कविता : "शहर से एक चिट्ठी माँ के नाम"।

By - गौरव पाण्डेय

साभार - writm. com


माँ ! कभी- कभी मन करता है कि
मैं फिर छोटा हो जाऊँ
इतना कि अपनी गलती पर
छुप सकूँ तुम्हारे आँचल में
पिता से डरकर

जब द्वार पर आऊँ
हमारी चाची
मुझे देख मुँह न बिचकाएँ
जबरन धर-पकड़ दाल-भात खिलाएं

बच्चों के बीच जाऊं
तो वो मुझे देख कर डर न जाएं
मेरे पास आएँ, अपनी टॉफी चूरन खिलाएं
दिन भर छुपम-छुपाई खेलते-खोजते
कम से कम एक दिन फिर से बिताएं

माँ !
मुझे लगता है
सबके भीतर बची रहनी चाहिए
पिता के साथ मेला घूमने जाने की जिद
और बाबा की ऊँगली पकड़ जाते रहें खेतों की ओर

मुझे पुकारते हैं
छोटे-छोटे चने के बिरवे
खट-मिठियां का पुरनका पेड़ बुलाता है
टपकने लगी है लालटेशुन बईर
देखो इकठ्ठा होंगे
गाँव भर के बच्चे उसी के नीचे

मैं भी आ रहा हूँ जैसे-तैसे......
मुझे मना मत करना
पिता से न कहना

                          माँ !






गौरव पाण्डेय जी सीनियर रिसर्चर है। लेखनीय से इन्हें बहुत प्यार है इसलिए अपनी भावनाओं को लेखन के माध्यम से लोगों तक पहुँचाते आये है। इनकी बहुत सी कविताएं आये दिन समाचार पत्रों में प्रकाशित होती है।




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