कविता : बदलाव - Ankita Shahi





चलो करते हैं कुछ बातें
अंदाज ए बयां तो फिर भी वही होगा..

यही तो किस्सा है पुराना कि कैलेंडर बदला है बस
तुम कहते हो साल बदला है

चलो मान लिया बदल गया है
लेकिन

कहाँ बदला है लोगों का यूँ ही चले जाना
नहीं बदला है किसी को किसी का यूँ ही भा जाना

बिल्कुल भी नहीं बदला है
नेताओं के भाषण करने का तरीक़ा

कहाँ बदला है अभी आपस मे लड़ना और भिड़ना धर्म के नाम पर

देखा कहा था मैंने बस कैलेंडर बदला है
कल भी आया था वो भिखारी जिसे कुछ देकर हम 

दानी बन जाते हैं..
उसका नए साल का जश्न मनाना नहीं बदला

और हमारी दानी महसूस होने वाली अहम
 देख लो दीवार पर एक बार फिर से कैलेंडर बदला है बस

कहाँ बदली है भावनाएं हमारी
नफ़रत और बड़ा हुआ 

कहाँ बदल दिया है उसे प्रेम से
ठंड की ठिठुरन अब भी फुटपाथ पर सोये लोगों के लिए वैसी ही है

नए साल की गर्माहट कहाँ महसूस हो रही है
तुम्हें लगता है कुछ बदला है?
खुद बदले हो?

नहीं है बदलने जैसा कुछ भी
ओह तो फिर मान लो बस कैलेंडर ही बदला है

कैलेंडर हर बार बदलता है
जैसे सरकारें बदलती हैं

और जनता का जीवन नहीं बदलता
कुछ ऐसा ही होता है ये कैलेंडर भी

एक बार आ जाये तो जम जाता है कुर्सी पर
उसे फर्क नही पड़ता तुम्हारी नाराज़गी से
नीयत समय पर ही निकलेगा

और तुम ठगे रह जाओगे ठीक वैसे जैसे वोट करने के बाद होते हो...

 अब भी उन खुरदुरी आंखों में चमक नहीं आयी है
जैसे धुंध को चीरते हुए सूरज निकलता है

कहाँ जीने की चाह आयी है
बिस्तर पर पड़े उस रुग्ण इंसान में

बच्चे कहाँ मासूमियत ला रहे मिट्टी में खेलने वाली
बोलो अभी कैलेंडर के जगह भी कुछ बदला है

 कहते हो नए हैं हम
और हुए जा रहे हो अधुनादिम..

लौट रहे हो प्राग की ओर
और तुम्हें लगता है बदल रहे हो

 बदली बस वो दीवार है जिसपर
लटकी हुई थी पिछली कैलैंडर!






By- अंकिता शाही

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