गांधी, अंबेडकर, बुद्ध और क्षमाशीलता।



27 जुलाई, 1916 को ‘इंडियन ओपिनियन’ में गांधी लिखते हैं- “बोअर युद्ध में जिस समय ब्रिटिश सरकार मेफेकिंग में विजयी हुई, उस समय समस्त इंग्लैंड, विशेषकर लंदन नगर यहां तक हर्षोन्मत्त हो गया कि छोटे-बड़े सभी पुरुष रात-दिन नाचते ही रहे।

उन्होंने भरपेट शरारतें कीं, भरपेट उछल-कूद की और दुकानों में शराब की एक बूंद भी बाकी न रहने दी। विजयी राष्ट्र [अलग-अलग परिस्थितियों में इसे कौम, समुदाय, संप्रदाय और जाति भी कह लें] बदमिजाज हो जाता है।”

हमारे पूर्वजों ने उसको हराया, उसके पूर्वजों ने इसको पछाड़ा, इस तरह की कहानियों का हासिल सामाजिक वैमनस्यता का बढ़ना ही होता है। हमारे सैनिकों ने उस तरफ के इतने सैनिकों को मारा, इसका जश्न मनानेवाले भी आखिरकार इंसानियत की बजाए बर्बरता की ओर ही एक कदम आगे बढ़ रहे होते हैं।

हम कस्बों में मनाए जानेवाले कारगिल विजय जुलूस में देखते हैं कि किस तरह वहां के सारे छंटे हुए बदमाश, बेरोजगार और दिशाहीन किशोरों और युवकों की फौज बेमतलब का हुड़दंग मचाते हैं।

रामनवमी के जुलूस में तो ऐसे ही लोग लाठी, तलवार, फरसा, भाला और हॉकी-स्टिक तक हास्यास्पद रूप से हवा में भांजते हुए मिल जाएंगे। आजकल मुहर्रम और रामलीला में भी यही सब होने लगा है। 

इसलिए परमाणु युद्धों के कगार पर खड़ी दुनिया में लोगों को युद्धोत्सवों और विजयोत्सवों को मनाने से परहेज ही करना होगा, भले ही उसका इतिहास कुछ भी रहा हो। आज बड़े और छोटे परमाणु बटन का हवाला देकर राष्ट्राध्यक्ष लोग एक-दूसरे को ऐसी धमकियां दे रहे हैं, मानो वह गली-मोहल्ले में गुल्ली-डंडे का खेल हो।

नई पीढ़ियां अपने पूर्वजों के कुकृत्यों के लिए जिम्मेदार नहीं हैं, लेकिन जैसे ही वे अपने पूर्वजों की हार-जीत से खुद को जोड़कर देखने लगती हैं, वैसे ही वह उसमें भागीदार हो जाती हैं। क्या हम चाहते हैं कि अतीत की हार-जीत का हिसाब आज की हमारी पीढ़िया आपस में लड़-मर कर बराबर करें?

हमारे समाज का शोषित और दलित वर्ग नैतिक रूप से एक बहुत ऊंचे धरातल पर खड़ा है, क्योंकि उसने आगे बढ़कर किसी के साथ अन्याय नहीं किया।

लेकिन जैसे ही वह अपनी वीरगाथा वाले प्रसंगों को उभारने की कोशिश करेंगे, और उसके आधार पर आज की राजनीतिक मिलिटेंसी को बढ़ावा देंगे, तो वे भी उसी जाल में फंस जाएंगे जिसमें अतीत में और बहुत हद तक वर्तमान में भी उनके ऊपर अत्याचार करनेवाले आततायी लोग फंसे थे और हैं।

भारत में, विशेषकर दलितों में, बुद्ध के प्रति बहुद आदर है। बुद्धवाणी में क्षमा मांगने और क्षमा करने पर बहुत जोर दिया गया है। बाबासाहेब डॉ. अंबेडकर की पुस्तक ‘बुद्ध और उनका धम्म’ में जीवन की परिपूर्णता प्राप्त करने की पारमिताओं का प्रसंग आता है।

इसमें सुभूति नाम का भिक्षु बुद्ध से पूछता है- ‘बोधिसत्व की शान्ति-पारमिता क्या है?’

इसके उत्तर में तथागत बुद्ध कहते हैं- ‘वह स्वयं क्षमाशील हो जाता है, तथा दूसरों को भी क्षमाशील रहने की प्रेरणा देता है।’

लेकिन क्षमा मांगने या प्रायश्चित करने की शुरुआत करेगा कौन? इसकी शुरुआत आक्रांताओं और प्रभुत्वशाली वर्गों-वर्णों और राष्ट्रों की नई पीढ़ियों को ही करनी होगी। पहल करने से कोई छोटा या बड़ा नहीं साबित हो जाएगा। बल्कि सबके हृदय का बोझ हल्का होगा। एक नई शुरुआत के लिए रास्ता खुलेगा।

अमरीका वियतनामियों, इराकियों और उन सभी से माफी मांगने की पहल करे जिनपर उन्होंने जबरन युद्ध लादा और तबाही मचाई। ऐसा ही अतीत की अन्य सभी औपनिवेशिक और साम्राज्यवादी ताकतें भी करें।

ऐसे ही श्वेत प्रजाति की नवपीढ़ियां अपने अश्वेत भाई-बहनों से माफी मांगें। इसी प्रकार कथित सवर्णों की मौजूदा पीढ़ियां अपने दलित भाई-बहनों से माफी मांगें और उन्हें सभी प्रकार के दुखों से बाहर निकालने और बराबर का मानाधिकार देने के लिए जो बन सके वह दिल खोलकर करें। 

अगर लोग आपस में इस उदारता पर उतर आएंगे, तो राजनेताओं और राष्ट्राध्यक्षों को भी रास्ते पर आना ही होगा। क्या हमारी नई पीढ़ियां ज्यादा वैज्ञानिकता और उदारता का परिचय देते हुए ऐसे युद्धोत्सवों और विजयोत्सवों से अपना पीछा छुड़ा पाएंगी!



By- अव्यक्त









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