खुशी है मी लार्ड कि जनता की अदालत अभी जिंदा है



सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठतम जजों द्वारा मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ मोर्चा खोलने से एक भरोसा फिर जिंदा हो गया कि देश में अब भी जनता की अदालत नाम की कोई चीज बाकी है। सर्वोच्च न्यायालय का वरिष्ठतम जज भी जब सब जगह गुहार लगाकर थक जाता है तो वह इसी अदालत का दरवाजा खटखटाता है। उम्मीद करता है कि आंखों पर पट्टी बांधकर बैठी न्याय की देवी के आगे मसनद लगाए मुख्य न्यायाधीश जिस समस्या का निराकरण नहीं कर रहे हैं, उसे जनता जर्नादन जड़ से ही खत्म करने की ताकत रखती है। 

वैसे इस मसले को लेकर कई पक्ष सामने आए हैं। अधिकतर वकील और जज इस कदम को ऐतिहासिक शर्म का विषय बता रहे हैं। उन्हें लगता है कि सुप्रीम कोर्ट में 23 जज और हैं। सिर्फ 4 ने ये सवाल उठाया है। बाकी लोगों को अगर कोई परेशानी नहीं है तो आखिर इन्हें क्या दिक्कत हो रही है। अगर जज इस तरह से सडक़ पर उतर आएंगे तो न्यायपालिका खतरे में पड़ जाएगी। उसका गौरव धूमिल हो जाएगा। हर कोई अदालत के फैसलों पर अंगुलियां उठाने लगेगा। जज से बहुत ही उच्च कोटी की मर्यादा अपेक्षित होती है। वे ही यदि राजनेता या यूनियन लीडर की तरह व्यवहार करेंगे तो कैसे चलेगा। 



ऐसा सोचने वालों से मैं एक सवाल करना चाहता हूं कि आप क्या चाहते हैं। कोर्ट में कुछ भी काला-पीला होता रहे और सब दिल पर पत्थर रखकर सहते रहें। साहिबे आलम न्याय की देवी को अपने रिमोट पर चलाते रहें, फिर भी सब खामोश रहें। सिर्फ इसलिए कि अदालत की चहारदीवारी के सम्मान को ठेस न पहुंचे, फिर चाहे न्याय की हत्या ही क्यों न कर दी जाए। कोई सवाल न खड़ा करे, आपत्ति न जताए। जो हो रहा है, वैसा होने दें। इस खामोशी की कितनी बड़ी कीमत चुकाना पड़ सकती है इसका जरा भी अंदाजा है क्या आपको। 

माफ कीजिएगा हुजूर सर्वोच्च न्यायालय का जज भी अगर अन्याय और अव्यवस्था सहने को अभिशप्त छोड़ दिया जाएगा तो फिर देश में न्याय की उम्मीद किससे की जाएगी। बाकी 23 जज अगर आवाज नहीं उठा रहे हैं या इस व्यवस्था से सहमत हैं तो इसका मतलब यह नहीं है कि बाकी के जज भी खामोश रहें। गांधी जी के पहले कई लोगों को अंग्रेजों ने फर्स्ट क्लास के डिब्बे से बेदखल किया होगा, तो क्या उन्हें भी इसे नियती मानकर चुप बैठ जाना चाहिए था। 

समझना मुश्किल है कि आवाज उठाने से ये लोग इतना डरते क्यों हैं। क्यों इनके सिंहासन डोल उठते हैं, उसमें लगीं पुतलियां घबराकर भाग खड़ी होती हैं। क्या सिर्फ इसलिए कि अगर सब आवाज उठाना सीख गए तो फिर बंद दरवाजों में चल रहा खेल कैसे जारी रखेंगे। मर्यादा की आड़ में न्याय का गला घोटने की कोशिशों को कैसे अंजाम दिया जाएगा। अगर सच में कुछ नहीं था तो फिर मामलों के बंटवारे में हो रहा बंदरबाट क्या सिर्फ इन चार जजों की कल्पना से उपजा है, उनका भ्रम मात्र है। 



यह भी मान लिया कि तीन जज इसी वर्ष सेवानिवृत्त होने वाले हैं और उनके आवाज उठाने से उनके करियर पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा, लेकिन जस्टिस रंजन गोगोई को तो अभी वक्त है। वे तो मुख्य न्यायाधिपति की कुर्सी पर विराज सकते हैं, फिर उन्हें क्या जरूरत आन पड़ी थी जो वे इस पचड़े में पैर फंसाते। लेकिन सच वह है जो जस्टिस चेलामेेश्वर ने कहा है कि हम नहीं चाहते कि 20 वर्ष बाद कोई कहे कि हमने अपनी आत्मा को बेच दिया था। अगर जज अपनी आत्मा ही बेच देंगे तो फिर देश में न कानून का राज रहेगा और न कानून रहेगा। लोकतंत्र का देवता, न्याय की देवी के समीप कहीं फांसी पर लटका नजर आएगा। 

इसलिए मुझे लगता है कि आवाज उठाकर इन जजों ने देश के लोकतंत्र का भरोसा लौटाया है। दिलासा दिया है कि लोकतंत्र की रक्तवाहिनियों में अब भी लावा बहता है। सारे अत्याचार और अन्याय के जवाब में देश की जनता खड़ी है और वह हमेशा न्याय के पक्ष में होगी। एक वह ही है जो सबको मुंह तोड़ जवाब दे सकती है। 

लोकतंत्र में आस्था का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है। जनता अपनी कॉलर ऊंची कर सकती है और उसके तत्क्षण बाद उस पर जमा मैल भी देख सकती है। सोच सकती है कि आखिर ये कितनी बड़ी जिम्मेदारी है और वह कितनी मुस्तैदी से इसे निभा रही है। 



By - अमित मंडलोई

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