प्यार वाले सप्ताह में हिंदी डाकिया को एक प्रेम पत्र डाक के जरिए मिला है। पढ़िए जरा।

By - संकर्षण शुक्ला

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प्रिये,

       सबसे पहले अपने उस प्रेम को नमन जो हमने अपने बचपन के खिलंदड़पने और अल्हड़पने में एक-दूसरे से किया था। साथ का खेलना, खेलते-खेलते रूठना और फ़िर रूठने पे एक-दूसरे को मनाना आज भी स्मृति में एकदम ताज़ा है। यूं तो उस वक़्त हम दोनों प्रेम के ढाई आखर को तनिक भी समझते-बूझते नही थे मगर अब अपने बड़ेपन में आकर ये एहसास होता है कि जो हमारे-तुम्हारे बीच में रिश्तों की एक महीन डोर थी वो शायद ख़ालिस प्रेम ही है। 

बालपन में सलीके से अपने कपड़ों को तो संभाल नहीं पाता था तो आपके रूप-सौंदर्य के कसीदे कैसे कसता? हालांकि अब आप भौतिक रूप से इतना दूर है कि उस दूरी को पाटना हमारे लिए संभव न है। फ़िर भी आपके रूप-सौंदर्य को शब्द देना तो हमारे वश में है ही। यूं तो आपके रूप-सौंदर्य का सही-सही बखान कई लोगों को अतिश्योक्ति भी लग सकता है मगर आप जैसी है, मैं वैसा ही बखानूँगा, न एक रत्ती कम- न एक रत्ती ज्यादा।

जब आपके चेहरे को याद करते है तो मन मे उजास आ जाता है। आपका चेहरा कुछ यूं प्रतीत होता था मानो साक्षात चंद्र देवता ने मानव शिल्पी को बुलाकर उसे खास हिदायत दी हो कि इनके चेहरे का वर्ण हूबहू मेरे जैसा बनाना और इसके लिए चंद्रमा ने अपने रंग की सर्वश्रेष्ठ तीव्रता वाली तासीर को उनको सौंप भी दिया। केश की आदर्श कृष्णिका के मानिंद कालिमा कुछ यूं लगती थी जैसे बादलों ने आपके केशों को अपने रंग दिए हो। 

क्लास में आपके डेग धरते ही सभी लड़कों की नजरें आप पे टिक सी जाती थी पर इसमें प्यार का प भी न समझने वाले उन लड़कों का दोष न था, ये तो आपकी आंखों की चितवन ही चित्तचोर थीं जो सभी को दीवाना बना जाती थी। अधरों का गुलाबीपन शायद आपको गुलाबों के बाग की राजकुमारी ने ही तोहफ़े में दिया था। नाक की सुघट्यता कुछ यूँ थी जैसे मैंना की चोंच हो। 

फ़िर भी आप अपने रूप के सौंदर्य को लेकर उतना ही बेफ़िक्र थी जितना कि एक पहर का भोजन ग्रहण करने से अघाया हुआ साधु। हालांकि उस उम्र में आपको अपने रूप के तारत्व का भान होना संभव भी नही था फ़िर भी हम प्रेम में थे तो आपके मन में भी इन पहलुओं के बारे में एक संजीदा समझ विकसित हो गईं थीं। सिनेमाई नायक-नायिकाओं के पर्दे पर किये गए प्रेम को भी हम अपनी समझ भर समझते-बूझते थे।

लंच टाइम में परदे के पीछे के उस प्रेम का रिहर्सल भी करते थे। चूंकि उस वक़्त हमारे घर वालों ने केबिल टीवी नही लगवा रखा था ताकि हम बिगड़ने न पाएं और पूरा का पूरा ध्यान अपनी पढ़ाई पे ही दें पाएं। सो हमें उस समय भी दूरदर्शन पे संडे स्पेशल के दिन आने वाली अस्सी के दशक की फिल्में ही देखने को मिल पाती थीं। उन फिल्मों के नायक-नायिकाओं के जैसे मैं भी अपने दाहिने हाथ को उर्ध्वादिश करके आपके हाथ को भी उसके बराबर लाकर उंगलियों को घूर्णन बिंदु बना लेता था और आप सकुचाई नायिका की तरह उसे पकड़कर चारों ओर घूमते हुए घूर्णन नृत्य करती थीं। उन हाथों की छुअन आज भी ताज़ा है, महसूस भी होती है जब-तब।

स्कूल के गार्डन में बनी हुई गुलाब के पेड़ की श्रृंखलाओं के नीचे बैठकर हम-आप सिनेमाई तासीर के प्रेम का अनुभव लिया करते थे। चूंकि उस दौर के नायक-नायिका फर्राटा शैली का इश्क़ न करके आहिस्ता-आहिस्ता इश्क़ के मैदान में दौड़ भरते थे वैसे ही हम भी रिवाजी तौर पर ही सही मगर एक-दूसरे के कंधों पे अपने हाथों को टिकाएं बैठे रहते थे। कई बार स्कूल के सर और मैम लोग हमें डांट-डपट के इस हिदायत के साथ भगाते भी थे कि तुम्हारे मम्मी-पापा से शिकायत कर देंगे मगर हम सब बांवले प्रेम के परिंदों जैसे फ़िर वहीं हरकतें दोहराते। गार्डन की हरी घासों पे बैठकर हम एक-दूसरे को अपलक निहारते हुए मौन की भाषा को भी महसूसते थे। 

हमारी रति का शृंगार जब मन के रास्ते दिमाग मे दस्तक दे देता था तो हम उन्मुक्त होकर एक-दूसरे में सिमटकर कुछ यूं हो जाते थे मानो हम दो न होकर एक ही हो। क्लास के दूसरे बच्चे जब हमारे इस एकाकार होने की घटना को देखते तो वो कुटिल मुस्कान का थोक उत्पादन शुरू कर देते, मुस्कान के उन गुच्छों को देखकर हम-दोनों शर्म के मारे लाजवंती जैसे हो जातें। अधरों का अधरों से वो सात्विक मिलाप आज भी मन-मानस के आर्काइव में दर्ज है। आपके कोमल कपोलों के निशान आज भी हाथों पे उसी तरह अंकित है जैसे बरसों-बरस पहले हमने लाड के मारे हाथों से खींचकर सदा के लिए उन्हें हाथों पे छपवा दिया था। ललाट से ललाट की वो टकराहट आज भी मन-मंदिर को रोमांचित करती है। 

आप अपने लंबे केशों को लेकर सदा ही फिक्रमंद रहती थी सो मम्मी के लाख कहने पे भी उन्हें नहीं कटवाती थी, उन लंबे बालों का चोटी में गूंथ के आना भले ही आपकी साथिन कुछ लड़कियों को न सुहाता था मगर मुझे उस चोटी को पकड़कर दाएं-बाएं लहराना बहुत भाता था। हमारी-आपकी ये चाहना अधिक दिनों तक न टिक सकीं और एक दिन आपके पापा का रूटीन ट्रांसफर के तहत दूसरे राज्य में ट्रांसफर हो गया और आप इस वादे के साथ विदा हो गईं कि फ़िर मिलेंगे। 

आठ बरस होने को है, अब तो इंतज़ार की भी इंतहा हो गईं है। मग़र अभी भी किसी और की तरफ़ नजरें नहीं उठती क्योंकि कानों में 'फ़िर मिलेंगे' के उन शब्दों की अनुगूंज हो उठती है। 




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