वेलेंटाइन स्पेशल - अमर प्रेम।


By - आकाश कुशवाहा




किशन जानबूझकर अपनी साइकिल की पैंडील धीरे चला रहा था,
की अचानक पीछे बैठी रधिया बोली

  " ओ साहब.. एक तो आप अंजान हो ,और मैं विश्वास करके आपके साइकिल पे बैठी हूँ

जल्दी घर जाने के लिए , ,इतनी मोटी भारी ना हूँ कि आपसे साइकिल ना चल रही,

हहहहह.... किशन को हँसी आई , चल ही रहा हूँ,

किशन थोड़ा पैडिल तेज कर दिया,

"अच्छा एक बात पूछू.. आपका नाम क्या है,

" राधा नाम है हमरा, घर माँ सब रधिया बुलाते है,

"अच्छा आप बताइए कौन हो पहले तो कभी ना दिखे इधर, रधिया बोली..!

" मेरा नाम किशन है और ...
ओह, तो आप बाबू साहब हो..

किशन भी बात बीच मे काटते हुए बोला,
" पढ़ी कितने तक हो आप !

" मैट्रिक पास हूँ, ..और सुनिए बस अब यही उतार दीजिये अब मैं यहाँ से चले जाऊंगी, 
दो दिन हो गए थे इस बात को,पर रधिया का खूबसूरत चेहरा किशन के दिलों दिमाग से नही उतर रहा था,

वह बार बार साइकिल के पीछे की सीट को  देखता और मुस्कुराता देता।

किशन शहर से पढ़ के गावँ लौटा था, वह रामपुर गावँ के बिधायक सुमेर सिंह के छोटे भाई का लड़का था ,

ट्रेन हादसा में किशन के माँ बाबूजी बहुत पहले चल बसे थे,

किशन को गांव की सादगी और भोलापन भा गई थी,

वह शहर की झूठी बनावटी शान भी देख चुका था,

    एक दिन फिर मौका मिला किशन को...
'राधा....!

रधिया पीछे मुड़ के देखी,

"बाबूसाहब आप...

..किशन मुस्कुराया, बाबू साहब कहना जरूरी है क्या, किशन भी तो बुला सकती हो,

"अच्छा तो ठीक है बोलिये किशन बाबू क्या लेने आये है बाजार में,

"मैं लेने कुछ नही आया हूँ,
"तो...!

"आपको देखने आया था,

"क्या.. अब रधिया किशन को टुकुर टुकुर देखने लगी,

"जो मेरे दिल मे है वो सच बोल दिया ,
दोनों चलने लगें.....

"देखो किशन बाबू मैट्रिक पास हूँ सब जानती हूं इतना तो बापू पढ़ा रखे है , उ जो आपका चचेरा भाई गजेन्द्र सिंह है न सब करतूत मालूम है गांव की बहन बेटियों खा जाने वाली गिद्घ की नजर से देखता है आये दिन कोई ना कोई कारनामा करता है विधायक का लड़का जो ठहरे!

सौ बात की एक बात बोलती हूँ, मैं छोटी जाति से हूँ और आप अपनी जानते है, झूठ का सपना ना देखो न दिखाओ, अब आगे से ना मिलिएगा...

किशन रधिया को जाते देख रहा था,
कुछ दिन यू ही बीते... किशन हर रोज रास्ते में पड़ने वाले मंदिर में अपनी अर्जियां जरूर सुनाता।

शायद किशन के दिल मे रधिया के लिए सच्चा प्यार करवट ले रहा था,

धीरे धीरे रधिया और किशन करीब आते गए,
रधिया के घरवाले जान गए, अब रधिया का घर से निकलना मुश्किल था, गुस्से में रधिया के बापू भी कह गए जल्दी ही तेरी ब्याह करता हूँ,!
पर अब दो दिल रुकने वाले नही थे कोई ना कोई जुगत लगाते मुलाकात की,

 एक शाम फिर मिले..

" किशन..!
"बोलो राधा

"मुझे बहुत डर लग रहा है  जाने  क्या अंजाम होगा अपने इस प्यार का !

"  राधा यकीन रखो मुझपर सच्ची मोहब्बत किया हूँ तुमसे और मरते दम तक करता रहूंगा !

  अब आखिर एक दिन गजेंद्र सिंह को पता चल जाता है अपने चेले चपटो से, और ये खबर गांव के विधायक और किशन के ताऊ सुमेर सिंह तक पहुँच ही गई!

"का किशन ई सब का सुन रहे है बाबू, हमरी नाक कटवाने की बंदोबस्त कर लिए हो का.. ,सुमेर सिंह बोले,
..?

किशन की आंख में कोई डर नही था,
"ताऊ जी हम आपसे बहुत प्यार करते है और इज़्ज़त भी और आप ही सब कुछ हो हमारे,
रही बात रधिया की तो हम उससे सच्चा प्यार करते है, और.....

... किशन...,,,,,,

सुमेर सिंह की आवाज पूरे घर मे मानो गुज उठी,

  "मेरे जीते जी तो ऐसा कभी होगा नही,अच्छा होगा समझ जाओ समाज मे बनाई मेरी इज़्ज़त से खिलवाड़ न करो. .. नही तो।।........

अब कुछ दिन महीने बीतने लगे, रधिया और किशन का प्यार अपने रंग में गहराता गया, आये दिन हर किसी से न किसी से दोनों को अपमानित शब्दों का शिकार होना पड़ता,
तो एक तरफ रधिया के बापू को सुमेर सिंह की धमकी मिलती है कि अपनी लड़की की जल्द से जल्द बियाह कही कर दो जितना खर्च आएगा बियाह में हम दे देंगे,

     फ़िर एक दिन रास्ते में रधिया के सामने अचानक ही गजेंद्र सिंह आ के रास्ता रोक लिया ।
    वह बिल्कुल रधिया के करीब आ गया,
"अरे कहाँ जा रही हो राधा रानी..
" ये क्या बदतमीजी है गजेंद्र बाबू छोड़िये मेरा रास्ता,

" छोड़ देंगे,बिल्कुल छोड़ देंगे, पर प्यार क्या होता है  मुझे भी तुमसे सीखना है बोलो सिखाओगी,।

 " बाबू साहब पहले तो सामने से हट जाओ, और सुनो,और गांव की लड़कियों की तरह डरपोक नही हूँ जो तुम्हारी ये सब बतमीजी सह लुंगी ,और डर जाऊंगी,

थाने में रपट दे दूंगी, सारा प्यार का भूत उतर जाएगा,

"अरे ई देखो हहह.. हमका धमकी दे रही हो हमरा दरवाजा पर पुलिस सलाम ठोकती है ऐ रानी,

...और जैसे ही गजेंद्र रधिया को हाथ पकड़ने की कोशिश किया..

चटाक..... अगले ही पल रधिया का हाथ गजेंद्र के गाल पर पड़ गया...

गजेंद्र गाल सहलाता रह गया..

  " ये जो आज तूने की है न ठीक नही की , ये तेरी जवानी और खूबसूरत चेहरा जिस पर मेरा भाई लट्टू हुआ है न बर्बाद कर देंगे कही मुँह दिखाने लायक नही रहेगी....

  रधिया दूसरे दिन थाने में रपट लिखा दी,दूसरे दिन गजेंद्र माफी नामा लिख दिया, अब आये दिन यही होता

रधिया रपट लिखाती और गजेंद्र माफीनामा , पर गजेंद्र को कोई सजा नही होती...

उधर रधिया को आये दिन माँ से देर रात तक खरी खोटी मिलता...

... कलमुँही तू कही का नही छोड़ेगी हमलोगों को अरे और भी तेरे पीछे दो बहनें है उसकी तो सोच, किसी दिन तेरे बापू को गुस्सा आ गया न तो तुम्हारी गर्दन दबा देंगे,

बन्द कमरे में रधिया दीवार से लगी एक पुरानी राधा कृष्ण की फ़ोटो देखती और मुस्कुराती.....
जब भी मौका मिलता रधिया और किशन मिलते रहते.

एक दिन किशन ने पूछ लिया ..
"राधा...!

   .. तुम मेरे प्यार में कितनी बदनामी सह रही हो,

 "अरे मेरे किशन बाबू मुझे तो और हिम्मत मिल रहा है

पर अब और नही.. अब एक पल भी आपके बिना नही रहना, अब या तो मुझसे शादी कर ही लो या कही दूर ले चलो मुझे जहां प्यार का कोई दुश्मन जहां न हो,..!

" एक बात बोलूं किशन..!

"बोलो राधा...

 अब आपका चेहरा एक पल के लिए मेरे दिल दिमाग से नही उतरता, 

एक एक पल अब आपके बिना जाने क्या होता है जीने में..! मैं सच कहती हूँ अब तुम ना मिले ना तो कही कुछ कर न लूँ मैं,..!

" ऐसी बात फिर दुबारा ना बोलना..; किशन राधा को अपने सीने से लगा के बोला, प्यार में हम मरेंगे जियेंगे साथ साथ, देखना एक दिन सब ठीक हो जाएगा।

   अब किशन भी फैसला कर लिया कि अब राधा के बिना नही रहना जल्द ही शादी करके शहर चले जायेंगे,

         एक दो दिन में किशन सुमेर सिंह से बात करने ही वाला था कि पता चला की रधिया की ब्याह पक्की हो गई, किशन का तो मन पागल हो गया,

एक तरफ रधिया बियाह से इंकार की तो उसके बापू ने बहुत मारा...

दूसरे दिन किसी तरह भाग के किशन से मिली..

" किशन चलो आज ही चलो मुझे ले चलो...
किशन चुपचाप रधिया के गाल होंठ और पीठ को देख रहा था चोट के नीले निशान बता रहे थे कि रधिया पर कल रात क्या गुजरी होगी,
किशन के आखों में आँसू आ गया, क्या प्यार करने वालों को ऐसी सजा मिलती है जिसे ईश्वर ने खुद बनाया।

किशन ने मन ही मन ठान लिया कि अब राधा को लेकर निकलना ही होगा, किशन राधा के लगे हर चोट की जगह पर अपने होठों को रखता गया चूमता गया,

" राधा  हम आज ही रात शहर निकलेंगे, गांव के बाहर वाले मंदिर में कुछ रात गए चलेंगे फिर सुबह होते ही शहर निकल लेंगे।

रधिया ने हाँ कह दी...

दूसरे दिन रात जैसे ही कदम बढाई तो किशन भी बैग लेकर मंदिर की तरफ कदम बढ़ा दिया,
लेकिन होनी को कुछ और मंजूर था गजेंद्र सब कुछ देख और पीछा कर रहा था, मामला समझ वो छिप के रधिया के आने का इंतजार करने लगा, और फिर थोड़ी रात जाते ही रधिया आ गई।

कुछ देर बिता ही था की दोनों के सामने गजेंद्र आ गया वो किशन को परे धकेल रधिया से जबरजस्ती करने लगा।

बीच बचाव में किशन को भी मारने लगा तो किशन भी गजेंद्र को मारने लगा किशन का खम्भे से सर टकरा गया और फट गया, किशन के सर से खून बहता देख रधिया पागल सी हो गई,  एक ईंट उठाई और गजेंद्र को दे मारी और तब तक जब तक वह मर न गया।

"ये क्या कर दी राधा... बिल्कुल अवाक किशन गजेंद्र को देखने लगा।

" तो और क्या करती मैं , मुझे कुछ ना समझ आया तुम्हारे सर का खून देखकर।

"तुम मुझे इतना प्यार करती हो....

जान से भी ज्यादा प्यार करती हूं किशन, मैं कुछ भी नही हूँ तुम्हारे बिना..

तो अभी मुझे एक कसम दो तुमको अपने प्यार का वास्ता...!

बोलो...

ये खून तुमने नही मैंने किया है,  अगर सच में प्यार करती हो तो वादा निभाना और किशन तुरंत ईट को पोछकर साफ कर दिया, मंदिर में शोर सुन पुजारी और एक दो आदमी और आ गए थे..अब भागना व्यर्थ था।

किशन को जेल हो गई... किशन कबुल किया कि ये खून मुझसे हुआ,

थाने में हाल ही नए दरोगा जी आये थे.. मामला समझ रधिया को फिर उसके घर भेजा दिए दरोगा जी ये कहकर की जब तक मामला शांत नही हो जाता इसे कोई कुछ बोला तो सबको जेल में डाल देंगे.

 सुमेर सिंह का दबाव दारोगा पर बढ़ता गया , मगर दरोगा जी बहुत ईमानदार निकले ।
केस मुकदमा सब चल पड़ा , किशन को बीस साल की सजा हो गई ,

इधर रधिया घर से नही निकलती ,कभी निकलती भी तो

लोगो की शब्दों और नजरों से रधिया का रोज बलात्कार होता, अब किशन के बिना एक पल ना जीने वाली रधिया टूट गई थी, एक पल ना जीने वाली बीस साल वो भी उधार की जिंदगी कैसे जीती ?


रधिया मन ही मन ना जाने किस बात की हिम्मत की और पहुँच गई किशन से मिलने..
शायद दारोगा जी प्यार को जाने समझे होंगे अपनी जिंदगी में , वो रधिया को लेडीज कांस्टेबल से चेक करके मिलने की परमिशन दे दिए.

दोनों कुछ इस तरह मिले जैसे जमीं आसमा कभी जुदा ना होने के लिए मिल रहे हो दोनों के आँख से आँसू जुदाई की कहानी कह कह रहे थे.

"कैसी हो राधा,..!

तुम्हारे बिन कैसी हो सकती हूं किशन...
रधिया ने  अपने बालों के जुड़े खोल दी जिसमे से दो पुड़िया गिरा,

"ये क्या है राधा..

सिंदूर है... किशन अभी इसी वक्त मेरी मांग भर दो..

किशन ने कागज की पुड़िया खोल राधा का मांग भर दिया,

"अब मैं तुम्हारी हो गई किशन हमेशा हमेशा के लिए इस जन्म में..और तुम सिर्फ मेरे हुए...

" किशन आपको नही मालूम हम लोगो की प्यार की वजह से आज तक दोनों मोहल्ला जल रहा है वजह सिर्फ हम दोनों है फिर मैं अकेले तुम्हारे बिना कैसे जी लेती...

और दूसरे ही पल एक और पुड़िया खोल मुँह में डाल ली,

किशन को जब तक समझ आता देर हो चुकी थी,  

"ये तुमने क्या किया राधा ...कैसे जियेंगे तुम्हारे बिन तुम ही नही तो मेरा भी जीना किस काम का मैं भी तुम्हारे साथ चलूंगा...

"किशन मैं क्या करती, तुम यहाँ से निकलते नही और मैं तुम बिन जी ही नही पाती, इस लिए ये कदम उठाई,

जमाने की ठोकर कब तक सहती ...
किशन ने राधा को बाहों में लेकर उसके होठों को आज बेतहाशा चूमता गया कुछ कागज में बची जहर को चूम लिया...

जब तक दरोगा साहब जानते बहुत देर हो चुकी थी, दरोगा जी को अचानक अपने टेबल पर एक कागज के टुकड़े पर नजर गई उफ़्फ़ खून से लिखा गया था..दरोगा जी को समझते देर ना लगी रधिया सब कुछ आज सोच के आई थी,

दरोगा जी.....

हो सके तो मुझे माफ कर दीजियेगा मैं अपने प्यार के बिना जिंदा नही रह सकती ,और आपका कानून मेरे प्यार को छोड़ नही सकता जो वो गुनाह किया ही नही, उसकी सजा उसे मिल रही है  गजेंद्र का कत्ल मेरे हाथों हुई थी ,वो तो मुझे बचाने के लिए...  ,

मैं जानती थी आपका कानून मुझे बिना चेक किये किशन से मिलने नही देगी ,इस लिए अपने बालों के जुड़े में सदा सुहागिन और अमर प्रेम की दवा छुपा लाई थी और अब अमर हो रही हूँ।

आपसे एक और बिनती है अगर मेरे साथ किशन भी अमर हुआ तो हम दोनों को जलाइयेगा नही ,दफन कीजियेगा, दोनों का हाथों में हाथ हो ताकि हम जहाँ जाये तो साथ ही जाए,  हम दोनों का सिर्फ शरीर मर रहा है प्रेम तो ईश्वर का रचा वो शब्द है जो अजर अमर है वो कैसे मर सकता है, प्रेम तो हम दोनों का यही फिजाओं में महकेगा।

              दरोगा जी की आँखे भी छलछला गई आँसुओ से, रधिया जैसा चाहती थी दरोगा जी ने ठीक वैसा ही किया, अपने थाने के पास ही एक छोटे से जमीन के टुकड़े में दोनों को बिधि बिधान से दफनाया गया, कार्यवाही तो दरोगा जी पे भी चला की जेल में हादसा कैसे हुआ, पर कानून को सच्चाई समझते देर ना लगी, 

      सुबह खिड़की के पास  बैठे  चाय पीते हुए दरोगा जी की नजर कब्र पे गई दरोगा जी कुछ दिन पहले कब्र पे गुलाब का पौधा लगाए थे ,आज उसमे से दो फूल खिले थे बसन्ती बयार के हवाओं की मौज में दोनों फूल की डाली लचकर एक दूसरे को जैसे गले लगने और चूमने की कोशिश कर रहे थे..... दरोगा जी ने गहरी सांस लिए शायद मन ही मन कह रहे हो  ' सच मे प्रेम अमर है  वो कैसे मर सकता है '.....!!!!

" तीर तलवार ज़हर से इश्क़ कैसे डर जाएगा,
 चाहो तो दबा के देख लो, ये और उफनता जाएगा !!



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