रांझणा की बिंदिया भंसाली पर चला रही गोलियां।

By - अमित मंडलोई


Credit: Bollywoodlife.com


लिंग और योनी 

पद्मावत देखने के बाद अभिनेत्री स्वरा भास्कर ने संजय लीला भंसाली को एक खुला पत्र लिखा है। पत्र में उन्होंने भंसाली से कई कड़े सवाल पूछे हैं। उन्होंने लिखा है कि फिल्म देखने के बाद मैं खुद को सिर्फ योनी तक सीमित महसूस कर रही हूं। इसमें जौहर और सती प्रथा का जो महिमा मंडन किया गया है, वह स्त्री को सिर्फ योनी बनाकर छोड़ देता है। स्वरा के सवाल यौन कुंठाओं से बजबजाती प्रचलित पुरुष मानसिकता को उजागर करते हैं, लेकिन तभी एक प्रश्न यह भी उठता है कि जब स्त्री पुरुष की नजर में खुद को योनी की तरह पाती है, ठीक उसी समय वह भी तो पुरुष को सिर्फ एक लिंग की तरह देख रही होती है। 

वैचारिक स्तर पर लिंग और योनी का यह युद्ध लंबे समय से जारी है। कुछ समय पहले एक मित्र ने लिखा था कि किसी स्त्री को लेकर आखिर में पुरुष यही कहता है कि कुछ भी हो फकिंग मटेरियल तो ही है ना। यानी कैसी भी है, कुछ भी है, अंतत: उपभोग तो की ही जा सकती है। लडक़ों के होस्टल्स में बहुप्रचलित एक जुमला कवर द फेस एंड फक द बेस, इस मानसिकता की पुष्टि भी करता है। लगता है जैसे वह देह के धरातल पर स्त्री का जरूरत से अधिक मूल्यांकन ही नहीं करना चाहता। बाजार में लडक़ी देखते ही उछल पडऩे वाले, आंखें सेंकने वाले, फब्तियां कसने वाले, उन्हें छूने की कोशिश करने वाले पुरुष इस बात का झंडा बुलंद करते नजर आते हैं। 

यही वजह है कि स्त्री अब भी अपने अस्तित्व को लेकर एक अलग संघर्ष में डूबी नजर आती है। वह ऐतिहासिक कथानक निकाल-निकालकर उसमें इस तरह की पुरुषवादी सोच वाले लोगों को कठघरे में खड़ा कर रही है। सभी से तीखे सवाल पूछ रही है कि क्या वह सिर्फ देह है और आपके देहिक सुख के लिए ही है। देह से इतर उसका कोई वजूद नहीं है। उसकी उपलब्धियां, उसका ज्ञान, कौशल, अनुभव, काबिलियत सब मिथ्या है। सारी कवायद के बाद सिर्फ देह हो जाने की विवशता क्यों है। 

स्वरा के सवाल स्त्री के इस शाश्वत और सनातन प्रश्न की प्रतिध्वनि ही हैं। जब वह पूछती है कि क्या दुष्कर्म के बाद स्त्री को जीने का हक नहीं होना चाहिए। क्या पति की मृत्यु के बाद स्त्री का जीवन अर्थहीन हो जाता है। तो फिर क्यों उसे सती कर दिया जाता है, जौहर के लिए विवश कर दिया जाता है। क्यों फिल्म की नायिका श्रृंगार के समय जौहर के बारे में हंस कर बातें करते हुए दिखाई जाती है। यह ठीक है कि पद्मावत सदियों पुरानी कहानी है और उतनी ही पुरानी हकीकत, लेकिन इसकी प्रतिध्वनि क्या आज की स्त्री और समाज के भीतर भी इस तरह की सोच को पुष्ट नहीं करेगी। सवाल लाजमी है, क्योंकि स्त्री की देह पर वक्त की इतनी रगड़ है कि वह इनसे खुद को सदैव लहूलुहान महसूस करती है। 

अब इस सवाल के दूसरे हिस्से की तरफ बढ़ते हैं। यह ठीक है कि पुरुष सदियों से अपनी स्त्री को चहारदीवारी के भीतर कैद करके रखना चाहता है। वह सदैव उसे अपनी ही बाहों में जकड़े देखने में सुख महसूस करता है। वह नहीं चाहता कि उसकी स्त्री पर किसी और की नजर भी पड़े।

 जब स्त्री पुरुष को सिर्फ लिंग की तरह देखती है तो उसे उसमें आक्रांता नजर आता है। उसकी शक्ल में उसे सिर्फ हमलावर दिखाई देता है, लेकिन भावांतर करते ही उसे इसमें पुरुष के प्रेम की तीव्रता नजर आती है। पागलपन दिखाई देता है, सबसे बचाकर रखने की जिम्मेदारी का भाव महसूस होता है। उसकी आक्रामकता में भी प्रेम का जुनून दिखाई देता है। जिसे जलन नहीं होती, वह प्रेम ही नहीं करता। जैसे जुमले स्त्रियों की महफिल में भी आम है। 

सती प्रथा और जौहर किसी लिहाज से जस्टिफाय नहीं किए जा सकते। फिर भी देश, काल और परिस्थितियों के आकलन के बिना किसी सात सौ बरस पुरानी घटना पर आज की सोच, समझ और परिस्थिति के हिसाब से निर्णय सुना देना भी उचित नहीं कहा जा सकता। हम सीता की अग्नि परीक्षा को लेकर मर्यादा पुरुषोत्तम को भी कठघरे में खड़ा करने से नहीं चूकते हैं और इसमें कभी संकोच भी नहीं करेंगे। लेकिन यह भी समझना होगा कि इन घटनाक्रम को युग बीत चुके हैं। अब हमें सोच के नए दायरे बनाने होंगे। नए नजरिये से इस लड़ाई को देखना होगी। 

सहचर्य या सहवास के जरिये स्त्री और पुरुष दोनों ही सुख तलाशते हैं। इसके लिए हर स्थिति में किसी को आक्रांता और किसी को पीडि़त नहीं करार दिया जा सकता। जैसे स्त्री को खलता है कि उसे क्यों सिर्फ योनी की तरह देखा जाता है तो उसी वक्त पुरुष यह क्यों नहीं सोच सकता कि क्या स्त्री की नजर में वह सिर्फ एक लिंग है। दरअसल दोनों ही तरफ समस्या जनरलाइजेशन की है। किसी एक घटना को लेकर सभी को कठघरे में खड़े कर देने की परंपरा दोनों को ही ठेस पहुंचाती है।






Comments