एक बुज़दिल कविता।

By - पंकज विश्वजीत


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मैंने देखा है
एक मरते हुए शख़्स को
और उसे मरने दिया है
मैंने सुनी हैं चीख़ें
मदद को पुकारती आवाज़ें
और मैं कान दबाये
दूर भागता गया हूँ उन आवाज़ों से
मैंने पन्नें भरने
और सियाही ख़र्चने के अलावा
कुछ नहीं किया है

मुझे यक़ीन है
किसी दिन
यदि वह मरता हुआ शख़्स मैं हुआ
और वो चीख़ती हुई आवाज़ मेरी हुई
तो मेरी ही तरह कोई
अपने कदम वापस खींच लेगा
और घर जाकर लिखेगा
मेरी ही तरह
एक बुज़दिल कविता

क्योंकि इस मुल्क़ में
जैसे को तैसा नहीं, बल्कि
उससे विपरीत
और बदतरीन की रवायत है।




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