गांधी, विनोबा, जनेऊ और सनातन।




दुनिया भर के सुविज्ञ लोगों के बीच यदि आज भी कोई सर्वेक्षण करके पूछे कि बीसवीं सदी का सबसे महान ‘हिन्दू’ कौन हुआ, तो निर्विवाद रूप से लोग महात्मा गांधी का ही नाम बताएंगे।

वहीं स्वातंत्र्योत्तर भारत में वेद, उपनिषद् और गीता की सबसे सुंदर व्याख्या करनेवाले सर्वस्वीकार्य शख्स को चुनने की नौबत आए, तो वह निर्विवाद रूप से विनोबा ही होंगे। तभी उन्हें भारत की ऋषि परंपरा का संवाहक माना गया।

लेकिन क्या आपने इन दोनों में से किसी को भी जनेऊ पहने देखा है? नहीं न? जबकि गांधी गुजरात में जिस समुदाय से आते थे उसमें भी जनेऊ का प्रचलन था, और विनोबा के समुदाय में तो खैर था ही।

इसलिए कहना चाहिए कि ‘राजनीतिक हिन्दूवाद’ हिन्दू धर्म का सबसे निकृष्ट, संकीर्ण और आत्मघाती स्वरूप है। और इसका इलाज भारत की सनातन परंपरा के विराट और उदार स्वरूप में ही छिपा हुआ है। जितना समझ पा रहा हूँ, उससे लगता है कि मौजूदा दौर में सामाजिक स्तर पर भी ‘पुरोहितवाद’ से निपटने का सबसे व्यावहारिक और कारगर उपकरण न तो ‘वामपंथ’ के पास है, और न ‘प्रतिक्रियावादी नवबौद्धों’ के पास।

नई पीढ़ियों के एक बड़े हिस्से में भारत के असली अध्यात्म और इतिहास के प्रति जिज्ञासा तो है, लेकिन सप्लाई साइड में या तो ‘एकांगी वामपंथी इतिहास’ है, जिसके अपने वाजिब ‘हिन्दुत्व-विरोध’ को भी आसानी से हिन्दूमात्र का विरोधी और ‘राष्ट्र-विरोधी’ इत्यादि ठहराकर नवपीढ़ियों को आसानी से बरगलाया जा सकता है। या फिर नवबौद्धों और ओबीसीवादियों (फॉरवर्ड प्रेस) का अस्मितावादी इतिहास। 

इसलिए भारत की सनातन परंपरा में छिपे देशी ‘सेकुलरवाद’ को पकड़ने की कोशिश कीजिए। बुद्ध को ‘एस धम्मो सनातनो’ कहने में कोई समस्या नहीं थी, तो फिर हमें कोई ‘गिल्ट’ या आत्महीनता क्यों महसूस हो! सनातन कहीं से भी बहुसंख्यकवादी नहीं है।

वह न तो एकीकरण (Integration) और आत्मसातीकरण (Assimilation) के चक्कर में पड़ता है, और न अस्मितावाद (Identity Politics) के चक्कर में। जाति-व्यवस्था, अंधविश्वासों और कर्मकांडों का परिष्कार और यहाँ तक कि सफाया करने की व्यावहारिक क्षमता भी फिलहाल उसी में है।

दरअसल, राजनीतिक हिन्दूवादियों को ही सभी हिन्दुओं का ठेकेदार बना देने का काम जाने-अनजाने आपने ही किया है। सनातन इन सांप्रदायिक धर्मपंथों से ऊपर की चीज है। वह सर्वसमावेशी होते हुए भी विविधतामूलक, अंतर्विरोधों को स्वीकारनेवाला और निरंतर प्रवाहमान है। 

उसके साथ अच्छा यह है कि वह केवल उदारता, व्यापकता और अहिंसक संवाद की शर्त पर ही संशोध्य है और वह भी अगले संशोधन की गुंजाइश के साथ। संकीर्ण ‘राजनीतिक हिन्दुत्व’ से मिलते-जुलते न जाने कितने कचरे इसमें पहले भी आए और इसके प्रवाह में समाकर विलीन हो गए। सनातन का निंजा वायरस ही संकीर्ण ‘हिन्दुत्व’ रूपी बैक्टीरिया को खाएगा और गंगाजल को पवित्र रखेगा। 

दुर्भाग्य से हमारी विशाल आबादी अभी भी धर्म को जिस रूप में समझ रही है, उसे आप अपने कोरे भौतिकतावादी (Materialistic) और तर्कणावादी (Rationalistic) दलीलों और संवैधानिक प्रावधानों से संतुष्ट और संस्कारित नहीं कर पाएंगे। लॉन्ग टर्म में शायद यह सफल हो भी जाए, लेकिन शॉर्ट टर्म में यह उल्टा असर ही पैदा करेगा। 

मान सकते हैं कि राजनीतिक दलों या राजनीतिक आंदोलनों और बाज़ार-व्यवस्था से इसकी आशा करना बेकार है। लेकिन हमारे स्वतंत्रचेता या फ्री-थिंकिंग बौद्धिकों को क्या हुआ है? वे अपनी इस ग्रंथि से कब उबरेंगे कि इस तरह का प्रयास अनिवार्य रूप से ‘हिन्दू पुनरुत्थानवाद’ जैसा ही हो जाएगा? क्या भारत और दुनिया के अन्य धर्मपंथों के बारे में भी यह उतना ही सच नहीं है?

बहरहाल, विषयांतर तो हो ही चुका है। बैठे थे गांधी और जनेऊ की बात करने और पहुँच गए सनातन पर। लेकिन थोड़ा सहानुभूतिपूर्वक देखिए, तो अपने हिन्दूपन, वर्णवादी और जातिवादी इमेज की कीमत पर भी गांधी अपने इस प्रोजेक्ट पर लगे रहे। यानी लोहा जब तक पूरी तरह गरम न हो, तब तक हथौड़ा मारना समझदारी नहीं है। इसका अंदाजा आपको समय-समय पर बदलते जाते गांधी के जनेऊ संबंधी विचारों से हो जाएगा।

गांधी के बाद विनोबा ने उस प्रोजेक्ट को बखूबी आगे बढ़ाया था। ‘हिंसया दूयते चित्तं तेन हिन्दुरितीरित:’ के रूप में हिन्दू धर्म की उनकी उदार परिभाषा सनातन के घनघोर मंथन से ही निकली थी। लेकिन विनोबा के बाद एक भयंकर खालीपन या वैक्यूम पैदा हुआ।

यह कोई संयोग नहीं है कि वर्धा वाले विनोबा मरे और नागपुर वाले निहायत ही संकीर्ण और आत्मघाती ‘हिन्दुत्व’ ने अपना जाल पूरे देश में फैला लिया। इसलिए विनोबा को हिन्दूवादी गोरक्षक के रूप में हड़पनेवालों या ‘अनुशासन-पर्व’ के नाम पर डिस्क्रेडिट करनेवालों दोनों की ठीक से पहचान कीजिए, तो मामला समझ में आ जाएगा।


By - Avyakta





Note: post is taken from Avyakta Sir's facebook wall with his permission.

Comments