ससुराल हो सकता है सियासत गेंदा फूल नहीं ।



यह इस तारीख की सबसे बड़ी बेबसी है कि कोई भी आंदोलन सत्ता तक पहुंचते ही कुर्सी बचाओ-सत्ता संभालो अभियान में तब्दील हो जाता है। राजनीतिक महत्वकांक्षाएं रगों में फडक़ते सारे सिद्धांतों का मलिदा बना देती है। तब सिर्फ एक ही लक्ष्य रह जाता है कुर्सी और सत्ता का रसूख। फिर सारी ताकत इसी में खर्च होती है कि कैसे मढ़ी को गढ़ और गढ़ को किले में बदलकर उसे अभेद्य बना लिया जाए। सत्ता न मालूम कौन सा सुख देती है, जिसे एक बार हासिल करने के बाद फिर कोई सुख, सुख नहीं रहता।

देर सवेर ही सही अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी को यह समझ आ ही गया कि सत्ता में बने रहना है तो सिर्फ कार्यकर्र्ताओं और नेताओं से काम नहीं चलेगा। कविता और कहानियों से भीड़ जुटाने वाले लोग मजमा तो जमा सकते हैं, लेकिन सत्ता की महफिल सिर्फ भीड़ से नहीं सजती। फिर दीवाने और पागल किसी की बेचैनी समझकर उनका दिल तो जीत सकते हैं, लेकिन वोट नहीं जीत पाएंगे। इसके लिए मैनेजमेंट की जरूरत पड़ती है। 

पार्टियों को कवि और संवेदनशील बुद्धिजीवियों से ज्यादा अब वकील और चार्टर्ड अकाउंटेंट की जरूरत पड़ती है। वकील जो तर्क रख सकें, कोर्ट में विपक्षी की मट्टी-पलीत कर सकें और चार्टर्ड अकाउंटेंट उनके फाइनेंशियल मैनेजमेंट का खयाल रख सकें। उनके सारे काले-सफेद का संतुलन बनाए रखे। सबूत न छोड़े और वक्त पडऩे पर सब ढांक लें। बाकी बाहुबली की जगह तो रामायण और महाभारत काल से ही मुकर्रर है। 

फिर पुराने अहसानों की दुहाई सियासत में कभी काम नहीं आती। सियासत एक चलती ट्रेन है, जो इसमें बैठ गया वह बैठ गया। जो स्टेशन पर रह गया, उसके पास भले ही फिर फस्र्ट क्लास का टिकट हो, वह किसी काम का नहीं रहता। इसलिए कुमार विश्वास अगर यह कहें कि अन्ना के आंदोलन से ही वे इस लड़ाई में शामिल हैं। अगर केजरीवाल ने सत्याग्रह के जरिये लोगों को जोड़ा था तो उन्होंने भी अपने कविता कौशल से लोगों को साथ रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी। यहां तक कि आप के लिए अमेठी की चुनौती भी स्वीकार की और सुनिश्चित हार भी स्वीकार की। इन बातों से अब किसी की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता। 



कुमार आज कह रहे हैं कि मुझे तो केजरीवाल ने पहले ही कह दिया था कि आपको हम मारेंगे, लेकिन शहीद नहीं होने देंगे। आज में अपनी शहादत स्वीकार करता हूं। वैसे वे तो उसी दिन शहीद हो गए थे, जब उन्होंने बाजी पलटते ही आप के खिलाफ बोलने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। पहली बार जब सरकार गिरी तब उन्होंने यह मानने में गुरेज नहीं किया कि कुर्सी छोडऩा बड़ी भूल थी। यानी उन्हें आशंका थी कि यह काठ की हांडी अब दोबारा नहीं चढ़ेगी। उन्हें यह समझना होगा कि कुर्सी पर बैठते ही सबसे पहले सुनने की क्षमता चली जाती है। 

राजा और नवाब अपने दरबार में भाट-चारण इसलिए ही रखते थे और उन पर जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा लुटाते थे, क्योंकि वे हर समय उनकी विरुदावलियां गाते थे। राजा जिसे ईश्वर का अवतार ही माना जाता रहा है, हर समय इस खुशफहमी में ही जीना चाहते थे कि वे ही अपनी प्रजा के एकमात्र शुभचिंतक और उद्धारक हैं। उनके जैसा न तो इस धरा पर अब तक कोई हुआ है और न आगे यह करिश्मा हो सकेगा। और कुमार तो उनके कानों में करेले का रस टपका रहे थे। 

बुद्धिजीवियों की सबसे बड़ी समस्या ही यही है कि वे सत्ता के साथ होकर भी खुद को उससे अलग रखने में अपना बड़प्पन समझते हैं। यह वैसा ही है जैसे कोई गणिका अपने काम के साथ मांग में सिंदूर भी सजाए। ताकि वक्त आने पर वे छिटक कर अलग खड़े होने में जरा असुविधा महसूस न करें। कह सकें कि मैंने तो पहले ही इशारा कर दिया था कि गाड़ी बेपटरी हो रही है। और देखिए हो गई। बुद्धिजीवी जीत का सेहरा तो बंधवाना चाहते हैं, लेकिन हार का ठिकरा बर्दाश्त करने को तैयार नहीं। 



हालांकि जब इलाके के सारे पत्थरों पर सिंदूर पोतकर उन्हें भेरूजी बनाया जा रहा हो तो छिनी-हथौड़ी के मन में भी ऐसी ही ख्वाहिश जागना स्वाभाविक है। जो जीवनभर से इस दंभ के साथ जीती रही हैं कि सारी की सारी प्रतिमाएं उन्होंने गढ़ी हैं। इस वक्त वे यह भूल जाती हैं कि छिनी-हथौडिय़ां नहीं बल्कि कलाकार की कल्पना शक्ति, रचनात्मकता और सतत अभ्यास ही बेजान पत्थरों में जान फूंकता है। ये और बात है कि मूर्ति बनने के बाद सब श्रेय की अभिलाषा लिए पहुंच जाते हैं। 

इसलिए केजरीवाल ने कुमार विश्वास के साथ जो कुछ किया है, वह राजनीति के अनवरत प्रहसन का एक छोटा सा अध्याय भर है। कुमार जरूर थोड़ा ज्यादा अधीर साबित हुए। वे इसका भी क्रेडिट लेने से चूक गए। वे कह सकते थे कि मैंने ही सलाह दी थी कि पार्टी में और भी मौके आएंगे। अभी हमें जिस तरह के लोगों को जोडऩे की जरूरत है, उन्हें आगे लाने की कोशिश ज्यादा जरूरी है। 

फिल्म चुपके-चुपके में इतनी बॉटनी सीखने को मिली थी कि गेंदे का फूल, फूल होकर भी फूल नहीं होता है, बल्कि एक जैसे कई फूलों का गुलदस्ता होता है। किसी आंदोलन में तो यह संभव है, लेकिन सियासत में अलग-अलग विचारधारा और काबिलियत के लोगों की जरूरत होती है। मैनेजमेंट और बाक़ी इंतजामों की जरूरत होती है। आप को अभी उसी की जरूरत है। आंदोलन कायम रहे।





By - अमित मंडलोई

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