सरकार ने बजट का हलवा बना कर मंत्रियों में बाँट दिया।

By -अमित मंडलोई

Credit : Amarujala.com

कुछ बरस पहले मेरे एक संपादक जी ने बजट से ठीक एक रात पहले मुझे बुलाया और कहा कि शहर में जाकर देखो लोग क्या कर रहे हैं। उनके कामकाज, सोच-विचार में कहीं बजट है क्या। मैं फोटोग्राफर को लेकर दफ्तर से निकला। कुछ ही दूरी पर एक पुलिस चौकी थी, जिसमें ड्रामेटिकली एक जवान सो रहा था। मैंने उसे जगाया और पूछा जनाब कल बजट आने वाला है, क्या लगता है आपको। उन्होंने अलसाते हुए कहा, मुझे ये सब समझ नहीं आता। इसके बाद अलग-अलग तरह के चार-पांच और लोगों से मुलाकात हुई। कोई परिवार के साथ आउटिंग के लिए निकला था तो कोई दोस्तों के साथ टहल रहा था। उनकी दिनचर्या में बजट की कोई दस्तक नहीं थी। न ही किसी के मन में कोई धुकधुकी थी कि कल पता नहीं क्या हो जाएगा और न ही कोई बेसब्र हो रहा था कि कल तो कोई बड़ा खजाना हाथ लगने वाला है।

फिर एक संपादकीय साथियों की मीटिंग में किसी सीनियर ने सवाल दागा। आपने बजट में क्या देखा, क्या पढ़ा, क्या समझने की कोशिश की। सब चुप थे, मैंने हिम्मत जुटाकर कहा, मैंने तो सबसे पहले इनकम टैक्स की स्लैब देखी। उन्होंने पूछा क्यों, यह क्यों नहीं देखा कि रक्षा बजट कितना बढ़ाया गया है या आंगनवाडिय़ों को कौन सी योजना में कितना पैसा दिया जा रहा है। मैंने कहा, ये  सीधे तौर पर मुझसे जुड़ी नहीं थी, इसलिए मैंने इन पर सिर्फ निगाह डाली, लेकिन टैक्स की स्लैब, उनका एनालिसिस भी पढ़ा और उनसे मुझ पर उन्होंने वाले असर को समझने की कोशिश भी की। सवाल पूछने का मक्सद हम समझ चुके थे। 

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इसके बाद अखबारों में बजट के प्रेजेंटेशन में कई बदलाव आए। कभी गानों की तर्ज पर बजट बनाया गया तो कभी उस वर्ष के किसी बड़े घटनाक्रम से जोडऩे की कोशिश की गई। सचिन के करिश्मे वाले दिन पत्रिका ने पहला पन्ना दो हिस्सों में छापा एक सीधा और दूसरा उल्टा। बजट ने किया निराशा और सचिन ने दिया तोहफा टाइप टैग लाइन के साथ प्रयोग किया गया। टाइम्स ऑफ इंडिया ने मांंडू की एक रोती बच्ची का फोटो लगाया कि थिस इज फॉर यूू। बाद में उस फोटो की कहानी भी सामने आई कि अखबार के कोई बड़े साहब मांडू आए थे और वहां वह फोटो बना। एडिट की मीटिंग में जब बजट के प्रेजेंटेशन को लेकर चर्चा चल रही थी तब एडिटर जिन्हें सब जेजे कहते थे वह फोटो लेकर आए और कहने लगे, यह बजट इसके लिए है और इसी को हम पहले पेज पर छापेंगे। 

इसके पहले के अखबार देखेंगे तो पता चलेगा उनमें प्रेजेंटेशन के नाम पर कुछ पाई चार्ट के अलावा कुछ नहीं होता था। जिसमें गिनती की चीजें बताई जाती थी। खासकर क्या महंगा हुआ और क्या सस्ता होगा। इसके साथ पैसा कहां से आएगा और कहां खर्च होगा। इसके अलावा कुछ लोगों के बयान और किसी एक्सपर्ट के भारी भरकम तकनीकी शब्दों वाले कमेंट के अलावा कुछ नहीं होता था। नए प्रयोगों ने पठनीयता तो बढ़ाई ही हर बरस अखबारों के सामने चुनौती भी रखी कि आखिर इस बार बजट कैसे छापा जाए। 

एक बड़े संपादकजी तो यही कहते थे कि बजट सिर्फ अखबारों के बीच ही प्रतिस्पर्धा का विषय रह गया है कि कौन इसे कितने बेहतर तरीके से छापता है। आम आदमी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। वह हत्या, दुष्कर्म, नेताओं की कारगुजारियों की खबरों की तरह इसे भी पढ़ता है और आगे बढ़ जाता है। और हो भी यही रहा है, क्योंकि बजट में आंकड़ेबाजी के अलावा कुछ है ही नहीं। गिने-चुने बदलावों को सरकार ढोल-ढमाकों के साथ पेश करती है, विपक्ष जन विरोधी, किसान विरोधी, जेब भरो बजट करार देकर विरोध की रस्म निभा देता है। इस विरोध और समर्थन में आम आदमी कहीं नहीं है।  

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इस बार के एक बजट को लीजिए। छोटी सी बात है सरकार ने नोटबंदी के बाद बैंकिंग सेवाओं पर ढेर सारे शुल्क लाद दिए। ब्याज दर घटा दी। कुल मिलाकर आम आदमी को कैपिटल मार्केट में निवेश करने के लिए विवश कर दिया। अब यहां भी एक साल से अधिक समय तक शेयर रखने पर मुनाफे के 10 फीसदी पर टैक्स देना होगा। अब या तो सारे कामधाम छोडक़र शेयर मार्केट में रोज की सट्टेबाजी करें या फिर लांग टर्म इन्वेस्टमेंट पर सरकार की जेब भरें। ऐसे ही स्टैंडर्ड डिडक्शन का मसला है। सरकार ने नौकरीपेशा वर्ग को 40 हजार रुपए का एसडी देने का भरोसा दिया है, लेकिन पीछे के रास्ते से 15 हजार रुपए का मेडिकल और 19600 रुपए का ट्रांसपोर्ट अलाउंस खत्म कर दिया है, यानी बमुश्किल फायदा 5400 रुपए का होगा। हो गया न गोल-गोल रानी कित्ता-कित्ता पानी। 

शायद इसलिए ही बजट की औपचारिक प्रक्रिया हलवा रस्म के साथ शुरू होती है। बड़ी सी कढ़ाई में हलवा बनाया जाता है। वित्त मंत्री खुद मंत्रालय के सारे कर्मचारियों को परोसते हैं। मानो यह संदेश देने की कोशिश की जाती हो कि बजट से बाकी किसी को कुछ मिले या न मिले, तुम तो अभी ही हलवा खा लो। क्योंकि वे जानते हैं ये हलवा सबके लिए नहीं है।


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