हर औरत को बनना होगा अबू खां की "चांदनी"

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भारत के तीसरे और प्रथम मुस्लिम राष्ट्रपति डॉ.जाकिर हुसैन तो याद नहीं होंगे,चलिए वो नहीं तो उनकी लिखी कहानी तो याद होगी। अब ये मत पुछियेगा कौन सी वाली.अरे वही "अबू खां की बकरी चांदनी" जो भेड़ियों से लड़ते-लड़ते अपनी जान गवां बैठी और जीत गयी.अब जिन्होंने नहीं पढ़ी वो यही सोचेंगे की मरकर कैसे जीत गयी तो देखिये हुआ कुछ यूँ था |

चांदनी एक नन्हीं सी बकरी थी,जिसे अब्बू खां बहुत प्यार करते थे। अपनी जान से ज्यादा चाहते थे उसे। पहाड़ी पर बने बाड़े में उसे सदा अपनी आंखों के सामने रखते। अपने हाथों से हरी नर्म घास खिलाते। घंटों तक दुलारते। कहीं जाना होता तो उसे बाड़े में बंद कर ताला लगा देते।

चांदनी को उस छोटे से बाड़े में बंधकर रहना पसंद नहीं था। वह खिड़की से दूर तक फैले घास के मैदान को देखती। छोटी-छोटी, हरी भरी पहाड़ियां उसे बुलाती सी लगती। वह उन पहाड़ियों पर जाकर उछलना चाहती थी। जी भर कर हरी-हरी घास खाना चाहती थी। वह बाड़े में बंधकर नहीं खुले आसमान तले जीना चाहती थी। भेड़ियों के आतंक से अनजान नहीं थी चांदनी। पर खुलकर जीना ज्यादा पसंद था उसे। वह रोज पहाड़ी के हरे-भरे मैदान में कुलांचे भरने के सपने देखती। पर अब्बू खां के रहते तो कभी संभव नहीं था।

आखिर एक दिन चांदनी के मन की हो गई। बाहर जाते समय अब्बू खां खिड़की की सांकल लगाना भूल गए। उनके जाते ही चांदनी खिड़की से कूदकर बाहर आ गई। उछलती-कूदती मैदान तक पहुंची। खूब कुलांचे भरीं। हरी-हरी दूब जी भरकर खाई। कभी आसमान की ओर देखती कभी मैदान में सरपट दौड़ लगाती। रोम-रोम से खुशी फूट पड़ रही थी। उसके थकने से पहले ही दुष्ट भेड़िये की निगाह उस पर पड़ गई। चांदनी घबराई नहीं। उसने हिम्मत से भेड़िये का सामना किया। कमजोर थी,जी जान से लड़ी आखिर जान गंवानी पड़ी। भेड़िया हंसा,मैं जीत गया,लेकिन पेड़ पर बैठी एक चिड़िया देख रही थी और उसने बोला ,चांदनी जीत गयी।

वाकई में आज कहीं न कहीं हर स्त्रियों को चांदनी बनने की ज़रूरत है.लड़की है तो क्या,ताउम्र निर्देषों का पालन करती रहे ? उसे भी अधिकार है अपने अस्तित्व के साथ जीने का। हर बाप अपने आप में एक अबू खां है जो अपनी बेटी को सीने से लगा के रखता है.अपनी आँखों के सामने देखना चाहता है और "चांदनी" की तरह हर औरत को भी खौफ रहता है भेड़ियों का। लेकिन आज समाज के ठेकेदारों को जिन्हे औरत सिर्फ भोग विलास की वस्तु लगती है.उनका काम सिर्फ आपकी फालतू के दिखावे को मानना नहीं.बल्कि सामाजिकता के नाम पर बने फूहड़ता की दिवार को पार करके हर उस भेड़ियों के सीने पे चढ़कर उनका वध करना है.जो खुद को आका समझ बैठे हैं.

"आज के दौर मेंमुझे हर छोर मेंचांदनी ही दिखती है हां पर सिसकती हैथोड़ा झिझकती है गर सामने हो भेंडियाअग्नि सा दहकती हैआज के दौर मेंमुझे हर छोर मेंचांदनी ही दिखती हैहर औरत को लड़ना होगाभेड़ियों का वध करना होगा" - सीमांत कश्यप

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