महात्मा गांधी और ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान।

By - अव्यक्त


पहली तस्वीर- 1947 के बिहार दंगों के दौरान गांधीजी और बादशाह ख़ान एक साथ।
दूसरी तस्वीर- 1938 में सीमाप्रांत और अफगानिस्तान की सरहद पर गांधीजी और बादशाह ख़ान


पठान लोग परंपरागत रूप से ही लड़ाके माने जाते हैं। इतना तक कि गांधी ने एक बार पेशावर में सबको हँसाने के लिए कहा था-

“हमलोग तो पठान का नाम सुनकर ही कांपने लगते हैं।”

लेकिन उन पठानों के बीच एक सचमुच का बहादुर और अहिंसक पठान हुआ। अहिंसा का दर्शन उसे स्वतंत्र रूप से हुआ था। गांधी से मिलने से बहुत पहले उसने कुरान की आध्यात्मिक गहराइयों में अहिंसा का सूत्र ढूंढ़ निकाला था। खैबर की घाटियों में चिराग लेकर भी ढूंढ़ते, तो ऐसा अहिंसक पठान अपवादस्वरूप भी नहीं मिलता था।

19 नवंबर, 1938 के अपने एक लेख में गांधी लिखते हैं- “पठान बड़े अच्छे योद्धा होते हैं, इस बात का बादशाह ख़ान को कोई गर्व नहीं है। वे उनकी बहादुरी की कद्र करते हैं, लेकिन मानते हैं कि अत्यधिक प्रशंसा करके लोगों ने उन्हें बिगाड़ दिया है। वह ये नहीं चाहते कि उनके पठान भाई समाज के गुंडे माने जाएं।

उनके विचार से पठानों को गलत राह पर लगाकर लोगों ने उनसे अपनी स्वार्थसिद्धि की है और उन्हें अज्ञान के अंधकार में रखा है। वे चाहते हैं कि पठान जितने बहादुर हैं उससे अधिक बहादुर बनें और अपनी बहादुरी में ज्ञान का समावेश करें। उनका विचार है कि यह काम केवल अहिंसा के सहारे ही किया जा सकता है.”

ख़ान साहब ने गांधीजी से कहा कि चलिए जरा हमारे पठानों को जाकर अहिंसा की तालीम दीजिए। लेकिन जब 1938 में गांधी उत्तर-पश्चिम सीमाप्रांत के दौरे पर निकले तो उधर के एक प्रमुख उर्दू अखबार ने लिखा- ‘गांधी यहाँ सरहद के पठानों को नामर्द बनाने के लिए आए हैं।’

4 मार्च, 1938 को पेशावर के इस्लामिया कॉलेज में गांधी ने इस बारे में कहा- 

“जब पहले-पहल लोगों को मेरे सीमाप्रांत में जाने के बारे में मालूम हुआ, तब उन्होंने कहा कि यह आदमी (महात्मा गांधी) तो लोगों को बुजदिल बनाने जा रहा है। यदि अहिंसा का यही अर्थ है तो आपको उससे घृणा करनी चाहिए।”

16 जुलाई, 1940 को सेवाग्राम में एक कार्यक्रम में गांधी कहते हैं- 

“ख़ान साहब पठान हैं। पठानों के लिए तो कहा जा सकता है कि वे तलवार-बंदूक साथ ही लेकर जन्म लेते हैं। ...पठानों में दुश्मनी निकालने का रिवाज इतना कठोर है कि यदि किसी एक परिजन का खून हुआ हो तो उसका बदला लेना अनिवार्य हो जाता है।

एक बार बदला लिया कि फिर दूसरे पक्ष को उस खून का बदला लेना पड़ता है। इस प्रकार बदला पीढ़ी-दर-पीढ़ी विरासत में मिलता है और वैर का अंत ही नहीं आता। यह हुई हिंसा की पराकाष्ठा, साथ ही हिंसा का दिवालियापन। क्योंकि इस प्रकार बदला लेते-लेते परिवारों का नाश हो जाता था।

ख़ान साहब ने पठानों का ऐसा नाश होते देखा। इसलिए उन्होंने समझ लिया कि पठानों का उद्धार अहिंसा में ही है। उन्होंने सोचा कि अगर वह अपने लोगों को सिखा सके कि उन्हें खून का बदला बिल्कुल नहीं लेना है, बल्कि खून को भूल जाना है, तो वैर की यह परंपरा समाप्त हो जाएगी और वे जीवित रह सकेंगे।

यह सौदा नकद का था। उनके अनुयायियों ने उसे अंगीकार किया, और आज ऐसे खिदमतगार देखने में आते हैं जो बदला लेना भूल गए हैं। इसे कहते हैं बहादुर की अहिंसा या सच्ची अहिंसा।”

इसी तरह बिहार में दंगों के दौरान जब गांधी घूम-घूमकर उसे शांत करने में लगे थे, तो जो व्यक्ति उनके साये की तरह चौबीसो घंटे उनके साथ खड़ा रहता था, वे ख़ान साहब ही थे।

12 मार्च, 1947 को पटना में एक सभा में गांधी ने ख़ान साहब की ओर ईशारा करते हुए कहा- ‘बादशाह ख़ान मेरे पीछे बैठे हैं। वह तबीयत से फकीर हैं, लेकिन लोग उन्हें मुहब्बत से बादशाह कहते हैं, क्योंकि वह सरहद के लोगों के दिलों पर अपनी मुहब्बत से हुकूमत करते हैं।

वे उस कौम में पैदा हुए हैं जिसमें तलवार का जवाब तलवार से देने का रिवाज है। जहाँ ख़ानदानी लड़ाई और बदले का सिलसिला कई पुश्तों तक चलता है। लेकिन बादशाह ख़ान अहिंसा में पूरा विश्वास रखते हैं।

उन्होंने बताया कि अगर पठानों ने खून का बदला खून की पॉलिसी को न छोड़ा और अहिंसा को न अपनाया तो वे खुद आपस में लड़कर तबाह हो जाएंगे। जब उन्होंने अहिंसा की राह अपनाई, तब उन्होंने अनुभव किया कि पठान जनजातियों के जीवन में एक प्रकार का परिवर्तन हो रहा है।”

पठानों को सुधारने की राह इतनी आसान भी नहीं थी। ऐसा नहीं है कि खुद बादशाह ख़ान की अहिंसा की परीक्षा नहीं हुई। खूब हुई। 1946 में जवाहर लाल नेहरू बादशाह ख़ान के साथ पश्चिमोत्तर प्रांत के जनजातीय इलाकों का दौरा कर रहे थे।

21 अक्तूबर, 1946 को जब वे पेशावर लौट रहे थे, तभी एक भीड़ ने इनपर जोरदार हमला कर दिया। बादशाह ख़ान ने नेहरू के शरीर को अपने शरीर से पूरी तरह उसी प्रकार ढक लिया, जिस प्रकार कोई मां अपने बच्चे को बचाने के लिए ढकती। चोट तो नेहरू को आई जरूर, लेकिन सबसे ज्यादा चोट बादशाह ख़ान को ही आई। जान जाते-जाते बची।

फिर भी, लड़ने के लिए बदनाम पठानों पर बादशाह ख़ान की अहिंसा का जादू लंबे समय तक रहा जरूर। लेकिन जबसे नव-साम्राज्यवादी शक्तियों ने इस पूरे क्षेत्र को अपनी हिंसक राजनीति और सशस्त्र संघर्ष का अड्डा बनाया, तबसे अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच यह इलाका पिस रहा है।

आज यहाँ के आम लोग भी भयानक हिंसा की चपेट में आ चुके हैं। उनकी अपनी धरती एक लंबे अरसे से खून से लालोलाल हुई पड़ी है। वहाँ केवल बम-बारूद के धमाके और चीखें ही सुनाईं पड़ती हैं। 

उसका नतीजा आज पूरी दुनिया भुगत रही है। स्वयं बादशाह ख़ान का भी बाकी जीवन अपने लोगों के प्रति करुणा से भरी हुई पीड़ा में ही बीता।




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