कहानी : अब्बा कहाँ है ?


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मारो सभी को...एक भी नहीं बचना चाहिए। ऊपर वाले कमरे में देखो। हाथ में नंगी तलवार लिए जिस पर कइयों के खून लगे हुए थे और कइयों के लगने वाले थे...सभी चीख रहे थे। पूरा शहर दो गुटों में बँट गया था। "इस्लाम खतरे में है" से लेकर "जय श्री राम" तक के नारों ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया था। 

          2016 तारीख 04 जून दिन शनिवार। अभी सुबह के नाश्ते के बाद जुम्मन मियां का दरवाजा खुद को दिन भर चलने वाले ताश के खेल के लिए सजा रहा था। कामेश्वर भैया जो जुम्मन के लिए भैया कम और अब्बा सरीखे ज्यादा थे। दोनों की उम्र में तक़रीबन 10-12 साल का अंतर रहा होगा। गली वाले क्रिकेट में सबसे छोटे होने के बाद भी नाली से बॉल निकलने से हर बार कामेश्वर भैया ही जुम्मन को बचपन से बचाते आये थे और आज जब जुम्मन तीस का हो चुका है। शहर में हर साल होने वाले धनंजय पांडेय स्मृति क्रिकेट टूर्नामेंट में जुम्मन का शानदार रिकॉर्ड भी कामेश्वर भैया के शानदार अंपायरिंग के कारण ही  संभव हो पाया है। 
महाशय हालात कुछ ऐसी हो गई थी की जुम्मन मियां से आये दिन कोई उनके अब्बा के बारे में पूछता तो वो कामेश्वर भैया का हाल-चाल बता आते। हद तो तब हो गई जब जुम्मा के दिन पड़ोस के अब्दुल चाचा ने जुम्मन से पूछा- अब्बा नमाज पढ़ने चलेंगे न ? जुम्मन तपाक से बोल बैठा- नहीं, उनके यहाँ तो सत्यनाराण भगवान् की कथा है आज। सुनते ही अब्दुल चाचा ने माथा पकड़ लिया। खैर हर शनिवार की तरह दिन भर चलने वाले ताश का कार्यक्रम आज भी था। जुम्मन मियां, कामेश्वर भैया, शफ़ाक़त, सलीम अपनी-अपनी जगह ले चुके थे। बाजार से कल ही खरीदी गई शहर में बिकने वाली सबसे खस्ता बिस्कुट ,चाय,गरम-गरम पकोड़े ने चारों के बीच में खुद को विराजमान कर लिया था। जुम्मन मियां का 7 साल का बेटा अब्बास हर ताश वाले मुकाबले के दिन इनका वॉटर बॉय हुआ करता था। खेलते-खेलते अभी दो ही घंटे बीता था कि कुछ पॉइंट को लेकर कामेश्वर भैया और शफ़ाक़त में तू-तू मैं-मैं शुरू हो गई। 

कामेश्वर भैया गुस्से में बोल पड़े- तुम साले पाकिस्तान की तरह हो, आदत से बाज नहीं आते बेईमानी करनी ही है। शफ़ाक़त इस तुलना से तिलमिला के बोला- हाँ है हम पाकिस्तान के तरह और रहेंगे भी कम से कम उन्हें तो नहीं मारा हमने जिन्होंने हमें ही आजादी दिलाई। कामेश्वर भैया चूंकि गुस्से में थे सो इस बात बात को उन्होंने दिल पर ले लिया। गुस्से से कांपते हुए बोले रुको साले तुमको तुम्हारे घर पाकिस्तान भेजते हैं 72 हूर चाहिए न तुम्हें। इतना कह के वो वहाँ से निकलते ही शहर के अतिवादी हिन्दू संगठन के दफ्तर जा पहुँचे और बिलखते हुए अपनी आपबीती सुनाई। "अंधे को क्या चाहिए दो आँखें" बस पुरे शहर में रोड जाम, बाजार बंद, गली गलौज , तोड़-फोड़,धार्मिक उन्माद बढ़ाने वाले भाषण और नारेबाजी शुरू कर दी गई। दूसरे पक्ष के अतिवादी कहाँ पीछे रहने वाले थे। उन्हें तो यहाँ पाकिस्तान चाहिए ही था। "इस्लाम खतरे में है" का नारा पुरे शहर में फैला दिया गया। पुरे दिन दोनों पक्षों में तनातनी बानी रही। दोनों तरफ के कट्टर लोगों के नेतृत्व में लोगों को भड़काने के लिए बैठकों का दौर चलता रहा। अगली सुबह होते ही कई जगहों पर साम्प्रादायिक उन्माद फ़ैलाने वाले जानवरों के क्षत-विक्षत शव मिलने लगे। फिर क्या था उन्हें यही तो चाहिए था बस एक चिंगारी मिले और पूरा शहर जला दो। 

दोनों पक्ष एक-दूसरे पर माहौल बिगाड़ने का आरोप लगाते हुए अपने-अपने दलों के साथ मार-काट मचाने का पूरा साजो-सामान लेकर एक-दूसरे पर टूट पड़े। चारो तरफ चीख-पुकार मच गया। प्रशासन बस किंकर्तव्यविमूढ़ बना रहा। जिस भी इलाके से भेड़ियों का झुण्ड गुजरा, वो इलाका कई सालों के लिए शान्त हो गया। दुधमुंही बच्ची से लेकर बिस्तर पर पड़ी वृद्ध महिला किसी को भी इन हैवानो ने नहीं बख्शा। "जय श्री राम" और "पैगम्बर साहब" के संदेशों को उनका ही नाम लेकर तार-तार कर दिया गया। शाम होते-होते पूरा शहर गिद्ध का अड्डा बन गया। जब मार-काट करने को कोई नहीं बचा तो दोनों गुट आमने-सामने आ गए। खून की प्यासी नंगी तलवारें, बंदूक और न जाने कौन कौन से आदमखोर हथियार हवा में लहराने लगे। तभी जुम्मन मियां और कामेश्वर भैया आमने-सामने आ गए। दोनों ने तलवारें नीचे कर ली। शफ़ाक़त पीछे से चिल्लाया-तुम्हारे अब्बा कहाँ हैं जुम्मन? मार दिया सालों ने कहकर जुम्मन ने तलवार कामेश्वर भैया के आर-पार कर दिया।

        2016 तारीख 11 जून दिन शनिवार। पूरा शहर शांत है...सारे घरों के दरवाजे बंद हैं..सैकडों लोगों की जानें जा चुकी है। सैकड़ों अस्पताल में मौत से जंग लड़ रहे हैं। पूरा शहर छावनी में तब्दील हो चुका है। सड़क पर या तो खून के छीटें या सेना के जवान नजर आ रहे हैं। बचे हुए लोग 7 दिनों के अंदर अपने ही शहर को पाकिस्तान कह रहे हैं।

    सुबह के नाश्ते के बाद शनिवार को होने वाला ताश के खेल की तैयारी पूरी हो चुकी है। जुम्मन मियां जोकर वाली पत्ती को एक टक पकोड़ा खाते हुए देखे जा रहे हैं। हर बार ठंडी पड़ चुकी चाय का एक घूँट लेने के बाद खुद से ही पूछ बैठते हैं- अब्बा कहाँ हैं????


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