हम बहस करेंगे मीलॉर्ड, आप देश को चर्चा करने से नहीं रोक सकते।


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सीबीआई जज लोया की मौत के मामले में इन दिनों सुप्रीम कोर्ट में दिलचस्प बहस चल रही है. इसका एक अंश 'लाइव लॉ' में प्रकाशित हुआ है. पढ़िए उसका हिंदी अनुवाद:

हरीश साल्वे (महाराष्ट्र सरकार के वकील): हमने चार न्यायिक अधिकारियों से बात की जिन्होंने बताया कि यह कोई संदिग्ध मामला नहीं है. जजों ने बयान दिए हैं कि लोया की मौत हार्ट अटैक से हुई. जांच रिपोर्ट बॉम्बे हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को भी दे दी गई है. 

दुष्यंत दवे: बॉम्बे लॉयरस एसोसिएशन के वकील की हैसियत से मैं यहां हस्तक्षेप करना चाहूंगा. सरकार की रिपोर्ट चाहे जो कहे, सबूत इसके उलट हैं. अगर मामला इतना ही सीधा था तो जज के परिवार को इस बारे में क्यों नहीं बताया गया, उन्हें उस अस्पताल भी नहीं बुलाया गया जहां जज लोया का पोस्ट मार्टम हुआ. मुंबई से नागपुर के लिए सुबह तीन फ्लाइट हैं. इस मामले की जांच होनी ही चाहिए...... सोहराबुद्दीन मामले में हरीश साल्वे ने अमित शाह की पैरवी की थी. और अब वे महाराष्ट्र सरकार की पैरवी कर रहे हैं. यह सीधा-सीधा हितों के टकराव का गंभीर मामला बनता है. एकमात्र आदमी जो चाहता है कि इस मामले की जांच न हो, वह इनका आदमी (अमित शाह) है. ये महाराष्ट्र सरकार की पैरवी नहीं कर सकते. 

साल्वे: कुछ लोग जज की मौत से लाभ लेना चाहते हैं. इस वजह से पहले ही काफी नुक्सान हो चुका है. 

दुष्यंत दवे: साल्वे, आप इस संस्थान का पहली ही काफी नुक्सान कर चुके हैं. माननीय न्यायमूर्ति को साल्वे को इस मामले में कोर्ट को संबोधित करने की अनुमति नहीं देनी चाहिए. 

साल्वे: इस तरह की टिप्पणी कोर्ट में नहीं की जानी चाहिए. 

दुष्यंत दवे: आप मुझे नैतिकता का पाठ न पढाएं. 

साल्वे: ऐसा आप करते हैं. मुझे आपसे प्रमाणपत्र नहीं चाहिए. 

(जस्टिस चंद्रचूड बीच में इन दोनों वकीलों को रोकते हैं)

मुकुल रोहतगी (महाराष्ट्र सरकार के ही वकील): दवे को इस मामले में अदालत को संबोधित करने का अधिकार नहीं है. वे बॉम्बे लॉयर्स एसोसिएशन के वकील हैं जिनकी याचिका बॉम्बे हाई कोर्ट में थी. यहां सुप्रीम कोर्ट में ये याचिकाकर्ता ही नहीं हैं. 

दुष्यंत दवे: मृत जज के पिता, चाचा और उनकी बहन इस मामले की जांच चाहते हैं. उनका बेटा भी पहले यही चाहता था लेकिन भारी दबाव में वह पीछे हट गया है. 

जस्टिस चंद्रचूड: निश्चित ही ये एक गंभीर मामला है. हम सभी को इसे निष्पक्ष होकर देखना चाहिए. 

साल्वे: हमने ये रिपोर्ट बनाते हुए शीर्ष स्तर पर लोगों से बात की है. 

दुष्यंत दवे: हां. शीर्ष स्तर पर. अमित शाह से?.... अगर ये हार्ट अटैक से हुई मौत है तो इसकी जांच हो जाने पर आपत्ति क्या है. 

साल्वे: ये अमित शाह, अमित शाह क्या है? आप किसी ऐसे व्यक्ति पर आरोप नहीं लगा सकते जो कोर्ट में मौजूद ही नहीं है. आप आगे बढ़कर सिर्फ इसलिए कोई भी टिप्पणी नहीं कर सकते कि अमित शाह एक मशहूर राजनीतिक व्यक्ति हैं. 

मुकुल रोहतगी (दुष्यंत दवे से): आप कहना क्या चाहते हैं? इस मामले में चार निष्पक्ष जजों ने पुलिस से बात की है और उनके बयानों से साफ़ है कि यह मौत हार्ट अटैक से हुई है. 

जस्टिस चंद्रचूड (दुष्यंत दवे से): रिकार्ड्स हमारे सामने हैं. हम उन रिकार्ड्स को भी देखेंगे जो आपने सूचना के अधिकार से हासिल किये हैं ताकि पूरे मामले को समझा जा सके. 

साल्वे: मुझे प्रतिपक्ष के अपने साथियों पर पूरा विश्वास है. हम उन्हें सभी दस्तावेज एक सील कवर में देने को तैयार हैं. लेकिन उन्हें इन दस्तावेजों को गोपनीय रखना होगा क्योंकि ये एक संवेदनशील मामला है. 

(इस मामले में दिन की कार्रवाई ख़त्म होने को ही थी कि तभी हरीश साल्वे कोर्ट से मांग करने लगे कि मीडिया को इस मामले में कुछ भी प्रकाशित करने से प्रतिबंधित कर दिया जाए. इसके बाद तो बहस और भी गरमा गई)

इंदिरा जयसिंह: ऐसा करना प्रेस को प्रतिबंधित करना है. इस मुद्दे पर प्रकाशन और बहस की अनुमति होनी चाहिए.  

साल्वे: ये एक संवेदनशील मामला है. हम नहीं चाहते कि इस मामले में जजों के बयान पर मीडिया में चर्चा हो. 

दुष्यंत दवे: क्यों नहीं? शशि थरूर और चिदंबरम के मामलों में भी तो मीडिया में व्यापक चर्चा हो रही है. 

जस्टिस खानविलकर: विचाराधीन मामले पर? जब मामला न्यायालय में विचाराधीन है तो आप इस पर मीडिया में बहस कैसे कर सकते है? 

दुष्यंत दवे: हम बहस करेंगे. महोदय आप देश को चर्चा करने से नहीं रोक सकते. ये संभव ही नहीं है. अगर मामला विचाराधीन भी है तो भी हम बहस और चर्चा करेंगे. 

इंदिरा जयसिंह: अगर मीडिया पर रोक का कोई आदेश जारी होता है तो मैं उसका विरोध करूंगी. दो दिन पहले ही पद्मावत मामले में माननीय न्यायाधीश ने अभिव्यक्ति की आज़ादी का हवाला देते हुए राज्यों द्वारा इस पर परतिबंध को रद्द किया था. 

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ('कोई मेरी भी सुन लो' टाइप अंदाज़ में गुस्सा करते हुए इंदिरा जयसिंह से): मैंने अभी एक शब्द भी नहीं बोला है. क्या मैंने रोक का कोई आदेश जारी कर दिया? हम सिर्फ इस बारे में चर्चा कर रहे हैं और आप निष्कर्ष निकाल रही हैं. ऐसे नहीं होगा. आप माफ़ी मांगिये और अपने शब्द वापस लीजिये. 

इंदिरा जयसिंह: मैं अपने शब्द वापस लेती हूं और माफ़ी मांगती हूं. 

जस्टिस खानविलकर (दुष्यंत दवे से): आप लोग इतना उत्तेजित क्यों हो जाते हैं? ये गुस्सा क्यों? 

दुष्यंत दवे: यह सब सिर्फ एक व्यक्ति को बचाने के लिए किया जा रहा है.....अमित शाह. हां, अभी तक यह एक प्राकृतिक मौत लग रही है. लेकिन मौत की परिस्थितियां जांच की मांग करती हैं. 

जस्टिस खानविलकर: हाँ. हमने कहा तो है कि हम ऐसा करेंगे. लेकिन आप इस तरह लोगों पर आरोप मत लगाइए. और आप तो खुद भी कह रहे हैं कि यह एक प्राकृतिक मौत लगती है. 

दुष्यंत दवे (बड़बड़ाते हुए): काश. ये एक प्राकृतिक मौत होती.



स्रोत : लाइव ला.इन 

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