मैं मातृत्व से लेकर माहवारी तक कई जन्म लेती हूँ।

By -  सोनिया सिंह






मानो हड्डी टूटकर बिखरने वाली हो 
मानो अंतड़िया देह को निगलने वाली हो
उदर की पीड़ा हर अंग को निचोड़ने वाली हो
मुख चटक जो पीला पड़ गया
माहवारी का दिन घिर गया
अवकाश दफ्तर का लूँ या घर का?
पीड़ा देही की देखूं या काम करुँ वेतन का?
रक्त की ईक ईक़ बूंद देही की हड्डी तोड़े है
उदर भी यूँ उफने 
जैसे कोई अंदर लावा फोड़े है
पग पग रखकर गर्म पानी से उदर सेके
माहवारी की पीड़ा कोन्हों देखे
काली थैली बिस्तर के गद्दे तले दाबी थी
काम माहवारी के दिनों मे आएगी
लपेट छुप छाप कोन्हों पता
की मोहे माहवारी आयी है!

पुराने कपड़ेे का कत्ततर फाडे
काहे रुपये पैसे भर पाती 
दुकान दार मोहे "ताया " लागे 
मैं कैसे नैपकिन मांग कर लाती 
सत्तर अस्सी नब्बे रुपये मे 
धब्बे मैं छुपा पाती 
कुछ एक दिन की सब्जी का मोल मैं माहवारी मे दे जाती
फल,सब्जी , नमक की लागत ये पांच दिवस ही ले लेते
इसीलिए कपड़े के कत्तर यूँ लपेट प्रयोग किये
दफ्तर मे भी चुप सी बैठी
धब्बे सने काहे उठ पाती 
सहज सहज उदर पीड़ा को कैसे किसीको अवकाश लिए बता पाती
रक्त यही
गर्भ यही
यही से भ्रूण को इंसान बनाती हूं 
वरद गर्भ हर नारी का
दर्द सन प्रसव कर अंग जन्मा पाती हूँ
मैं नारी
मैं मातृत्व से लेकर माहवारी तक 
कई जन्म लेती हूँ 
मरती हूँ और कई बार मारी भी जाती हूं!





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