सवालिया कागज़।



क्रेडिट - किडनेशन


आठवीं में था। पचास पैसे की औक़ात काफी थी। मैंने डेढ़ महीने में छः दिन कैंटीन में खाने के लिए माँ से पैसे मांगे थे। हर बार ढाई रुपए मिलते थे। उस वक़्त ढाई रुपए का ब्रेड-पकौड़ा आता था। मैंने एक बार भी ब्रेड-पकौड़ा नहीं खाया। वो पैसे सबसे मोटी किताब में दबे रहे। पूरे पंद्रह रुपए, वो भी सिक्कों में।

एक बार montex का पेन खरीदने गया था। बारह की जगह वह दस रुपए का मिलने लगा था। मुझे दुकान पर जा कर पता चला कि दो रुपए मेरे हो गए। पहली बार पैसों की चोरी की। अब कुल मिला कर सत्रह हो गए। एक कागज़, वो पेन, और उन सत्रह रुपए के सिक्कों को जेब में भर कर एक रविवार को मैं साइकिल ले कर सुबह ग्यारह बजे निकल पड़ा। गली के ख़त्म होते ही मंदिर पड़ता था। मैंने सोचा अंदर गया तो किसी की नज़रों में आ जाऊँगा। इसलिए मंदिर की मुंडेर पर मैंने कागज़ बिछा दिया। पेन से उस कागज़ के बीच में उसका नाम लिखा। अंग्रेज़ी में। फिर उसके ऊपर लिखा ''सुनो"। ऐसे ही हिंदी में। नीचे एक सवाल लिखा। सादा सा सवाल, जिसके दो विकल्प भी लिखे - "yes" और "no।

कागज़ पवित्र था, क्योंकि मंदिर की मुंडेर पर था। और  इश्क़ तो पवित्र था ही, क्योंकि मेरा था। दोनों बातें सोचते हुए मैं कागज़ जेब में डाल कर साइकिल से निकल पड़ा था। एक दुकान थी, जिसका नाम था Archies। बात 2006 की है। उस वक़्त मैंने इसका नाम नहीं सुना था। मैं दुकान में घुसा, तो लगा सब ख़रीद लूँ। झालर, झूमर, कप, छल्ले, पायल! एक महिला आईं और उन्होंने पूछा कि क्या चाहिए। मैंने बोला, "कार्ड"! क्यों बोला पता नहीं। उन्होंने जिस तरफ़ इशारा किया था उसी तरफ़ मैं बढ़ गया था।

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जमन्दिन नहीं था। न ही वो माँ थी। बहन भी नहीं थी। मैं "वैसा" कार्ड ढूंढता रहा पर मुझे इन्हीं के कार्ड दिखते रहे। उस महिला ने पूछा,"किसके लिए चाहिए"! मैंने कुछ नहीं कहा। वे भी इश्क़िया रही होंगी, उन्होंने एक कार्ड उठा कर दिया। मेरी आँखें चमक गईं।

वे सब कार्ड बहुत ऊपर थे। मैं बहुत छोटा था। मुझे वही कार्ड भा गया था। पीछे देखा, पर रेट दिखाई नहीं दिया। पूछने पर पता चला तीस रुपए का है। मेरा इश्क़ रो दिया। मैंने बोला, "मेरे पास बीस रुपए हैं"! उन्होंने मुस्कुरा कर एक और कार्ड दिखाया। मैंने कार्ड के भीतर उसी पेन से एक संदेश लिखा। याद है, पर यहाँ नहीं लिखूँगा। फिर वो सवालिया कागज़ उस कार्ड में डाल दिया। उस महिला ने कार्ड को एक लिफ़ाफ़े में डाल कर मुझे दिया। मैंने सत्रह रुपए के सिक्के छनकाते हुए उस मेज पर बिखेर दिए। उन्होंने गिने, और कहा,"बेटा तीन रुपए कम हैं"। मैंने बहुत भीने स्वर में कहा था,"नहीं हैं"! उन्होंने मुस्कुरा के गर्दन हिला दी। मैंने कार्ड उठाया तो उन्होंने पूछा,"कहाँ पढ़ते हो?"

उस सवाल के जवाब में मुझे कहना चाहिए था "डी. सी. मॉडल स्कूल"। पर मेरे मुंह से निकला था "उसी की क्लास में"। उसका घर दूर था। मैं गला सुखाए साइकिल चलाता रहा। पहली बार हाईवे पर साइकिल निकाली थी। डर था। पौने घण्टे में मैं उसके घर पहुंचा था। पहली बार।

उस दिन उसके घर उसके अलावा बस उसकी छोटी बहन थी। हम आठवीं में थे। वो तीसरी में। दरवाज़ा उसी ने खोला था। जब वह अंदर से उसे बुला कर लाई, तो हम दोनों की आंखें फटी रह गईं। उसकी पलकें नहीं झपकी थीं। उसके बाद की बातचीत कभी और सुनाऊंगा। बस बातचीत को याद करते करते ही उस दिन साइकिल वापिस भागने लगी थी। आज कितने साल बाद उसको स्टेशन पर देखा। अब भी वही सब सोचते हुए रेल भागने लगी है।




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