कहानी : कुसुमी।

By - आकाश कुशवाहा

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दरवाजे के पल्ले की ओट से कुसुमी अपने पति कृष्णा को देखे जा रही थी, साल भर बाद वो शहर से घर आये थे, सालों का दिन जो कुसुमी के उंगुलियों पर गिनकर कटता रहा , कृष्णा को देखकर लग रहा था कि आज कल ही कि बात हो ,
कुसुमी मुस्कुराए जा रही थी, उसे कुछ याद आ रहा था! तब कुसुम नई नवेली दुल्हन ही तो थी,
" अजी सुनिए....
हूँ ..बोलो कुसुम...
कुसुमी ने दही शक्कर मिश्रित कटोरा बढ़ा दी
ये थोड़ा खा लीजिये...
अच्छा दही है !
'जी कहते है दही खाकर घर से निकलना चाहिये शुभ होता है।
"एक काम करो कुसुम तुम ही खिला दो न अपने हाथों से ,
दो चम्मच ही दही खिला पाई कृष्णा को कुसुमी ,उतना ही में ना जाने कितने सवाल कुसुमी की आखों में मचल रहे थे, आँखों मे आँसू झिलमिला रहे थे,
"कुसुमी इतना दुखी न हो जल्दी ही आऊंगा और जाते ही खत भेजेंगे, बस पूरा परिवार की जिम्मेदारी तुम्हारे ऊपर छोड़े जा रहा हूँ,
" आप यहां की बिल्कुल चिंता ना कीजिये, जी बस अपना ख्याल रखियेगा,
अब कृष्णा जैसे ही निकलने को हुआ ,कुसुमी ने हाथ पकड़ ली,
कृष्णा कुसुमी को एकटक देखने लगा,
" शहर जाकर मुझे भूल तो ना जाइयेगा न,
"उफ़्फ़, कृष्णा के मुंह से निकला ,
कृष्णा ने कुसुमी का माथा चुम लिया,
कुसुमी की आँखों मे झिलमिलाते आँसू अब गालों पे ढरकने लगे,
कृष्णा अब बाहर निकल गया,
और कुसुमी दरवाजे के पल्ले से सिसकती कृष्णा को जाते देखती रही,
..अगहन में देह का अदहन होना, या पूस में मन का रूठ जाना ,कार्तिक में बहती पूरबी बयार के हवाओ से आँचल को संभलना, माघ महुआ मदंग रस में सपनो में डूब जाना, फिर कब आ गया फाल्गुनी बयार पता ही नही चला कुसुमी के लिए,बस एक कृष्णा का एहसास ही था जो स्नेह के आस में यादों के चूल्हे पर पक रहा था,

कृष्णा शहर से जो कुछ लाये थे घर परिवार के लिए सबको दे रहे थे , कोई भी ऐसा ना रह पाया जिसे कुछ मिला ना हो सभी खुश थे,
अब कुसुमी सोच रही थी अब मेरी बारी है, मेरे लिए भी तो जरूर कुछ लाये होंगे,
रात हुई टिमटिमाती दिये की रोशनी में कृष्णा कुसुमी को देखे जा रहा था,
" ऐसे क्या देख रहे हो आप,
तुम भी तो सुबह पल्ले की ओट से मुझे देखे जा रही थी,
तो...!
"तो क्या, जो आपका हाले दिल वो मेरा हाले दिल,
.. रात बढ़ी तो बात बढ़ी 
"एक बात पूछे आपसे....?
"अरे एक ही क्यों सौ पूछो ना!
"मेरे लिए कुछ नही लाये'
कृष्णा एक बड़ी सी सांस लेते हुए ...
"कुसुम क्या चाहिए आपको,
'मैं तो सोच रही थी मेरे लिए भी गले के लिए हार लाये होंगे,
' अच्छा जी तो इतना बड़ा हार तो आपकी बाहों में ही तो है,
पर पता नही कुसुमी कुछ बोल नही पाई!
' जानती हो कुसुम मैं बहुत खुश हूँ, क्योकि मेरा परिवार खुश है, प्रेम ही वो दौलत है जो परिवार को एक धागे में बांधे रखता है, प्रेम के बिना दुनिया की हर धन दौलत बेमानी और बेरंग है।
प्रेम ना हो तो एक छत के नीचे रहते हुए भी परिवार ,परिवार नही होता,

मन पारिजात हुआ ,तन हरसिंगार सा डोला, जैसे दोनों के आँखों में प्रेमग्रंथ हो दोनों पढ़ने को आतुर ,एक छुअन, इक चिंगारी,जैसे खजुराहो का आलिंगन,करवट जैसे सिलवटों में गजल बन रहा हो,
कुसुमी ने जैसे कुछ आभास किया कृष्णा को अपने बाहों के अंक में भरकर, कुसुमी के हाथ कृष्णा के पीठ पर जैसे जम गए उसे अपनी सोच पे यकीन नही हुआ,
सुबह हुई आखिर कुसुमी के बैचेन आँखों ने देखा कृष्णा के बनियान में कई छेद थे जैसे बनियान की रंगत उतर गई हो , इतनी बड़ी घर के लिए कुर्बानी,
जिस कपड़े में शहर गए थे कपड़े भी वही थे, 
उफ़्फ़.... कुसुमी के मन ने कहा.. सबको खुश रखकर अपने ख़ुशी से अनजान , कितनी बड़ी जिम्मेदारी है मेरे कृष्णा पर,
सच कह रहे थे कृष्णा प्रेम से बड़ा कोई धन दौलत नही होता ।
कुसुमी कभी सोये हुए कृष्णा के चेहरे को देखती तो कभी चादर के सिलवटों को,
मुस्कुराती हुई शायद मन ही मन यू ही कुसुमी ने कहा, बस ऐसे ही रहना प्रेम बनकर.........मुझे कुछ नही चाहिए !!




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