आज मातृभाषा दिवस हैं।

By - अंकेश


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अपनी मातृभाषा को प्रेम करना और उस पर गर्व करना उचित ही है। पर जब हम अपनी मातृभाषा पर गर्व करना शुरू करते हैं तब अन्य भाषाओं को उसका प्रतिस्पर्धी मान लेते हैं। 

आज भोजपुरी भाषियों का एक समूह भोजपुरी को हिंदी से इतर एक स्वतंत्र भाषा का दर्जा दिलाने के लिए प्रयासरत हैं। उनका कहना है कि नेपाली और डोंगरी जैसी भाषाएं यदि संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल हो सकती हैं तो भोजपुरी क्यों नहीं ? इसके बोलने वालों की संख्या तो करोड़ों में है। 

पर विडंबना यह है यह समूह भोजपुरी की वकालत भी हिंदी में ही करता है। इन्हे समझना चाहिए कि कोई भी भाषा किसी भी सूची में जगह पाने से ही नहीं बची रहेगी। बल्कि वह तो तभी बची रह सकती है जब वह लोगों के बीच जिंदा रहे।

आज जिस गति से अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय खुल रहे हैं। हिंदी माध्यम केवल सरकारी स्कूलों तक सीमित रह गया है और उनमें भी शिक्षा की पतनशील स्थिति को देखते हुए हुए जब यह समाप्ति की कगार पर खड़े हैं। इस स्थिति में मातृभाषाओं का क्या भविष्य बचता है ? 

आज अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों के अध्यापक वहां पढ़ने वाले बच्चों के अभिभावको से कहते हैं ,‘इसे दूसरे लड़कों के साथ न खेलने दीजिए हिंदी सीख जाएगा, भोजपुरी बोलने लगेगा।’ जहां पर लोग इस गुलाम मानसिकता को ढो रहे हो वहां पर मातृभाषाओं के बेहतर भविष्य की उम्मीद कैसे की जाए ? 

एक समय डॉ० लोहिया ने ‘अंग्रेजी हटाओ’ का आंदोलन भी चलाया था। उस आंदोलन की विफलता  से यह पता चलता है कि हमारे समाज में औपनिवेशिक मानसिकता की जड़े कितनी गहरी है ? आज तो जो स्थिति है उस पर प्रतिरोध का भी कोई स्वर नहीं सुनाई पड़ता । और आज हिंदी भाषा का मुद्दा केवल उनके लिए एक मुद्दा है जिन्होंने साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष को ‘हिंदी ,हिंदू ,हिंदुस्तान’ तक सीमित कर दिया है । भाषा के मुद्दे पर हमारे बुद्धिजीवियों और संस्कृतिकर्मियों की चुप्पी दुर्भाग्यपूर्ण है । 

हमारी भाषाओं की उपेक्षा केवल हिंदीभाषी जन की उदासीनता के कारण से नहीं है बल्कि यह एक साजिश है शासक वर्ग द्वारा , अभिजन समाज द्वारा । इन भारतीय भाषाओं को बरतने वाले समाज को हाशिए पर धकेलने की। 

भाषा की लड़ाई केवल भाषा की लड़ाई नहीं है।भाषाएं तभी सशक्त होंगी जब उसका व्यवहार करने वाला जन समुदाय सशक्त होगा।



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