संपादकीय : फार्मूला फिट तो सिनेमा हिट।



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प्रिय फिल्म निर्देशक महोदय ,

सुना है कि आप अपनी जान और प्रोड्यूसर का नाम जोखिम में डाल  कर एक ऐसे ऐतिहासिक पात्र पर फिल्म का निर्माण करने जा रहे हैं जिसके इतिहास का आपको खुद भी पता नहीं है। लेकिन फिर भी आपको ज़िद है कि आप उस ऐतिहासिक  पात्र पर सिनेमा इतिहास की सबसे ऐतिहासिक फिल्म बना कर ही छोड़ेंगे। सुना है कि आप उस पात्र को आज के माहौल के हिसाब से इस कदर ढालेंगे कि फिल्म में उसका आधार कार्ड  और पैन कार्ड भी दिखाया जायेगा।

सुना है कि  उस पात्र के सम्बन्ध में रद्दी बाजार में उपलब्ध सभी किताबें खरीद कर आपने अपने घर के एक कोने में सजा दी हैं और अब आप और आपका राइटर दोनों उनमें से माल चुरा चुरा कर मौलिक कहानी लिख रहे हैं। आपके किताबी चोरी उन्मुख प्रयास देख कर तो यही लग रहा है जैसेकि कोई शोधार्थी पीएचडी के लिए थीसिस लिख रहा हो। ये कहानी पूरी तरह से एक आधुनिक ऐतिहासिक कहानी होगी , ऐसा मुझे विश्वास है। यह भी सुना है कि आपको इस फिल्म के लिए एक फाइनैंसर भी मिल गया है जिसका उज्जवल इतिहास पुलिस की फाइलों में ससम्मान दर्ज है। आपके फाइनैंसर को आमने सामने की मुठभेड़ और शूट आउट का गहन अनुभव है।  उनका यह अनुभव रणक्षेत्र के सीन फिल्माने में आपके बहुत काम आएगा।  

मैं आपको फिल्म की सफलता के लिए शुभकामना देना चाहता हूं  लेकिन किसी फिल्म को हिट कराने में सिर्फ शुभकामना से काम नहीं चलता है।  इससे पहले कि  आप फिल्म निर्माण में प्रोडक्शन से प्रर्दशन तक 'मेक इन इंडिया ' से ' ब्रेक इन इंडिया ' की गति को प्राप्त हों, मैं आपको सफलता के कुछ टोटके देना चाहता हूँ। सबसे पहले तो यह ध्यान रखियेगा  कि फिल्म की कहानी भले ही पहले सीन से एसएलवी रॉकेट  की तरह लॉन्च पैड से उड़ान  भरे और शीघ्र ही ऐतिहासिक तथ्यों के वायुमण्डल से ऊपर निकल जाए, पर फिल्म का शोर ऐतिहासिक फिल्म के नाम से ही मचे ।जहां कहीं भी फिल्म की चर्चा हो , 'क्रिएटिव फ्रीडम' की बात को पिज़्ज़ा पर चिल्ली फ्लेक्स की तरह से छिड़कते रहें। जब मामला थोड़ा थोड़ा उबलने लगे तब फिल्म शूटिंग का काम अपने सहायकों पर छोड़ कर आपको बॉक्स ऑफिस के लक्ष्य को शूट करने पर ध्यान केंद्रित करना है। इसके लिए आपको किसी ऐसी गुमनाम सेना को ढूंढना है जिसके नेताओं को नाम और दाम तथा कार्यकर्ताओं को काम की ज़रुरत हो।

 आजकल किसी बेकार से बेकार फिल्म को हिट कराने का यह ऐसा अचूक फार्मूला है जैसा किसी बंगाली बाबा के पास भी नहीं होता है। एक बार आपने किसी सेना को फिल्म का विरोध करने का स्वरोज़गार दे दिया तो फिर आपकी फिल्म को करोड़ों  की कमाई करने से और आपको इतिहास की ऐसी की तैसी करने से कोई नहीं रोक सकता है। लोग नफरत के नाम पर फिल्म देखने आएंगे।  हॉल से बाहर निकलते वक़्त लोग तुम्हे गालियां देंगे तो ले लेना ,आखिर अंदर जाते वक़्त उन्होंने तुम्हे पैसा भी तो दिया होगा।   


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