एक ख़ाब की गठरी बाँधके चले गए।

By - प्रिंसी मिश्रा

Credit - NDTV.com


एक लठ और अडिग अहिंसा के इंक़लाब को ,
कितनों के सीने में दाग के चले गए।
मोहन दास करम चंद गाँधी...?
क्या पहचानते हो इस इंक़लाब को?
आबो - हवा में महक थी जलते भारत की।
कमज़ोर होनी थी नींव अब,
अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद कि इमारत की।
अकेला नहीं ,मगर ज़रूरी नाम ये याद रहे,
इतिहास चीख - चीख कर ये बात कहे।
गुजरात के घाट पर दीपक ये जन्मा था,
अपमान का घूट पी कर ज्वाला बन ये दहका था।
मालूम मगर था ,
आग लगी तो वतन बराबर दहकेगा,
और धुएँ में अंग्रेजों का सपना ही महकेगा।
मुमकिन नहीं कि दुश्मन को ख़ाक कराने को,
अपने ही हाथ अपने घर को जल जाने दो।
इसलिए अहिंसा का मार्ग चुना,
एक-एक ईंट रखी,
दांडी मार्च, सत्याग्रह, असहयोग आंदोलन, सिविल नाफरमानी,...
तब जाके हाँसिल जीत हुई।
पतली दुबली क्या थी,
जाने कैसी माया थी?
राम नाम का जप करते थे,
सत्य - अहिंसा थे दो साथी।
दबे-कुचलों संग मोह अधिक था,
उत्थान के उनके सपना अडिग था।
एक वचन था ,एक कर्म था,
हरिजन को गले लगाते थे,
जाति - धर्म का न मोल लगाते थे।
चरित्र विशाल था गाँधी का इनता,
छोड़-छाड़  अपने काम,
सबने बराबर साथ दिया।
चौरी-चौरा ने भयंकर घात किया,
लोगों का संयम टूटा,
गाँधी ने विष घूँट पिया,
देख हिंसा का तांडव,
रुकने का निश्चय किया।
भूल गए कुछ लोग यहाँ,
गाँधी भी थे केवल इंसान,
जितना वे कर गए,
क्या कोई कर पाया है?
जितना था युद्ध ज़रूरी,
उतना ही था गाँधी के सपनों का होना।
गांव प्रगति करें,दिन रात आगे बढ़े,
तभी शहर टिक पाएंगे।
सबको हक हो जीने का,
बोझ नहीं था केवल ये गाँधी के सीने का।
चरखे पर सूत कातते,
और स्वदेशी का ही वचन माँगते।
अंग्रेजों के खातिर था भारत मात्र एक बाज़ार।
नील , चाय , अफीम और जाने क्या-क्या बोते थे,
भूखे किसान ,खाली पेट ही सोते थे।
बाटों और राज करो की नीति ने,
आग लगाई समूचे बंगाल में।
जश्न मानाया ताजपोशी का अंगेज़ी रानी ने,
अकाल और भुखमरी से जलती लाशों के शमशान में।
इस सब से मुक्त कराने को,
अंग्रेजी साम्राज्य में नहीं जो ढलता था,
उस सूरज को अस्त करने को,
गाँधी ने निज जीवन का त्याग किया।

पर किसे पता था ,
गाँधी जिस हिंसा से कोसों दूर रहे,
अंत उतना ही हिंसक होगा।
दीप बुझा गए,
सारे वतन को अनाथ कर,सबको रुला गए।
एक इंक़लाब ने कीमत अहिंसा की,
हिंसा से चुकाई थी,
किसी नीच ने ये लौ बेरहमी से बुझाई थी।
वतन करेगा माफ नहीं,
गाँधी तो फिर भी जिंदा हैं,
थे वे ऐसा इंक़लाब जो स्थिर जब हो जाता है,
अजर-अमर कहलाता है।
बढ़ते भारत की आँखों से,
गाँधी का सपना अब भी छलक जाता है।
क्या इंसाफ हुआ है?
क्या भारत अब गाँधी के सपनों का है?
निज मंथन की ,और उनकी सीख को खुद में आत्मसात करने की,
आज हर भारतवासी को ज़रूरत है।
याद आज भी हर भारतवासी को ,
उनकी सूरत है।

         

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