लघुकथा : मुनिया के बियाह।

By - आकाश कुशवाहा

Credit- youtubefourtun.

आज सुबहे से शम्भू चाचा के दुआरे खटर पटर हो रहा है  बसवारी से हरियर बास काट के लाया जा रहा है आज फुलमतिया भौजी के लड़की मुनिया का बियाह के माड़ो छवाई का दिन है,

गेहूं के पहिला पटवन में ही सगरो सिवान खेत सरसों के फूल से लहलहा रहा है, त कतो जौ मटर आपस मे बतिया रहे है  आम के मोजर जामुन के मोजर को देखकर के मुस्की मार रहा है,फागुन माह होती ही नशीली है धूप छावं से लेकर हवा बयार तक सब नशीली,इस माह कुछ तितलियों के हाथ पीले हो जाते है, तो कुछ फूल कुंवारे रह जाते है, अगले लगन के लिए ,शादी बियाह का लगन अपने उफान पर चरचरा रहा होता है
मुनिया के बियाह का जिम्मेदारी प्रभुनाथ चाचा और परमेशर चाचा पर है,काहे की मुनिया के बाबूजी कलकत्ता चटकल में काम करते थे तो सगरो तनख्वाह दारू पीने में खत्म कर देते थे ,धीरे धीरे लिवर खराब हुआ और मुनिया को पांच बरस और कंचनवा को फुलमतिया भौजी के गोद मे छोड़ चल बसे,
कहते है फुलमतिया भौजी जब गवनहरी आई थी तो अपनी कसैली सा कसल देह सांवर सूरत और ऊपर से ललकी गोराई से मुहल्ला के लोग में धड़कन पैदा कर देती थी, कहते है जब फगुनहट बहता था तो भौजी का आँचल सम्भले नही सम्भलता था।

फुलमतिया भौजी जब अपना दलानी में सिलवट पे मसाला पिसती तो चूड़ी से खनकता संगीत निकलता था, दोपहरिया के समय जात (चकरी) में भौजी सतुआ पिसती तो पूरा मुहल्ला भर सतुआ का महक हो जाता
तब बगल में बैठी बुधन बो कहती..
"ऐ फलाना बो सुनती हो अरे खलिहर सतुवे ही पिसोगी कि कुछ गाओगी भी...
भौजी मुस्कुराती और खूब मन से गाती..

"अपने त गइल रामा पूरबी शहरीया.... से लेकर
 "ये रामा गोरिया के पियवा बहरवा .. गाती तो  मुहल्ले के बुजुर्गों को भौजी के आवाज में भिखारी ठाकुर से लेकर महेन्दर मिसिर तक के दर्शन हो जाता । जब तक भौजी के मरद जिंदा थे तब तक मोहल्ला के ही भौजी रही, फिर मरद के चल बसला के बाद पूरा गांव मुहल्ला से सहानुभूति मिलने लगा , तब से फुलमतिया के नाम के आगे भौजी जुड़ गया, अब पूरा गांव का का छोट बड़ बुजुर्ग सब फुलमतिया भौजी के नाम से ही बोलावे लागल...धीरे धीरे भौजी भी आपन दुख भगवान के खेल समझ के गांव के सब कर प्रेम पाके भुला चलल।

गावँ मुहल्ला में केहूँ  अइसन ना रहे जे कहत होखे की मुनिया एकदम भौजी के छाया ले ले बिया, भौजी मुनिया को बारहवीं तक पढ़ाई भी घर का सारा काम भैस के पखेव बनावे से लेकर चिपरी पाथे तक सब गुण मुनिया के सीखा देले रहली, 
मुनिया भी बस आपन काम से काम रखती, पर एक बार बलेसर चाचा के लड़का गुड्डूवा छेड़ दिया तो साफ बोल दी बलेसर चाचा को बोल दूंगी न ऐसी पिटाई होगी कि चार दिन हल्दी दूध पियोगे तो सब पिरेम का भूत उतर जाएगा।

खैर माड़ो छवाने लगा मुनिया के मौसी ललका रंग  परमेशर चाचा पर फेंकी तो बगल में बइठे अशरफ़ चाचा का सफेद दाढ़ी ही लाल हो गया... कोई रंग से बाकी ना रहा, तो परमेसर चाचा बोले 
"ऐ मुनिया के मौसी सुनती हो बस होली भर रुक जाइये ना फिर दिखा देंगे कि होली का रंग कइसे खेला जाता है,
ना ना ई ना रही  होली तक गोबर माटी से होली खेले खातिर .. बीच मे टोकती हुई फुलमतिया भौजी बोल उठी,
तो अशरफ़ चाचा बोले "  फुलमातो बस मुनिया के चल जायेद फिर  देखीह कइसे होई होली।

कुछ देर बाद प्रभुनाथ चाचा अउर परमेसर चाचा में बतरेस हो गया कि कन्यादान हम करेंगे तो हम करेंगे,तो पास बैठे अशरफ़ चाचा बोल दिए...
" ऐ परमेशर सुनते हो तुम दोनों कहो तो हमही कन्यादान कर देंगे... प्रेम में कैसा मज़हब रे परभुआ,

इहे मुनिया कल चल जाई तो सुबह के चाय खातिर केकरा के आवाज लगाइब हम कहके अशरफ चाचा फफक पड़े उफ्फ.. और तब एक आह से मेरी कलम रुक जाती है  वक़्त बेदर्दी है या मैं ही बदनसीब हूँ जो ये प्रेम भरा मंजर नही देख पाया..

आखिर बियाह का दिन आ ही जाता है और प्रभुनाथ चाचा पियरी धोती और पियरी पगड़ी बांध लेते है कन्यादान के लिए...परमेशर चाचा मुहल्ला के सब लोग को समझा रहे है कैसे क्या करना है..फूलचंद हलवाई अपनी कमेटी साथ पूड़ी सब्जी बनाने में जुटे है तो फुलमतिया भौजी घर के अंदर का सब सम्भाल रही है सब घर आये पहुनी को काम समझा बता रही है, टेंट वाला टेंट लगा रहा है तो लाउडस्पीकर वाला अपना सेटिंग कर रहा है, बबलुआ पिंटुआ दौड़ के दुआर एक बिता खाल किये है खुशी में की बड़की नाच आ रहा है ,
बरात दुआरे लगती है।

छत से गीत चालू है..."आपन खोरिया बोहार ऐ परमेशर चाचा आवतरे दूल्हा दामाद ...से लेकर फिल्मी चित्रहार तक....तो दूसरी तरफ बैंड बाजा में पपूआ नागिन डांस के लिये झगड़ा कर लेता है।

धीरे धीरे रात का कदम बढ़ाती है, कुछ बाराती खाना खा रहे होते है तो कुछ खा के तंबू पकड़ लेते है दूर से नाच के साज ट्रिम ट्राम शुरू हो जाता है पंडित जी माड़ो में अपना पोथी खोल लिए ॐ मंगलम मंगलयम के साथ बिबाह मंत्र शुरू करते है।

आख़िर आता है पानी ग्रहण का समय कन्या के भाई का खोजाई होती है मुनिया का अपना भाई तो कोई था नही... आख़िर कोने में बैठा गुड्डुवा खड़ा हो गया।

"पंडित जी हम करेब पानीग्रहण, और पास बइठे अपने बाबूजी के कंधे से गमछा सर पे रख लेता है तो बलेसर  चाचा का छाती छपन इंच गर्व से चौड़ी हो जाती है गुड्डुवा पाणिग्रहण से लेकर लावा मिलाई तक भाई का फर्ज निभाता है,
साथ फेरों का रस्म होता है  हर एक फेरा  उफ्फ..यही समय होता है जब गुजरती रात  फुलमतिया भौजी मुनिया से दूर हो रही थी और मुनिया कल के उगते सूरज के साथ अपने साजन के घर करीब हो रही थी।

खैर सुबह होना ही था सूरज को निकलना ही था 
मुनिया तो चार दिन से कुहुक कुहुक के रो रही थी आज फुलमतिया भौजी भी मुनिया को गले लगाकर जी भर रो रही थी,  आज मुनिया खातिर मुहल्ला का हर लोग भाई चाचा दादा बाप बनके खड़ा था, ये सब फुलमतिया भौजी के कर्म ब्यवहार का फल था,परमेशर चाचा दुआर पर बराती को बिदाई की तैयारी करा रहे थे तो मुनिया प्रभुनाथ चाचा को देखी तो दौड़कर पैर पर गई,प्रभुनाथ चाचा मुनिया को गले लगा के रो पड़े, रो तो सब रहे थे ,अशरफ़ चाचा मुनिया के माड़ो से लेकर चार दिन तक दुआर ही नही छोड़े थे आज पश्चिम की तरफ़ मुँह करके रो रहे थे।

मुनिया गाड़ी में बैठने को हुई तो गुड्डुवा ने गाड़ी का गेट खोला तो मुनिया गुड्डुवा को देख रो पड़ी और रोते अहकते बोली,

 " ऐ गुड्डु प्रभुनाथ चाचा के संग जल्दी आना दिन रखने...
 तो गुड्डुवा के आँख से आँसू छलकने लगा और फिर मुनिया धीरे धीरे  सबकी आँखों से दूर हो गई ।


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