अब तो देश अपने गिरेबां में झांके।

By - अमित मंडलोई

National herald


11 हजार 400  करोड़ का बैंक घोटाला सामने आने के बाद सरकार से सवाल किए गए तो बड़े दिलचस्प जवाब आए। केंद्रीय मंत्री रविशंकर बोले, कांग्रेस पहले अपने गिरेबां में झांके। यह घोटाला 2011 से चल रहा था, हम तो 2014 से सत्ता में आए हैं। दावोस में मोदी के साथ घोटाले के सरगना नीरव मोदी की मौजूदगी महज इत्तेफाक है। कांग्रेस फोटो पॉलिटिक्स न करें, क्योंकि हमारे पास मेहुल चौकसी के साथ कई कांग्रेसियों की अंतरंग तस्वीरें हैं। नीरव की एक एक्जीबिशन में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी शामिल हो चुके हैं। 

समझना मुश्किल है कि आखिर ये हो क्या रहा है। क्या कोई घोटाला सिर्फ इसलिए जायज है और उसके लिए मौजूदा सरकार या मशीनरी जरा भी जिम्मेदार नहीं है, क्योंकि वह उसके पहले से चल रहा था। अगर दोनों ही दलों के साथ उनके रिश्ते हैं, पार्टी-फोटो की नातेदारी है तो क्या उन्हें यह हक है कि वह जनता की गाढ़ी कमाई के 11 हजार 400  करोड़ रुपए हजम कर लें और हम तमाशा देखते रहें। और आखिर में यह कह देना ही पर्याप्त है क्या कि कानून को अपना काम करने दीजिए। कानून सख्ती से काम कर रहा है, किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा। 

लेकिन यह तो बताइये जनाब कि मियां कानून के हाथ में यह केस सौंपा ही कब गया है,  तब जब चिडिय़ा खेत चुग कर फुर्र हो चुकी है। नीरव मोदी 1 जनवरी को देश छोड़ चुका है। संभवत: वह स्विटजरलैंड में है। नीरव की पत्नी एमी अमरिकी नागरिक है, भाई निशाल बेलजियन नागरिक है और वह भी 1 जनवरी को देश को अलविदा कह चुका है। पार्टनर मेहुल चौकसी 6 जनवरी को देश से भाग चुका है। बैंक ने पहली शिकायत 29 जनवरी को की, एफआईआर हुई 30 जनवरी को। उस वक्त भी सिर्फ 280 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी का जिक्र किया गया। अगली शिकायत हुई 13 फरवरी को जिसमें इसे करीब 11 हजार 400  करोड़ रुपए का घोटाला बताया गया। यानी घोटालेबाजों के फरार होने के एक महीने बाद सारे पत्ते खोले गए। 

और अब कानून ने क्या किया, कानून कर भी क्या सकता था। नीरव मोदी और मेहुल चौकसी के सारे ब्रांड से जुड़े दिल्ली, मुंबई, सूरत के शोरूम व अन्य संपत्तियां सिल कर दी गई हैं। उनके अकाउंट सिल कर दिए गए हैं। सब मिलाकर रकम हुई करीब 5100 करोड़ रुपए। यानी घोटाले का आधा भी हाथ में नहीं आया। 10 कर्मचारी सस्पेंड किए गए हैं, उन पर केस दर्ज कराए गए हैं। निश्चित तौर पर उन पर कार्रवाई होगी, लेकिन कब जब या तो उनकी मौत हो जाएगी या उनके पास कुछ बताने और लौटाने लायक नहीं रहेगा। 

अभी केस ईडी के पास है, बाद में सीबीआई के पास जाएगी इसके बाद कोई और बड़ी कमेटी, जांच एजेंसी, अफसरों की फौज मुकरर्र कर दी जाएगी। वह भी खूब जांच करेगी और इतनी जांच करेगी कि पूरे मामले का पलीदा निकाल देगी। हजारों पेज की रिपोर्ट कोर्ट में पेश करेगी, जिसमें कुल मिलाकर रिंगा-रिंगा रोजेस खेला जाएगा। गोल घेरा बनाया जाएगा, सारी चीजें घूम फिर कर वहीं आ जाएगी। 

जो नेता अभी कड़ी कार्रवाई की बात कर रहे हैं, वे फिर बैंकिंग नीतियों को सख्त बनाने का दम दिखाएंगे, आमूल-चूल बदलाव की कसमें खाएंगे और दोषियों को किसी कीमत पर नहीं छोडऩे की गीदड़ भभकी देंगे फिर प्रत्यपर्ण कानूनों की दुहाई देंगे और इंतजार करेंगे कि कैसे यह मामला सुर्खियों से हाशिए पर लौटे। 

इसके लिए वे फिर से मंदिर का मुद्दा गरम कर सकते हैं, कहीं दंगा भडक़ा सकते हैं, किसी क्रिकेट मैच में बड़ी जीत के जश्न को राष्ट्रीय उत्सव बता सकते हैं। कोई बड़ी मूर्ति प्लान कर सकते हैं। और कुछ भी, जिससे नेशनल सेंटिमेंट्स बदल जाए,  टीवी चैनलों को प्राइम टाइम पर बहस करने के लिए नए मुद्दे मिल जाएं। इधर से भारतीय और उधर से पाकिस्तानी, अफगानिस्तानी, फिलिस्तिनी एंकर, नेता, रिटायर्ड फौजी गरजने-भभकने लग जाएं। 

और बैंक का क्या होगा बैंक के लिए तो हम हैं ना। हमारी गाढ़ी कमाई, जिसे बैंक में रखने को हम विवश है, वह किस दिन काम आएगी। चुपके से बैंकों को उनकी स्थिति सुधारने के लिए कोई पैकेज जारी किया जाएगा। उसके लिए बैंकिंग सेवा नियमों में बदलाव किया जाएगा। नई-नई फीस लादी जाएंगी, टैक्स में कोई सेज जोड़ा जाएगा। हमारे भविष्य के सपनों को चकनाचूर कर नीरव मोदी, एमी मोदी, निशाल मोदी और मेहुल चौकसी के कारण उजड़े बैंकों के धन सुहाग को फिर से लौटा दिया जाएगा। हमारे खून पसीने से फिर उनकी मांग भर दी जाएगी। 

इस पूरे ड्रामे के बाद एक ही बात समझ आती है कि यह कॉपरपोरेट और सियासत का मिलाजुला खेल है। देश में घोटालों का टी-20 मैच चल रहा है। जिस तरह 2जी घोटाला काल्पनिक करार दिया गया है किसी दिन इसे भी आंकड़ों की गड़बड़ी बता दिया जाएगा। यह घटनाक्रम उस सवाल का सबसे सटीक जवाब है कि क्यों आजादी के इतने वर्षों बाद भी अमीर... अमीर ही होता जा रहा है और गरीब ज्यादा गरीब।

भाजपा-कांग्रेस एक-दूसरे गिरेबां में झांके उससे पहले जरूरी है कि कम से कम एक बार देश की जनता अपने गिरेबां में झांक ले। शायद अब भी यह तस्वीर बदली जा सकती है।


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