कौन उठाएगा मासूमों की लाशों का बोझ।


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इदौर बायपास पर स्कूल बस दुर्घटना में ड्राइवर व चार बच्चों की मौत के बाद लोगों के मन में एक ही सवाल है कि किसका कांधा इतना मजबूत है, जो मासूमों की लाशों का बोझ उठा पाएगा। किससे जवाब मांगे कि आखिर किसकी गलती थी, जिसने उन मासूमों की जिंदगी छीन ली। परिवार के सपनों को चकनाचूर कर दिया।

वे दादाजी इंदौर और प्रदेश के रहनुमाओं से एक ही बात पूछ रहे हैं कि चार दिन पहले जिस बच्ची का जन्मदिन मनाया था, अब उसका अंतिम संस्कार कैसे करें। कहां से लाएं वह कलेजा, जो फूल से बच्चों को अलविदा कह सकें। कितने सपनों के साथ उन बच्चों को मोटी फीस वाले नामी स्कूल डीपीएस में भेजा गया होगा। किसने सोचा था कि वह स्कूल उनके बच्चों की जिंदगी से इस तरह खिलवाड़ करेगा। जिस बस से वे अपने बच्चों को सुनहरे भविष्य की राह पर भेजने के सपने देखते थे, वही बस उन्हें जिंदगी के आखिरी मुकाम पर ले जाएगी।



किसे पता था कि स्कूल ने बसों की पूरी व्यवस्था ठेके पर देकर चंद रुपयों के लिए बच्चों की जिदंगी का ही सौदा कर रखा है। ठेकेदार बाहर से सस्ते में आउटडेटेड और कंडम बसें लाकर यहां दौड़ा रहा है, लेकिन सिक्कों की चमक से सबकी आंखें चौंधिया रही थी। किसी को यह दिखाई ही नहीं दिया। 

और प्रशासन के तो कहने ही क्या। आरटीओ, पुलिस और प्रशासन के अफसरों ने कभी झांक कर देखने की जहमत ही नहीं उठाई कि कितनी पुरानी बसें दौड़ाई जा रही हैं, उनके क्या हाल हैं। उनमें कितने बच्चे बैठाए जा रहे हैं, उन्हें कैसे घरों तक पहुंचाया जा रहा है, कौन ड्राइवर है, कैसे गाड़ी चलाता है। कौन कंडेक्टर है, उसमें कोई टीचर बैठा भी है तो वह कैसा है, क्या देखता है। 



वे परिजन चीख-चीख कर अस्पताल में कह रहे हैं कि हम बीसियों बार स्कूल प्रबंधन से शिकायत कर चुके हैं, अफसरों से गुहार लगा चुके हैं, लेकिन गूंगा, बहरा और अंधा प्रशासन हाथ पर हाथ धरकर बैठा रहा। हर बार लोग चेताते रहे कि स्कूल बसों में भारी गड़बड़ी चल रही है, ड्राइवर बहुत तेज चलाते हैं, इनमें सुरक्षा के मानकों का पालन नहीं हो रहा है, लेकिन मासूम बच्चों की फिक्र ही किसे है। सब अपने आलीशान बंगलों और एयर कंडिशनर दफ्तरों में चापलूसों की फौज में ही मशगूल हैं। जो उन्हें शहर में सब अच्छा-अच्छा दिखा रहे हैं और ये भी यहां से लेकर सरकार तक सभी को अच्छा-अच्छा दिखाए जा रहे हैं। किसे परवाह है कि बायपास की खामियां कैसे आएदिन लोगों की जिदंगी से खिलवाड़ कर रही है। उनके दरबार में सब ठीक है, यानी सब ठीक है। 

जनप्रतिनिधियों के बारे में तो बात ही करना बेमानी है। दुर्घटना के बाद तमाम लोग अपना चेहरा दिखाने के लिए अस्पताल तो पहुंच गए, लेकिन स्कूलों की मनमानियों और बसों द्वारा नियमों की धज्जियां उड़ाने पर कभी किसी ने बात करने की जहमत नहीं उठाई। चुनाव का साल है इसलिए सब अपनी-अपनी जमावट में लगे हैं। उन्हें जिस दिन राजनीतिक खींचतान और शोशेबाजी से फुुर्सत मिल जाएगी तब तो वे शहर की फिक्र करेंगे। 



और यह सिर्फ इंदौर का मामला नहीं है। प्रदेश के हर शहर में ज्यादातर निजी स्कूलों ने ऐसी ही अंधेर मचा रखी है। अधिकतर स्कूल इसी जद्दोजहद में लगे हैं कि कैसे रुपए बचाए जा सकें, फिर चाहे उसके लिए बच्चों की सुरक्षा और सुविधा से कितना ही बड़ा समझौता क्यों न करना पड़े। अगर सच में प्रदेश इन बच्चों के साथ न्याय करना चाहता है तो तमाम जिम्मेदारों को बेनकाब कर लापरवाही बरतने वालों को कड़ी से कड़ी सजा दी जाना चाहिए। अगली बार स्कूल से कोई भी बस सुरक्षा मापदंडों को पूरा किए बिना निकलना नहीं चाहिए। जिम्मेदारों के साथ अभिभावकों को भी इसके लिए आगे आना ही होगा।

By - अमित मंडलोई




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