एक "अनपढ़" जिसे पढता है सारा देश।

By - सीमांत कश्यप
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पाेथी पढ़-पढ़ जग मुआ अब आप समझ तो गए होंगे की किसके बारे में बात हो रही हैं.और इनकी बात करना आज जरुरी इसलिए है क्यूंकि हम कहीं न कहीं ये भूल चुके हैं की हम अनपढ़ो से बात नहीं करते आज पढ़े लिखे लोग आपस में बात कर रहे है.और अनपढ़ लोग आपस में बात कर रहे.और जब तक ये दोनों एक दूसरे से बात नहीं करेंगे तब तक कोई क्रांति नहीं आ सकती कभी आपका कोई सामाजिक बदलाव नहीं हो सकता और "कबीर" एक ऐसे कवी थे जिन्होंने अनपढ़ों के लिए लिखा जिन्हे कोई उम्मीद और ख्वाहिशात नहीं थी की उनकी बड़ाई हो.और देखा जाये तो कबीर एक अनपढ़ आदमी थे और वो फॉर्मल एजुकेशन के बिलकुल खिलाफ थे उन्होंने हमेशा उस ज़माने के औपचारिक शिक्षा का विरोध किया था.और उसी कबीर को आज हम एम.ए.हिन्दी में पीएचडी में पढ़ते आ रहे हैं ये हमारे लिए शर्मिंदगी की बात है और ये उनका विरोध ही था की उन्होंने कह दिया की 

"पोथी पढ़ी पढ़ी जग मुआ,पंडित भया न कोयढाई आखर प्रेम का,पढ़े सो पंडित होय"

हरकते पढ़े लिखों की,दोष अनपढ़ों पर डाला जाता है 

हम लोग आज कहीं न कहीं भूलते जा रहे हैं.अगर आप तारीख के पन्ने पलटकर देख लो पुराना इतिहास खंगाल कर देख लो.तो इस संसार में जितनी तबाही पढ़े लिखो ने मचाई है उतनी अनपढ़ों ने नहीं लायी है चाहे आपका वो विश्व युद्ध प्रथम हो या दूसरा हो चाहे सिरिया,गाजा हो जाये यहाँ तक की ओसामा बिन लादेन भी इंजिनियर था.अनपढ़ों ने कोई ख़राब काम नहीं किया है इस संसार में.ये सब पढ़े लिखों की हरकते थी.और हमने दोष डाल दिया अनपढ़ों पर और हमें अपने पढ़े लिखे होने का घमंड भी होता है.अरे यार इन अनपढ़ो के मुँह क्या लगे.मगर आप गौर करे और किसी देश की सामाजिक क्रांति पर नजर डाले तो आपको पता चलेगा की बदलाव वोही लोग ला सकते हैं जो पढ़े लिखे नहीं है.क्यूंकि जो पढ़ा लिखा है वो अहंकारी हो चुका है उसे लग रहा है की वो सहीं है.और आप उसे बदलने को कहोगे तो वो आपसे बहस पे उतर जायेगा।

जिसके बातो में विवेक है वो ही सबसे अमीर आदमी है ये आपको कबीर के दोहे में मिलेंगे जैसे की 

"जा घट प्रेम न संचरै, सो घट जान मसान।जैसे खाल लोहार की,साँस लेत बिनु प्रान"

जिस जीव के हॄदय में प्रेम नहीं होता,वह श्मशान के समान सूना, भयावह और मॄत प्रायः होता है। ऐसे प्राणी में प्राण तत्व का पाया जाना उसके जीवित होने का प्रमाण है। लोहार की खाल में जो चमड़ी होती है वह मॄत पशु की होती है फिर भी वह साँस लेती है।
अगर पिछले 700  साल 600  सालों से पढ़ रहें है कबीर को तो मेरी नज़र में इनसे बड़ा वायरल कवी कोई नहीं है| 

कबीर आज होते तो राष्ट्रविरोधी करार दे दिए जाते 

अगर आज कबीर होते तो कबके राष्ट्र विरोधी करार दे दिया गया होता उनको हमने उसे पकिस्तान जाने को कह दिया होता बाते ही ऐसी थी उनकी 

"ब्राहमन से गदहा भला,आन देब ते कुत्तामुलना से मुर्गा भला, सहर जगाबे सुत्ता"

मुर्ख ब्राम्हण से गदहा अच्छा है जो परिश्रम से घास चरता है। पत्थर  के देवता से कुत्ता अच्छा है जो घर का पहरा देकर रक्षा करता है। एक मौलवी से मुर्गा अच्छा है जो सोये शहर को जगाता है। और ये बात 15 शताब्दी में कही गयी है.

कबीर का "दास" स्टाइल था तो "संत" लगा कर राजनीति की गयी।

कबीर जुलाहा कोरी परिवार से हैं.आज हम उनके नाम के आगे दास पढ़ते है जिससे स्पष्ट है कि कबीर कोरी परिवार में जन्मे थे."दास" उस समय कबीर ने स्टाइल बना लिया था आज उनके नाम के पहले "संत" लगे होने की राजनिती हमें समझनी होगी। सदियों हिंदी साहित्य से दूर रखा गया ताकि लोग यह वास्तविकता न जान लें कि कबीर के समय में और उससे पहले भी भारत में धर्म की एक समृद्ध परंपरा थी जो हिंदू परंपरा से अलग थी और कि भारत के सनातन धर्म जैन और बौध धर्म हैं. कबीरधर्म, ईसाईधर्म तथा इस्लामधर्म के मूल में बौधधर्म का मानवीय दृष्टिकोण रचा-बसा है. यह आधुनिक शोध से प्रमाणित हो चुका है. उसी धर्म की व्यापकता का ही प्रभाव है कि इस्लाम की पृष्ठभूमि के बावजूद कबीर भारत के मूलनिवासियों के हृदय में ठीक वैसे बस चुके हैं जैसे बुद्ध.आपको और हमको सबसे पहले जानना होगा की हमें बदलना क्या है.हमें हर चीज़ बदली है.लेकिन क्यों बदलनी है.हम जड़ तक नहीं जाते हम गरीबी की बात करते है लेकिन तह तक नहीं जाते वैश्यावृति की बात करते है पर तह तक नहीं जाते। हमें बदलाव लाना होगा।

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