सड़क पर मर भले जाओ, मगर पुलिस अपनी गाड़ी गंदी नही होने देगी।

By - संकर्षण शुक्ला

सत्याग्रह. कॉम

'दाग अच्छे है' शायद यूपी पुलिस के कर्मियों ने नही सुना था, तभी सहारनपुर में अर्पित खुराना और सन्नी गुप्ता को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। दरअसल ये दोनों लड़के बाइक से कही जा रहे थे, इस दौरान इनकी बाइक खंभे से टकरा गई और दोनों किशोर गंभीर रूप से घायल हो गए।

दुर्घटना वाली जगह पे यूपी की डॉयल 100 सेवा की गाड़ी खड़ी थी और दैनिक जागरण अखबार की माने तो इस गाड़ी की सरकार की ओर से प्राप्त मिल्कियत वाले पुलिसकर्मियों ने इन घायलों को इस वज़ह से अपनी गाड़ी से अस्पताल नही पहुंचाया ताकि उनकी गाड़ी गंदी न हो जाएं। 

बाद में टेम्पो से उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां पे उन दोनों की मौत हो गयी, अत्यधिक खून के रिसाव होने के कारण। हमारे देश के राज्यों की पुलिस तो ख़ैर असंवेदनशीलता के उत्तुंग शिखर पर ही है। ये खाकी का दोष है या इनके संस्कारों में कमी? जो पुलिस वाले इस कदर असंवेदनशील हो जाते है। 

समुद्र रूपी पुलिस व्यवस्था में एकाध निर्मल हृदय के सीप (मोती) भले मिल जाएं, बाक़ी ज्यादातर का रूप वैसा ही है जैसा आम समाज पुलिस के बारे में अपनी राय रखता है। अगर आप चोरी का एफआईआर लिखाने जाएं तो आप ही से इतने सवाल कर देंगे मानो आपने ख़ुद ही चोरी करके थाने में रपट लिखाने की जुर्रत की हो। सामान चोरी की रिपोर्ट लिखाने जाओ तो उसे खोया-पाया में दर्ज कर देते है ताकि चार्जशीट न लगानी पड़े।

एक पुलिसकर्मी भी परिवार और समाज से ही निकलकर पुलिस बल में भर्ती होता है तो फ़िर उसके भीतर इतनी आला दर्जे की असंवेदनशीलता का निर्माण न जाने कैसे हो जाता है? दो बच्चे की जान से अधिक पुलिसकर्मियों को अपनी गाड़ी की सफाई की चिंता सताती है, वो भी उस गाड़ी की जो सरकार ने उन्हें अल्पकाल के लिए विभागीय कारवाई हेतु दी है। 

पुलिस सुधार पर टीवी डिबेट, सरकारी कार्यशालाएं खूब आयोजित होती है मगर जमीन पर कुछ भी नही होता है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद प्रकाश सिंह कमेटी की सिफारिशें अब तक नही लागू कर पाई है विभिन्न राज्य सरकारें। कम से कम पुलिस प्रशिक्षण के अंतर्गत ही इन पुलिसकर्मियों को लोक व्यवहार और संवेदनशील रहने का तो सलीका सिखाना ही चाहिए।



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