ये इतिहास जरूर बदलना चाहिए।

By - अमित मंडलोई


यह पहला मौका है जब हमने किसी फिल्म का लिंग परिवर्तन कराया है। इसकी वजह सिर्फ यह आशंका है कि इसमें महान रानी पदमावती के गौरवशाली इतिहास से छेड़छाड़ की गई है। विशेषज्ञों की टीम और सेंसर बोर्ड के सदस्य फिल्म देख चुके हैं और अब सुप्रीम कोर्ट ने उन राज्यों में भी फिल्म के प्रदर्शन को हरी झंडी दे दी है, जिन्होंने इस पर पाबंदी लगाई थी। फिल्म में इतिहास के साथ क्या गुस्ताखी की गई है, यह तो उसे देखे बगैर कहना मुश्किल है, लेकिन फिल्म के साथ जो हुआ है, वह इतिहास जरूर बदला जाना चाहिए। 

बहुत दिन नहीं हुए हैं, जब दुनिया के कई देशों में सडक़ों पर जन सैलाब उमड़ पड़ा था। एक कॉर्टून इसकी वजह बना था। हिंसक विरोध करने वालों के साथ ही उन्हें लानत भेजने वाले लोग भी कम नहीं थे। कहते थे किस बर्बर युग में जी रहे हैं ये लोग। ऐसी भी क्या कट्टरवादिता की एक कॉर्टून भी बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं। क्या वह शख्सियत इतनी छोटी है कि एक कॉर्टून से उसके प्रति लोगों की आस्था के महल ढह जाएंगे, लेकिन लोग नहीं माने। लोग तब भी नहीं माने थे जब एमएफ हुसैन ने कुछ तस्वीरें बनाई थीं। इस हद तक भी नहीं माने कि हुसैन को सदा के लिए अपना ही मुल्क छोड़ देना पड़ा। असीम त्रिवेदी को भी देशद्रोह जैसा मुकदमा झेलना पड़ा। इस फेहरिस्त में कई नाम हैं, जिन्हें अभिव्यक्ति की आजादी की दुहाई देते हुए भारी विरोध सहना पड़ा है। 


लेकिन इस बार तो जैसे सारी सीमाएं ही तोड़ दी गई हैं। कब से चल रहा है ये सिलसिला और क्या-क्या नहीं हुआ है अब तक। पिछले साल जनवरी में राजस्थान के जयगढ़ में फिल्म के सेट पर तोडफ़ोड़ की गई। आक्रोशित भीड़ ने संजय लीला भंसाली को थप्पड़ जड़े। फिर कोल्हापुर में सेट तोड़ा गया। लोग पेट्रोल बम, पत्थर, लाठी लेकर पहुंचे और सबकुछ तहस-नहस कर दिया। कास्ट्यूम जला दिए, जानवरों का भूसा स्वाहा कर दिया। सिर्फ एक शक में कि फिल्म के अंदर खिलजी का कोई ड्रीम सीन है, जिसमें वह रानी के साथ कुछ अभद्र सोचता हुआ दर्शाया गया है। 

फिल्म से जुड़े तमाम लोग चीख-चीख कर कह रहे हैं कि ऐसा कोई दृश्य फिल्म में नहीं है। हालांकि आशंका निर्मूल नहीं थी, क्योंकि अक्सर ड्रीम सीन का एडवांटेज लेकर फिल्मकार स्वतंत्रता ले लेते हैं। लेकिन जब स्थिति स्पष्ट हो गई, तब भी कोई इसे मानने को तैयार नहीं हुआ। कभी इस्लाम खतरे में है के नारे की भत्र्सना करने वाले लाठी-डंडे लेकर सडक़ों पर उतर आए। चित्तौडग़ढ़ में पर्यटकों को आने तक पर पाबंदी लगा दी। बाजार-स्कूल बंद कर दिए। कोटा में फिल्म का टीजर चलाने पर आकाश मॉल में स्थित मल्टीप्लेक्स में तोडफ़ोड़ की गई। इसके पहले फिल्म के पहले पोस्टर्स भी आग के हवाले किए गए। 

सूरत व गांधीनगर में हजारों लोगों ने प्रदर्शन किया। एक कलाकार द्वारा 48 घंटों की मेहनत से बनाई गई रंगोली बर्बाद कर दी। मेरठ के ठाकुर नेता अभिषेक ने तो भंसाली और दीपिका का सिर काटकर लाने वाले को 5 करोड़ का इनाम देने की घोषणा तक कर दी। इस विरोध में सरकारें भी पीछे नहीं रहीं। यूपी के गृह मंत्रालय ने 1 दिसंबर को प्रस्तावित फिल्म रिलीज पर रोक लगाने के लिए इस आधार पर चिट्ठी लिखी कि 2 दिसंबर को ईदे मिलादुन्नबी है और फिल्म से सौहार्द्र बिगडऩे का डर है, इसलिए इस पर रोक लगाई जाए। रतलाम में स्कूल के कार्यक्रम में घूूमर हो गया तो लोग तोडफ़ोड़ करने जा पहुंचे। 


राजस्थान की मुख्यमंत्री ने सूचना एवं प्रसारण मंत्री स्मृति इरानी को इस पर रोक लगाने के लिए चिट्ठी लिखी। भाजपा ने इलेक्शन कमिशन को चिट्ठी  लिखी कि गुजरात सहित अन्य राज्यों के चुनाव तक इसका प्रदर्शन रुकवाएं। उज्जैन के भाजपा सांसद ने यह तक कह दिया कि भंसाली मनुष्यों की नहीं सिर्फ जूते की भाषा समझते हैं। राजस्थान के गृह मंत्री गुलाब कटारिया ने पैनल ही बना दिया था कि इनके द्वारा फिल्म को ओके करने के बाद ही कुछ होगा। मोदी जी को भी चिट्ठी लिखी गई कि इस फिल्म पर पूरे देश में ही पाबंदी लगा दी जाना चाहिए। 

सेंसर बोर्ड ने पांच संशोधन कराए हैं, लेकिन इन्होंने उड़ा दिया कि 300 कट हुए है। अगर यह भी मान लिया तो फिर अब फिल्म के प्रदर्शन में क्या अड़चन है। एमपी, हरियाणा, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान के तो मुख्यमंत्रियों ने इस पर बैन ही लगा दिया था। इन पांच में से चार राज्यों में भाजपा की सरकार है, लेकिन गोवा में उसी भाजपा की सरकार के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर को इससे कोई आपत्ति नहीं है। आखिर माजरा क्या है बॉस। 

आखिर इतने विरोध की वजह क्या है। वह भी बिना फिल्म देखे या फिर यह एक बहाना है, धु्रवीकरण का। हाशिए पर बैठे जातीय नेताओं के लिए सुनहरा अवसर है, सुखियों में बने रहने का। कहां जा रहे हैं हम, किस युग में जी रहे हैं। अगर विरोध है तो उसे दर्ज कराने का क्या लाठी-डंडे का ही तरीका बचा है।  कुछ भी हो लाठी-डंडा उठाकर मैदान में आ जाइये। फिल्म का नाम बदल दिया गया, विशेषज्ञों को दिखा दी गई। सेंसर बोर्ड ने पारित कर दिया, उसके बाद भी किसी को भरोसा क्यों नहीं हो रहा। या भरोसा होने दिया जा रहा है। किस बात का इतना डर है। 



जानबूझकर विवाद को जिंदा रखा जाने की पूरजोर साजिश हो रही है। क्योंकि लाठी-डंडों के साथ ही भय और घृणा की राजनीति ने कई चेहरों को भी सुखियों में ला खड़ा किया है। वे नहीं चाहते कि ये उल्टी चप्पल अब सीधी हो। जबकि हम भी जानते हैं कि हमारे यहां इतिहास लेखन की कोई सुदृढ़ परंपरा नहीं रही है। खुद बाबा तुलसीदास ने शुरुआत में ही डिस्क्लेमर लगा रखा है स्वांत: सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा। आखिर कुछ तो समझो।

Comments