गणतंत्र है क्या ? सब छलावा हैं।


By - अमन सिंह




जनता की हिस्सेदारी इस देश में वोट देनें तक सीमित है। यह एक कटु सत्य है। गणतंत्र होने के लिये जिम्मेदारी कंधें पर उठाना होता है। जब मीडिया बिक जाय , क़ानून एकतरफा होनें लगे,गरीबी अमीरी की खाई आसमान छू ले ,अराजकता, धर्म सेकुलरिज्म राजनीति का शिकार होनें लगा फिर गणतंत्र गौण  (gone अंग्रेजी वाला भी) हो जाता है।

ये सबकुछ होता आया हैं , 60 साल पहले भी होता था,आज भी हो रहा है।

क्या चुनाव जीतना और सिर्फ चुनाव जीतने के लिये ही देश का गणतंत्र बना होना है ?

क्या पार्टी  राजनेता बनने की प्रक्रिया में बदलाव हो सकेगा ?

क्या देश के प्रति जनता की जिम्मेदारी लेनें के कर्तव्यप्रयान्ता की लहर जग सकती है ?

बहुत से सवाल हैं,देश की राजनीति 4 सालों में बदली हैं। केंद्र सरकार सशक्त है और प्रबल भी।

इसमें कोई दो राय नहीं जितना कुछ इस सरकार ने देश के डिफेन्स के लिये किया हैं उतना अब तक शायद ही किसी ने किया हो पर जनता का इस सरकार में हिस्सेदारी बढ़ने की आवश्यकता है।

जो भी हो प्रधानमंत्री जब प्रधान सेवक बन जाता है तो उम्मीदें भी बहुत बढ़ जाती है। देश प्रगति के मामले में नई - नई  उच्चाईयाँ छू रहा है और देश एक ऐसे कंधें पर हैं जिसने अपना जीवन ही देश के लिये समर्पण कर दिया है। इन सबके बाद भी आंतरिक स्तर पर देश में बनने वाले राजनीति से प्रेरित साम्प्रादायिक माहौल एक भारी ऑब्स्टेक्ल है।

गणतंत्र दिवस को एक हॉलिडे  मानकर पिकनिक मनाने वाले बुद्धिजीवी लोग कब इसके महत्व को समझेंगें, ये भी स्वतःमूल्यांकन करने वाला प्रश्न है।

गणतंत्र दिवस की ढ़ेर सारी शुभकामनाओं के साथ।

जय हिंद जय भारत।

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