"मैं उस समाज की चाेली क्या उतारूंगा,जाे पहले से ही नंगी है।"

By - सीमांत कश्यप
seemanthindidakiya@gmail.com





"मंटाे"सिर्फ नाम नहीं था एक चिंगारी थी जाे समाज के नंगेपन से टकराते- टकराते आग बन गई.और इन आग की लपटाें ने कहानियाें का रूख़ कर लिया.

11 मई काे जन्मा था "मंटाे" पूरा नाम "सआदत हसन मंटाे"था मतवाला किस्म का था आज के दिन 1955 काे दुनिया छाेड़ गया था पर "मंटाे"नहीं मरा उसका शरीर मरा मंटाे आज भी कहानियाें में जिंदा है।

मंटो की तीन कहानियों “बू”, “काली सलवार” और “ठंडा गोश्त” के लिए उसे तीन महीने की सजा और तीन सौ रूपए जुर्माना हुआ था। (ये कहानियाँ, वक्त से बहुत पहले लिखीं गयीं हैं। आज तक उनके लिखने का सही वक्त नहीं आया, और न शायद आयेगा। यह जुर्माना वो अवार्ड है जिसपर मंटो के हर चाहने वाले को नाज होगा।

एक कथा "मंटाे"की

चेहरे से हवस की बूँद टपक ही रही थी,मानो सदियों के भूखे भेड़िए आबरू के बाज़ार में हैवानियत की माचिस सुलगाने आए हों,मास मदिरा का सेवन तो कर ही चुके थे,पर आँखो मे जलती हवस की लौ से जान पड़ता था की अब भूख जिस्म की लगी है,बाज़ार के ठेकेदार को एक दोस्त ने आवाज़ लगाई ...अबे ओ यहाँ आ...ठेकेदार दौड़कर उनके पास हाज़िर हुआ ! ठेकेदार तो उनके आवाज़ से वाकिफ़ था इसलिए उसने पहले से ही बंदोबस्त कर लिए थे, दस बीस लड़कियों को उनके सामने हाज़िर कर दिया ..और कहने लगा छांट लीजिए इनमे से कोई ....यू समझो की वो लड़कियाँ ना हो कोई ( साग या तरकारी ) वैसे यही कहना ठीक रहेगा ना! क्यूंकी आज भी तो स्त्रियों को भोग विलास के लिए समझा जाता है।

दस बीस लड़कियों मे से एक लड़की को आख़िरकार उन दोनो ने चुन ही लिया.रात भयावह हो चली थी इस बार ठेकेदार ने एक कुँवारी लड़की का सौदा किया था जिसे इस बात का अंदाज़ा भी नही था की भेड़ियों के प्रहार सहने की बारी आज उसकी है . वो चीखती रही,चिल्ल!ती रही,लेकिन चीख अब सिसकियों में बदल चली थी , यौवन का रस्पान हो चुका था...कौमार्या उसका उन दोनो भेड़ियों के बीच की आग मे जल चुका था।

रात गुजारने के बाद उन दोनो मे से एक ने पूछा तुम बहुत सुंदर हो "तुम्हारा नाम क्या हैं?" 

लड़की ने मुँह बिचकते हुए अपना नाम बताया तो भड़क (चकरा गया) : “हमसे तो कहा गया था कि तुम दूसरे मज़हब की हो....!”

लड़की ने जवाब दिया : "ठेकेदार ने झूठ बोला था!”
यह सुनकर वह दौड़ा-दौड़ा अपने दोस्त के पास गया जो मदिरा सेवन करने दूसरे कमरे मे गया हुआ था उसके पास पहुँचा और कहने लगा : “उस हरामज़ादे ठेकेदार ने हमारे साथ धोखा किया है.....हमारे ही क़ौम की लड़की थमा दी......चलो वापस कर आएँ.....!”

ऑफीस की चेयर पर बैठकर की बोर्ड पर चलते मेरे हाथ कल रात के सपने को कहानी मे पिरो रहे है पर जो क्रोध की आग इस वक़्त मेरे अंदर जल रही है वही आग से पूरी दुनिया को जलाना चाहता हूँ ...

शर्म आती है मुझे उस श्लोक से जिसमे नारी को पूजने की बात कही जाती है,शर्म आती है मुझे उस आराधना से जो नारियों के लिए की जाती है,शर्म आती है उन लोगो से जो मज़हब की हिदायत देते है,शर्म आती है उन मर्दो से जो उनके चलने पे अनुमान लगा लेते है. की इसने संबंध बनाए है. और इसने नही.!

.कहानी अगर भद्दी लगी हो तो कोई बात नही क्यूकी ये कहानी नही हक़ीकत है ....जिससे समाज के हर स्त्री झुलसी हुई है!

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