जगजीत साहब रूह है बाकि सब गवाईया मैला शरीर।

By - अभय त्रिपाठी

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'तेरी फरियाद','तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो', 'तुमको देखा तो ख्याल आया', एक प्यार का नगमा है , 'चिट्ठी न कोई संदेश कहां तुम चले गए '

जैसी बेहद दिल्लगी और खूबसूरती से भरी ग़ज़ल को गाने वाले और भारत के गजलों के राजा कहे जाने वाले जगजीत सिंह धीमान जी को उनके जन्मदिन की बहुत बधाई, जगजीत जी वो व्यक्ति  हैं जो कभी पेट पालने के लिए कॉलेज और ऊंचे लोगों की पार्टियों में अपनी पेशकश दिया करते थे,जगजीत सिंह ने ग़ज़लों को जब फ़िल्मी गानों की तरह गाना शुरू किया तो आम आदमी ने ग़ज़ल में दिलचस्पी दिखानी शुरू की लेकिन ग़ज़ल के जानकारों की भौहें टेढ़ी हो गई। 

ख़ासकर ग़ज़ल की दुनिया में जो मयार बेग़म अख़्तर, कुन्दनलाल सहगल, तलत महमूद, मेहदी हसन जैसों का था।। उससे हटकर जगजीत सिंह की शैली शुद्धतावादियों को रास नहीं आई। इन पर आरोप भी लगाया गया कि जगजीत सिंह ने ग़ज़ल की शुद्धता और मूड के साथ छेड़खानी की। लेकिन जगजीत सिंह अपनी सफ़ाई में हमेशा कहते रहे हैं कि उन्होंने प्रस्तुति में थोड़े बदलाव ज़रूर किए हैं लेकिन लफ़्ज़ों से छेड़छाड़ बहुत कम किया है।

 जगजीत सिंह ने बतौर कम्पोज़र बहुत पापड़ बेले लेकिन वे अच्छे फ़िल्मी गाने रचने में असफल ही रहे लेकिन कभी हार नहीं मानी,उन दिनों १९८१ में रमन कुमार निर्देशित ‘प्रेमगीत’ और १९८२ में महेश भट्ट निर्देशित ‘अर्थ’ को भला कौन भूल सकता है। ‘अर्थ’ में जगजीत जी ने ही संगीत दिया था।
फ़िल्म का हर गाना लोगों की ज़ुबान पर चढ़ गया था। इसके बाद फ़िल्मों में हिट संगीत देने के सभी प्रयास बुरी तरह नाकामयाबी से घिरे रहे। लेकिन ग़ज़लों में नयी जान फूंकने का कार्य इन्होंने ही किया जगजीत सिंह जी को सन 2003 में भारत सरकार द्वारा कला के क्षेत्र में पद्मभूषण से भी नवाजा  गया।अब करोड़ों सुनने वालों के चलते सिंह साहब कुछ ही दशकों में जग को जीतने वाले जगजीत बन चुके थे। 

जगजीत जी बड़े हंसमुख व्यक्ति भी थे,प्यार परवान की भी बात किया करते थे, उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा कि, मेरा भी बहुतों की तरह पहला प्यार भी परवान नहीं चढ़ सका। अपने उन दिनों की याद करते हुए वे कहते हैं, ”एक लड़की को चाहा था। जालंधर में पढ़ाई के दौरान साइकिल पर ही आना-जाना होता था।

 लड़की के घर के सामने साइकिल की चैन टूटने या हवा निकालने का बहाना कर बैठ जाते और उसे देखा करते थे। बाद मे यही सिलसिला बाइक के साथ जारी रहा। पढ़ाई में दिलचस्पी नहीं थी। कुछ क्लास मे तो दो-दो साल गुज़ारे.” जालंधर में ही डीएवी कॉलेज के दिनों गर्ल्स कॉलेज के आसपास बहुत फटकते थे।

 एक बार अपनी चचेरी बहन की शादी में जमी महिला मंडली की बैठक में जाकर गीत गाने लगे थे। पूछे जाने पर कहते हैं कि सिंगर नहीं होते तो धोबी होते। पिता के इजाज़त के बग़ैर फ़िल्में देखना और टाकीज में गेट कीपर को घूस देकर हॉल में घुसना आदत थी। लेकिन 10 अक्टूबर 2011 को ब्रेन हैमरेज हो जाने से ग़ज़लों के इस राजा के देहांत से मानो ग़ज़लों की दुनिया से एक चिराग बुझ गया हो।








तस्वीर में दिख रहा मानव अभय हैं। इन्होंने नया-नया लिखना शुरू किया है इसलिए खुद को प्रोत्साहित करने में कभी पीछे नहीं रहते हैं । अभय ने ये ठान लिया है कि वो लिखेंगे खूब लिखेंगे और अच्छा लिखकर दिखाएंगें।

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