गांधी की हत्या :क्या सच, क्या झूठ ?

By - अंकेश मद्देशिया






गांधी की हत्या : क्या सच, क्या झूठ ? जिन्होंने ने भी इस किताब को अब तक न पढा हो जरूर पढे। इसे गांधीवादी विचारक और कार्यकर्ता श्री चुन्नीभाई वैद्य ने लिखा है। गांधी जी की हत्या के कुकृत्य को सही ठहराने के लिए के लिए जो भी तर्क गढे गए हैं और झूठ प्रचारित किए गए हैं उनका इस किताब में तर्कपूर्ण ढंग से खंडन किया गया है।

सबसे महत्वपूर्ण बात तो यही है कि क्या किसी से भी वैचारिक असहमति के आधार पर उसकी हत्या के अपराध को जायज ठहराया जा सकता है ? 

असल में हिंदू महासभा और आर.एस.एस. जैसे संगठनों के राष्ट्रवाद के विचार में ही खोट(दोष) है क्योंकि इनका मानना है कि जिन धर्मों की पितृभूमि या पैदाइश भारत की नहीं है वह भारत के प्रति वफादार हो ही नहीं सकते।

आप दूसरे पर अविश्वास करके , उनपर संदेह करके उन्हें अपना नहीं बना सकते। बार-बार दूसरे से से देश भक्ति का सर्टिफिकेट मांगने से आपकी देशभक्ति प्रमाणित नहीं हो जाती। 

गांधी जी ने अपनी जान गंवाकर भी भारत को किसी भी एक धर्म पर आधारित राज्य नहीं बनने दिया ताकि भारत में रहने वाले सभी जाति-धर्म और संप्रदाय के लोग शांति से सम्मानजनक और बराबरी का जीवन बीता सके।

पर आजकल क्या हालात हो गये है इस बारे में बीबीसी हिंदी के डिजिटल एडीटर राजेश प्रियदर्शी लिखते हैं, देशभक्तों की नई फौज 26 जनवरी, 15 अगस्त जैसे मौक़ों पर भगवा और तिरंगा झंडे साथ लेकर मोटरसाइकिलों पर निकलने लगी है। ये 'न्यू इंडिया' की नई परंपरा है।

उनका कहना है कि वे देशभक्ति फैलाने के लिए ऐसा करते हैं. मई 2014 के बाद से देशभक्ति की अधिकता हुई है या कमी, यह समझना ज़रा कठिन है। बहरहाल, जिनके पास देशभक्ति की अधिकता है, वे इसे उन लोगों में ज़बर्दस्ती बाँटना चाहते हैं जिनमें इसकी कमी खोज ली गई है।

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