ये हजारों करोड़ की दुनिया।

By - अमित मंडलोई


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दूरदर्शन पर आने वाला स्वाभिमान सीरियल याद है। उसमें पहली बार बिजनेस फैमिली की अंदरुनी हकीकत दिखाने की कोशिश की गई थी। शोभा डे की इस कहानी के पात्र इतनी सहजता से 200-300 करोड़ की डील करते थे कि दर्शकों की आंखें चौड़ी हो जाती थीं। क्योंकि तब तक अधिकतर लोगों के कानों में...."आज मेरी जेब में पांच रुपए भी नहीं हैं और मैं पांच लाख का सौदा करने आया हूं" टाइप के डायलाग ही गूंजते रहते थे। शोभा डे जैसी ही पटकथा अब सरकारें लिख रही हैं। सीरियल का नाम अब इन्वेस्टर्स समिट हो गया है। आंकड़े भी सैकड़ों से बढक़र हजारों करोड़ तक जा पहुंचे। 

यूपी में बुधवार से इन्वेस्टर्स समिट शुरू हुई है। पहले ही दिन एक हजार से ज्यादा एमओयू साइन हुए हैं। देश के तमाम बड़े उद्योगपतियों ने यूपी में हजारों करोड़ रुपए के निवेश का भरोसा दिलाया है। अड़ानी ने दावा किया है कि वे यूपी में अगले पांच सालों में 35 हजार करोड़ रुपए यानी हर वर्ष करीब 7 हजार करोड़ रुपए निवेश करेंगे। कुमार मंगलम बिड़ला ने 25 हजार करोड़ के निवेश का दावा किया है, जी के एस्सेल  ग्रुप ने 18750 तो मुकेश अंबानी ने 10 हजार करोड़ रुपए के निवेश का वादा किया है। कुल मिलाकर पहले ही दिन 4.25 लाख करोड़ रुपए के निवेश के वचन दिए गए हैं। 

अखबारों के पन्ने पलटकर देखेंगे तो ऐसे ही कुछ वादे इन्हीं लोगों ने वाइब्रेंट गुजरात के लिए किए होंगे। उसके पहले मप्र की इन्वेस्टर्स समिट के लिए भी किए जा चुके हैं और बाकी जिस-जिस राज्य में इस तरह की समिट होती है, वहां भी इसी तरह से जोर-शोर से निवेश का दम भरा जाता है। सारे आंकड़े जोडक़र देखने की कोशिश करेंगे तो पिछले कुछ वर्षों में हुई इन्वेस्टर्स समिट के एमओयू से हम ज्यादा नहीं तो तीन-चार नए भारत बनाने की स्थिति में आ सकते हैं। लेकिन भारत कहां है और अब तक बने क्यों नहीं है, इसका हिसाब किसी के पास नहीं है। 

मैंने रिपोर्टर के रूप में पहली इन्वेस्टर्स समिट इंदौर में वर्ष 2007 में कवर की थी। उसमें भी कोई सवा लाख करोड़ रुपए के कोई 100 एमओयू साइन किए गए थे। 11 वर्षों बाद मुट्ठीभर प्रोजेक्ट भी धरातल पर नजर आ जाएं तो बहुत होगा। कई मामलों में तो एमओयू साइन करने वाले उद्योगपतियों के पते तक फर्जी पाए गए। यानी कोई भी कोट-पेंट पहनकर आया और कंपनी की उल-जलूल फाइलें दिखाकर आपकी फाइव स्टार आवभगत का मजा लेकर भाग निकला। या अफसरों ने ही मंच पर सरकार को ज्यादा उद्योगपति और एमओयू दिखाने के लिए नकली उद्योगपति खड़े कर दिए। इसके बाद भी समिट हुईं और सभी में एक ही राग आलापा गया, निवेश-निवेश-निवेश, लेकिन वह जमीन पर कभी नजर नहीं आया। 

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सरकारें सिर्फ सियासी शोशेबाजी के लिए इन समिट का आयोजन करती आ रही हैं, जिसमें जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा बुरी तरह बहाया जा रहा है। इन एमओयू की आड़ में जमीन की बंदरबांट भी खूब हुई। एमओयू के आधार पर तथाकथित उद्योगपतियों ने लोन भी खूब जुगाड़े और बैंकों के जरिये भी आम आदमी की ही जेबें काटीं। मप्र में इंदौर के बाद ग्वालियर में भी समिट हुई और ऐसी समिट हुई कि आयोजन के बाद एक कंपनी के बड़े अफसर का अपहरण तक हो गया। बड़ी मुश्किल से उन्हें छुड़ाया जा सका। 

यूपी की समिट में एक उद्योगपति ने वहां की सडक़ बेहतर करने, स्किल डेवलपमेंट सेंटर खोलने, छह लाख टन स्टोरेज कैपेसिटी बनाने के दावे भी किए हैं। सवाल यही है कि यदि आप इतने सहृदय हैं और गांव-गांव के लिए इतना कुछ करना चाहते हैं तो अभी तक हाथ पर हाथ धरकर क्यों बैठे थे। जिस दिन वहां बच्चे ऑक्सीजन की कमी से मर रहे थे तब कहां थे। जापानी बुखार जब कोख सूनी कर रहा था, तब कहां दुबके हुए थे। 

देश में अधिकतर लोग अब भी 200-500 रुपए के लिए संघर्ष करते नजर आ रहे हैं। रोजगार के नाम पर सरकारें भी पकौड़ा तलने की सलाह देने लगी है। ऐसे हालात में हजारों करोड़ रुपए के निवेश के ये छलावे नश्तर की तरह चूभते हैं। ये दुनिया अस्पताल में दो रुपए की दवाई के लिए कतार में लगे मरीजों और टूटे-फूटे स्कूलों में भविष्य तलाश रहे बच्चों का मजाक उड़ाती है। हजारों करोड़ की ये दुनिया भाषणों में मिल भी जाए तो क्या है।




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