जब मातृत्व ने धर्म ठुकरा कर इंसानियत को गले लगाया


NESamachar


सूरज मौर्या मुंबई में रहते हैं। टीवी एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में हैं। नया-नया लिखना शुरू किया है इसलिए खुद को एक अनगढ़ नौसिखिया लेखक मानते हैं। कहते हैं कि बीते कुछ समय से लिखने का भूत चढ़ गया है और अब इसे उतारना मुश्किल है। इसलिए लिखेंगे खूब लिखेंगे और अच्छा लिखकर दिखाएंगे। अभी बहुत ही रोचक स्टोरी भेजी है जो असम की है। नजरें इनायत हों।

दो महिलाएं असम के दरंग जिले के एक सरकारी अस्पताल में डिलीवरी के लिए भर्ती होती है। इत्तफ़ाक़ से एक मुस्लिम और दूसरी बोडो समुदाय से होती है। लेकिन अस्पताल वालो की लापरवाही से दोनों बच्चों की अदला बदली हो जाती है। अस्पताल की लापरवाही से बच्चों के असल माँ बाप लगभग 2 साल तक वंचित रह गए। 

दो साल गुज़र जाते है। बच्चे बड़े होने लगते है। मुस्लिम पति-पत्नी ध्यान देते है कि उनका बच्चा बोडो रंगरूप ले रहा है। उन्हें शक़ होता है कि कुछ गड़बड़ हुई है। पति को याद आता है कि उनके साथ ही एक बोडो महिला ने भी बच्चे को जन्म दिया था। वो अस्पताल से शिकायत करते है। अस्पताल इंकार करता है। मुस्लिम पिता किसी तरह उस बोडो दम्पत्ति का पता निकालते है और उसे चिट्ठी लिखते है। पहले तो बोडो दम्पत्ति इंकार करते है। फिर सत्यता जानने के लिए डीएनए टेस्ट होता है और आशंका सही साबित होती है।

एक बच्चे के पिता शाहबुद्दीन ने मीडिया को बताया कि वर्ष 11 मार्च 2015 की सुबह  उसकी पत्नी ने एक बच्चे को जन्म दिया। पुत्र के जन्म से दोनों खुश थे। कुछ दिन  अस्पताल में रहने के बाद वो लोग अपने गांव बदलीचर आ गए। उसने अपने बच्चे का नाम जुनैद रखा। सब कुछ सही चल रहा था। लेकिन बच्चा ज्यों ज्यों बड़ा होता गया उसका चेहरा मंगोल ट्राइबल जैसा उभर ने लगा। शाहबुद्दीन की पत्नी जब भी जुनैद को देखती वो रोने लगती। शाहबुद्दीन अपनी पत्नी को ज़िंदगी भर रोते नहीं देख सकता था। 

अस्पताल
इसलिए शाहबुद्दीन मजबूर हो कर पहले तो अस्पताल गया और वहाँ पर पता लगाने लगा लेकिन हॉस्पिटल से उसे कुछ नहीं पता चला। लेकिन सच जानने के लिए लाचार शाहबुद्दीन ने स्वस्थ विभाग में RTI का आवदेन कर 11 मार्च 2015 के दिन अस्पताल में जन्मे बच्चों का विवरण मंगा। RTI का जवाब देते हुए अस्पताल ने बताया की उस दिन सिर्फ दो ही बच्चे पैदा हुए थे। जिसमे दूसरे बच्चे के पिता का घर का पता था। 

शाहबुद्दीन, उस दिन दूसरे बच्चे के पिता अनिल बोडो के घर पहुँचे। जहाँ शाहबुद्दीन ने पूरी बात अनिल को समझायी और उनसे मदद मांगी। जिसके बाद अनिल की मदद से शाहबुद्दीन ने स्वस्थ विभाग में अस्पताल पर लापरवाही का मामला दर्ज कराया और उच्च स्तरीय जांच की मांग की। जिसके बाद जाँच कमिटी बैठी लेकिन जांच कमिटी ने अपने जांच में शाहबुद्दीन को ही गलत करार दिया। 

लेकिन सरकारी नौकरों की इस आदत से शाहबुद्दीन ने हार नही मानी और सच पता लगाने के लिए अपने स्तर पर हैदराबाद के एक लेबोरेटरी में बच्चे का DNA टेस्ट कराया। DNA टेस्ट ने भी ये साबित कर दिया कि वो बच्चा उसका नहीं है।

शाहबुद्दीन ने सबूत आ जाने के बाद  पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज कराया। जिसके पश्चात पुलिस ने भी जांच शुरू की। पुलिस ने रक्त जाँच कराया और मामला अदालत में चला गया। जिसके बाद 4 जनवरी 2018 को अदालत ने मामला साफ कर दिया और बताया कि अस्पताल में बच्चों की अदलाबदली हुई है। 

इमोशनल कहानी में ट्विस्ट तब आता है जब बच्चों के अदला बदली की बात आती है। दोनों माँ-बाप की ममता जाग उठती है। जिस बच्चे को दो साल अपना बच्चा मान ममता लुटाई उसे किसी और को कैसे दे दे। बोडो और मुस्लिम माँ बाप फैसला करते है कि वो बच्चा नही बदलेंगे। वो उन बच्चों से उनके माँ बाप नही छीनेगे।

बोडो पिता कहता है कि ये बच्चें आगे चलकर बोडो-मुस्लिम नफ़रत को मिटाने में सीढ़ी का काम करेंगे।

नफ़रत के माहौल में,धर्म के ऊपर इंसानियत के इस उदाहरण से बहुत सारे मठाधीशों की दुकान बंद होने का ख़तरा उत्पन्न हो जाता है। मीडिया हमे आपको ये नही भगवा होती दीवारें दिखायेगा।

बस इतना जान लीजिए असली दुनियां में आज भी इंसानियत पहला धर्म है।

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