हर बार लाल किले की प्राचीर से नई घोषणाएं, नए सपनें बांटे जाते, जो बूंदी के लड्डू की तरह थोड़े से ही दबाव में बिखरने लगे। तब वह इस महानाट्य का तमाशबीन बनकर रह गया, जिसमें उसने खुद यह जोड़ दिया कि यह घटना विशुद्ध रूप से कल्पना की उपज है, इसके सभी पात्र कपोल कल्पित हैं, कुछ लोगों को छोडक़र इनका किसी और से कोई वास्ता नहीं है। उस दिन उसे अहसास हुआ होगा कि काश स्टार लगाकर छोटे अक्षरों में शर्तें लागू लिखने का क्रम उस वक्त भी जारी होता तो वह जरूर उस किताब पर लिख आता, जो उस 26 जनवरी को सौंपी गई थी। 

गणतंत्र दिवस के बारे में पढ़ाते हुए किसी शिक्षक ने कहा था कि 15 अगस्त को तो सिर्फ अंग्रेजों की विदाई हुई थी। असली आजादी तो 26 जनवरी को मिली थी, क्योंकि उस दिन हमने अपने कानून लागू किए थे। सही मायने में हम स्वाधीन हुए थे। मन करता है कि वक्त का पहिया फिर उल्टा घूमा दूं और उन फिर उस क्लास में बैठकर शिक्षक को वही पाठ पढ़ाने को कहूं। मैं निश्चिंत हूं, अपनी ही ये पंक्तियां दोहराते वक्त उनके होंठ जरूर कांपेंगे। 

एक वो 27 जनवरी थी और एक ये 27 जनवरी है। हाथ, पैर और सिर तो हैं, लेकिन उनके साथ जगाया गया वह भरोसा नहीं है... कहीं नहीं है।

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