आखिर पकौड़ा पच्चीसी क्यों हैं ?

By - अमित मंडलोई


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पकौड़ा देश का राष्ट्रीय रोजगार घोषित किया जा चुका है। पहले साहब ने साक्षात्कार में इसकी महिमा का बखान किया और फिर राज्यसभा में अपने पहले भाषण में शाहमुख से इसका वर्णन सुनने को मिला। देशवासियों का रोम-रोम पुलकित है, मन रोमांचित है। सब उस दिन का सपना देख रहे हैं, जब गली-गली पकौड़ों की दुकानें होंगी। लोग फलेंगे-फुलेंगे और तरक्की की नई मिसालें गढ़ेंगे।  तो आइये हम भी पकौड़े पच्चीसी के महात्यम का रसास्वाद करें। 

1. 

एक गांव में एक सुनार रहता था। छोटे-मोटे गहनों की मरम्मत कर देता था। कभी-कभार कोई ग्राहक मिल जाता तो शहर से चांदी के जेवर लाकर टिका देता था। फांके की नौबत नहीं थी, लेकिन दो जून की रोटी से ज्यादा का जुगाड़ भी नहीं था। उसका असली खजाना उसका बेटा था, जो बचपन से बड़ा होनहार था। बिना छत के सरकारी स्कूल में पढ़ता था, लेकिन गणित, विज्ञान, अंग्रेजी से लेकर खेल के मैदान तक में अव्वल आता था। बेटा दिन-दिन बड़ा हो रहा था, उससे दोगुना अनुपात में सुनार के सपने सुनहरे होते जाते। खैर बेटा बड़ा हुआ, शहर गया और एक दिन वहां से उसने वह खबर भेजी, जिसका सुनार को बरसों से इंतजार था। बेटे ने उसे फोन किया, पापा आपके आशीर्वाद से आज मैंने स्टेशन के पास पकौड़ों की दुकान खोल ली है। सुनार को जैसे कोई खजाना मिल गया,  दो-दो रुपए इकट्ठा कर भरी गुल्लक फोड़ कर पूरे गांव में मिठाई बांटी। गांव वाले मिठाई खाते जाते और दोहराते जाते कि हे भगवान जैसी किस्मत इस सुनार की पलटी है, जैसे इसके भाग खुले हैं, वैसे सभी के खुलें। 

2. 

सरकारी बाबू जीवन की बेटी को देखने के लिए लडक़े वाले आए हुए हैं। जीवन बाबू के घर के सभी लोग आवभगत में लगे हैं। तरह-तरह की मिठाई-फल और शर्बत से मेज सजी है। आसपास के लोग भी इधर-उधर से जुगाड़ जमाकर लडक़े को टुकुर-टुकुर निहार रहे हैं। पड़ोस की नानी बोली, लडक़ी एमएससी की हुई है, कॉलेज में फर्स्ट आई थी। उसे तो ऐसा ही घर और वर मिलना था। यह सुनते ही आसपास की महिलाएं भी जुट गईं, पूछने लगीं अरे, नानी ऐसा क्या है। वह बोली अरे तुम्हे पता नहीं है, लडक़ा पकौड़ों की दुकान चलाता है। इतना सुनना था कि पड़ोसी ने अपनी लडक़ी के पीठ पर धौल जमाई। इस कलमुंही को भी कब से कह रही हूं कि पढ़ाई-लिखाई नहीं होती तो कम से कम सोलह सोमवार का व्रत ही कर ले। तुझे भी कोई पकौड़े वाला मिल जाएगा, लेकिन यह है कि मेरी सुनती ही कहां है। कानों में यह शब्द पड़ते ही लडक़ी गंभीर हो गई, मानो उसने निश्चय कर लिया था कि कितना भी कठिन व्रत क्यों न करना पड़े अब तो मैं भी किसी पकौड़े वाले से शादी करके ही रहूंगी। 

3. 

लोन की दरख्वास्त देखते ही बैंक मैनेजर ने पहले लडक़े को ऊपर से नीचे देखा, फिर नीचे से ऊपर की तरफ देखा। चपरासी से चाय-नाश्ता मंगवाया। फिर बोले, हुजूर आपने काहे तकलीफ की। फोन कर देते तो मैं खुद ही आपके घर लोन के रुपए लेकर आ जाता। आप कहते तो साथ में कढ़ाई, गैस, ठेला, तेल-बेसन और मसालों का कोटेशन भी लेते हुए आता। आप देशहित में पकौड़े के ठेले का इतना बड़ा उद्यम लगाने जा रहे हैं। आपकी प्रेरणा से कस्बे के कितने युवाओं का भला होगा, वे भी उद्यम की ओर बढ़ेंगे। आप कस्बे के लिए इतना कुछ कर रहे हैं तो मैं क्या लोन की रकम आपके घर तक नहीं पहुंचा सकता था। कागज-गारंटर की आप फिक्र मत कीजिए आप तो बस पकौड़े की दुकान खोलने की तैयारियां कीजिए बाकी सब मैं देख लूंगा। 

4. 

घर से अचानक बच्चे के रोने की आवाज आई तो मोहल्ले के लोग इकट्ठा हो गए। किसी को कुछ समझ ही नहीं आया। कभी अपने बच्चे को डांटने से भी परहेज करने वाली मिसेज शर्मा आज उसे इस बुरी तरह पीट क्यों रही है। पड़ोस वाले मेहता जी से रहा नहीं गया। बेल बजा ही दी, वे तमतमाते हुए बाहर आईं। सभी लोगों ने पूछा मिसेज शर्मा आप तो इतनी संवेदनशील और मानवाधिकारों की हिमायती हैं, आप बच्चे की पिटाई कैसे कर सकती हैं? मिसेज शर्मा की आंखों से आंसू बह निकले, बोलीं, क्या बताऊं आप सबको। मैं इतने नाजों से इसे पाल रही हूं, लेकिन जैसे-जैसे यह बड़ा हो रहा है, वैसे बिगड़ता जा रहा है। दोस्तों की देखादेखी रोज नई फरमाइशें करता है। अब आप भी बताओ इसके पापा सिर्फ क्लास टू अफसर हैं और इसके दोस्त के पापा पकौड़े की दुकान चलाते हैं। हम कैसे उनकी बराबरी कर सकते हैं। आप ही बताएं हम कैसे इसे समझाएं। पड़ोसी कुछ बोल नहीं पाए। बस इतना कह कर रह गए कि मिसेज शर्मा आपको तो खुश होना चाहिए कि कोई पकौड़ेवाले का बेटा आपके बेटे को अपना दोस्त समझता है। यह सिर्फ इसके लिए नहीं पूरे मोहल्ले के लिए फक्र की बात है। 

5. 

लोग हैरान थे, दास बाबू के घर से पहले किताबें बाहर आईं। फिर कुछ बर्तन और बिस्तरों में लिपटे कपड़े भी भीतर से फेंके गए। जोर-जोर से चीखने की आवाजें आ रही थीं। हिम्मत करके एक पड़ोसी भीतर गया, पूछा दास बाबू क्या हुआ है, क्यों इतना गदर मचा रहे हो। दास बाबू बोले, क्या बताऊं भाई साहब बेटे को इतना पढ़ाया-लिखाया। सोचा था बुढ़ापे का सहारा बनेगा, लेकिन ये निठल्ला ही रह गया। बेटी के रिश्ते की बात आई है, वे 25 लाख रुपए दहेज मांग रहे हैं। मांगे भी क्यों न आखिर लडक़ा पकौड़े का ठेला चलाता है। इसकी मौसी का लडक़ा भी लखनऊ में पकौड़े तलता है। इसे भी ट्रेनिंग के लिए वहां भेजा था, लेकिन ये कमबख्त खाली हाथ लौट आया। कहता है इंजीनियरिंग की है, कोई नौकरी करूंगा। इसे कोई समझाओ की इंजीनियरिंग में कुछ नहीं मिलना है। इतना सुनते ही सारे पड़ोसी गुस्से से भर गए। बेटे को समझाने लगे कि जीवनभर इन्होंने तुम्हारे लिए इतना किया है, तुम इनके लिए थोड़ा बड़ा नहीं सोच सकते, लानत है तुम पर। 

पकौड़ा पच्चीसी में यह पांच प्रतिनिधि कहानियां हैं। कान लगाकर सुनेंगे तो बाकी की 20 आपके आसपास आसानी से सुनाई दे जाएंगी। उन्हें सुनिए, समझने की कोशिश कीजिए और सभी को उनसे प्रेरणा लेने के लिए प्रोत्साहित कीजिए।



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