बॉम्बे में देवदासगीरी...

बॉम्बे की पहली तीन यात्राएं...

पहली बार इंटर में
दूसरी बार इंटर फेल
तीसरी बार इंटर पास

फेल इंटर को जब पास किया तो जाहिर था बीए में आते..और बीए में आते आते अपनी दुनिया पूरी तरह काली पीली हो चुकी थी..चकत्ते तक पड़ गए थे..तू तू नहीं मैं मैं नहीं वाला हाल..

कुछ देर क्लास में भटकने के बाद सायकिल उठाता और शारदा नहर की लहरें गिनने बैठ जाता..कुछ देर बाद दो-चार दोस्त तलाशते हुए पहुंच जाते कि कहीं छलांग न लगा दी हो..

दीवाली निकलते ही बॉम्बे..उषा दी को पत्र लिखा...आ रहा हूँ..जवाब आया...आ जाओ..ट्रेन यात्रा में पहली बार इकलौता था..20 घंटे चुप्पी मारे रहा..नासिक आते आते कोट स्वेटर उतर चुके थे..इगतपुरी में टिफ़िन का बचाखुचा खाना इस उलाहने के बाद पकड़ा दिया..अबे कुछ देगा भी..

कल्याण पे उतर उषा दी के उनका कुछ मिनट इंतज़ार किया और फिर तुफैल में टैक्सी पकड़ अम्बरनाथ..टैक्सी जब जंगल और पहाड़ियों से लबालब अम्बरनाथ में घुसी तो इहलाम हुआ कि महामूर्ख हूँ..लेकिन ईश्वर ने साथ दिया और  घर नज़र आ गया, जहां मुझे जाना था..टैक्सी को रोक एक गहरे खड्ड में उतर कर उस सुंदर से फ्लैट के दरवाज़े को पीटा..उषा दी दरवाज़े पर..तुम अकेले, वो कहाँ हैं!! अपना मासूम जवाब .. टैक्सी पकड़ कर आ गया, उनका पता नहीं..उषा दी आंखे चौड़ी कर बोलीं..तुम बिल्कुल नालायक ही रहोगे क्या..

बहरहाल, अगले एक महीने उस गोआनी बस्ती से विक्टोरिया टर्मिनस, वीटी से चर्चगेट और चर्चगेट से सात बंगला तक का डोलना कैसा रहा..यह अगले अंक में..

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