CARAVAN का मीडिया विशेषांक।

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मीडिया की नैतिकता और तटस्थता की समझ हम पत्रकारों में भी नहीं है और इसकी समझ का दावा करने वाले दर्शकों या पाठकों में भी नहीं है। हमारी इनकी समक्ष कई बार किसी व्यक्ति विशेष को लेकर होती है या किसी घटना के संदर्भ में। भारत में पत्रकारिता की नैतिकता पर निगाह रखने वाली सरकारी और निजी संस्थाओं को भी इस पेशे के मानदंड की कोई ख़ास समझ नहीं है। नासमझी भी है और इसके नाम पर अनदेखा करने की रणनीति भी। 

वक्त मिले और कुछ गंभीर पढ़ने की रुचि बढ़ने लगी हो तो आप THE CARAVAN पढ़ सकते हैं। इसके लेख लंबे होते हैं मगर ख़त्म करते करते आप किसी विषय के बारे में ठीक ठाक जान लेते हैं। 100 रुपये की यह पत्रिका एक नैतिक प्रोफेसर की तरह मौजूद है। इस दौर में दिल्ली प्रेस के परेश नाथ जैसे भी हैं जो कैरवान को निकाल रहे हैं। हम भीतर से तो नहीं जानते मगर बाहर जो इसका प्रोडक्ट निकल कर आता है वो कई बार साहसिक नहीं दुस्साहसी भी होता है। 

पत्रकारिता पर हरतोष बल के लेख पढ़ कर लगता है कि पत्रकार होना कितना मुश्किल है। आपका संस्थान, समाज और सत्ता आपको पत्रकार होने ही नहीं देना चाहते हैं और आप इन सबसे लड़ते हुए ख़ुद को होने देने के लिए संघर्ष करते रहते हैं। अंत में हार जाते हैं या फिर नौकरी से बेदखल होते होते इस क्षेत्र से ही बाहर हो जाते हैं। हरतोष सिंह बल कई बार असाध्य लगने लगते हैं। 

आपने देखा होगा कि आज कल हर चैनल समय समय पर CONCLAVE करता है। सभी चैनलों ने इसके अलग-अलग नाम रखे हैं। सरकार के विभाग या कंपनियां ही प्रायोजक होती हैं। सरकार आती है तो उससे धंधा करने वाली कंपनियां भी प्रायोजक हो जाती हैं। यह एक किस्म का बिजनेस मॉडल है। बिजनेस मॉडल होने में बुराई नहीं है लेकिन इसे लेकर संपादकीय मॉडल क्या होना चाहिए और क्या इसकी जानकारी दर्शकों या पाठकों को होनी चाहिए?  

हम सब एंकर रिपोर्टर ऐसे कॉन्क्लेव में आने वाले मंत्री या हस्ती मेहमानों को एस्कार्ट करते हैं। कई रिपोर्टरों ने बताया कि इसके लिए उनके पांव तक पकड़ने पड़ गए, ये हालत हो जाती है। कई बार प्रधानमंत्री या मंत्री उसमें जाने की अदृश्य शर्ते भी रखते हैं जिसमें उनकी नापसंद के संपादक को चलता कर दिए जाने की बात होती है या फिर किसी ख़ास एंकर को स्टेज पर न बिठाने की। 

हरतोष सिंह बल ने कारवां के THE MEDIA ISSUE में इस पर एक लेख लिखा है। उदाहरण हिन्दुस्तान टाइम्स और इकोनोमिक टाइम्स का दिया है मगर ऐसे अनेक उदाहरण चैनलों से मिल जाएंगे। हरतोष ने न्यूयार्क टाइम्स की इस बारे में घोषित नीति का भी हवाला दिया, कम से कम पत्रकारों और पाठकों को उसके आधार पर सवाल करने का हक़ तो मिलता है। न्यू यार्क टाइम्स की नीति है कि किसी पत्रकार या संपादक को ऐसे कॉन्क्लेव में आने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है।

हरतोष ने कैरवां पत्रिका की नीति का भी हवाला दिया है। हम लोगों को तो ऐसी नीति भी नहीं मालूम है और न ही ब्राडकास्टर्स संस्था ने ऐसी कोई नीति बनाने की पहल की है। एंकर लगातार यह समझ कर समझौता किए जा रहा है या करने पर मजबूर किया जा रहा है कि उसका काम चैनल को बचाना या बिजनेस दिलाना हो गया है। आप दर्शकों को सवाल करना चाहिए। पत्रकारों से ज़्यादा प्रेस काउंसिल या ब्राडकास्टर्स एसोसिएशन जैसी संस्था से और मीडिया हाउस से भी। 

आज ही बिजनेस स्टैंडर्ड अख़बार ने एक सूचना छापी है। कहा है कि पेज नंबर दो पर ग्रीन एनर्जी पर एक पन्ना कमर्शियल छपा है। जो एक तरह से पेड- विज्ञापन है। बिजनेस स्टैंडर्ड का कोई भी पत्रकार इसमें शामिल नहीं था। पाठकों को सलाह दी जाती है कि वे इसे विज्ञापन ही समझें। क्या कोई चैनल ऐसा बताता है? क्या एक दर्शक के तौर पर आपको पता है कि इसके न बताने से या हल्के में लेने से आपके भरोसे के साथ क्या खिलवाड़ होता है?

कई बार इन्हीं सब वजहों से लगता है कि दम घुट रहा है। क्यों हम लोग इस पेशे में पत्रकार बनकर हैं जब ऐसा बने रहने का कोई न तो मंच है न माहौल। नेता मंत्री आराम से मालिकों की गर्दन दबा कर या गले में हाथ डालकर निकल जाते हैं। हम अपनी कलम की स्याही छिड़कते रह जाते हैं। बाज़ार में बने रहने की शर्त सरकार से तय होगी या संपादक बाज़ार में जाकर अपने होने की शर्त खोजेगा तो पत्रकारिता कब होगी। मीडिया की नैतिकता की समझ का सांस्थानिक विकास होना चाहिए। हो यह रहा है कि इसकी समझ किसी को है, किसी को नहीं है। संस्थाओं से भी पूछिए।    

बीबीसी की एक महिला संपादक ने इस्तीफा दिया यह कहते हुए कि महिलाओं को उसी काम के लिए पुरुषों से कम पैसे मिलते हैं। बीबीसी ने भी यह ख़बर छापी। भारत में ऐसे कितने उदाहरण देखने को मिलते हैं। हम कितने बुज़दिल हो गए हैं कि हर बात से भागते ही रहते हैं। ऊपर से ढिंढोरा कि बनेंगे विश्व गुरु और दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र। 

नोट- कैरवां के मीडिया अंक में राज्य सभा सांसद राजीव चंद्रशेखर की प्रोफाइल है। राजीव चंद्रशेखर नए मीडिया उभरते मीडिया मुग़ल हैं। पत्रिका ने बड़ी मेहनत से बताने का प्रयास किया है कि हमारे सामने जो रिपब्लिक जैसे चैनल लेकर आ रहे हैं वो कौन हैं, उनकी क्या मंशा है और पसंद है। निकिता सक्सेना और अतुल देव ने यह स्टोरी लिखी है। आप इन्हें टीवी के एंकरों की तरह नहीं जानते होंगे मगर सोचिए कई दिन लेकर, कई लोगों से मुलाकात कर एक मीडिया महापुरुष के बारे में लिखने के दौरान इन दोनों का कितना पेशेवर विकास हुआ होगा। आप सिर्फ राजीव चंद्रशेखर के बारे में पढ़ने के लिए न पढ़ें। इसे पढ़ते हुए एक पाठक के तौर पर आप लिखने का तरीका, संतुलन, खोज ये सब भी तो जानेंगे।


By - रविश कुमार




क्रेडिट - रविश कुमार का फेसबुक पन्ना

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