साम्यवाद।

By - सूरज सरस्वती

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फरवरी 1848 का समय है। इसी वक़्त जन्म होता है एक ऐसे शब्द का जिसने न जाने कितने आंदोलनों को अंजाम तक पहुँचाया। शब्द था "कम्युनिज्म"। इस शब्द के आने से यूरोप में अचानक आतंक मच गया था। ऐसा आतंक जिसने धीरे धीरे क्रांति का रूप ले लिया। 

इस शब्द को धरती विलीन करने के लिए कई शक्तियां एक जुट हो गईं। पोप, ज़ार , मेटरनिख़ ( Metternich), गीज़ो (Guizot), फ़्रांसिसी उग्रवादी और जर्मन पुलिस उनके गुट।

यहाँ दो तथ्य हैं जिन्होंने कम्युनिज़्म को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

1- यूरोप में सभी सत्ताधारियों ने स्वीकार कर लिया की साम्यवाद स्वयं एक शक्ति है।

2 - ये वो समय था जब ये कहा जाने लगा था कि अब साम्यवादियों को सबके समक्ष अपने विचारों , उद्देश्यों और  अपनी प्रवित्तियों को प्रकट करें।

"आज के समय में समाज का जो इतिहास अस्तित्व में है वो सम्पूर्णतया "वर्ग के मध्य संघर्षों का इतिहास है।"

अब इसी वक़्त दो और शब्द निकल के आयें।

बुर्जुआ (Bourgeoisie) वो लोग जिन्हें अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र और राजनीति शास्त्र में मध्य वर्ग से धनवान श्रेणी में आसीन थें। 18 वीं शताब्दी में पूंजी पे नियंत्रण रखने वालों को इस वर्ग में रखा जाता था।

सर्वहारा

साधारण भाषा में वे लोग जो शारीरिक श्रम से अपने जीवन का निर्वाहन करते हैं। औद्योगिक समाज में मजदूरों को इस श्रेणी में रखा जाता था। 

इनके और भी नाम हैं जैसे स्वतंत्र नागरिक और दास , पैट्रीशियन और प्लेबियन , सामंत और भू दास , गिल्ड मास्टर और कमेरा। संक्षिप्त में उत्पीड़क और उत्पीड़ित।

मध्ययुग के भू दासों से प्रारंभिक नगरों के अधिकारपत्र प्राप्त बर्गर पैदा हुयें इन्हीं बर्गरों ( Burghers ) से आगे चल कर बुर्जुआ वर्ग का विकास हुआ।

बुर्जुआ वर्ग ने इतिहास में बहुत ही क्रन्तिकारी भूमिका अदा की है। जहाँ भी उसका पलड़ा भारी हुआ उसने सभी सामंती , पितृसत्तात्मक, सौम्य संबंधों का अंत कर दिया। उनसे मनुष्य को अपने स्वाभाविक श्रेष्ठों के साथ बांध रखने वाले विभिन्न प्रकार के सामंती सम्बन्धों का अंत कर दिया और नग्न आत्मस्वार्थ के "नकद पैसे - कौड़ी" के हृदय शून्य व्यवहार के सिवा मनुष्यों के बीच और कोई सम्बन्ध बाकी नहीं रहने दिया। मनुष्य के वैयक्तिक मूल्य को उसने विनिमय मूल्य से परिवर्तित कर दिया।

एक वाक्य में उसने " धार्मिक और राजनीतिक आवरण के पीछे छिपे शोषण के स्थान पर उसने नग्न , निर्लज्ज , प्रत्यक्ष और पाशविक शोषण की स्थापना की।

बुर्जुआ वर्ग ने परिवार के ऊपर से भावृकता के परदे को उतार फेंका और पारिवारिक सम्बन्ध को एक मात्र धन सम्बन्ध में बदल दिया।

साधारण भाषा में जिस अनुपात में बुर्जुआ वर्ग का विकास होता है उसी अनुपात में सर्वहारा वर्ग का भी विकास होता है। अर्थात सर्वहारा वर्ग तभी तक ज़िन्दा रह सकता है जब तक उनको काम मिलता रहे। उन्हें काम तभी तक मिलता रहता है जब तक उनका श्रम पूंजी को बढ़ाता है। ये मजदूर जिन्हें स्वयं को भिन्न भिन्न प्रारूप में बेचना होता है किसी भी वाणिज्यिक वस्तु की तरह। इसीलिये वो बाजार के हर उतार चढ़ाव और तेजी-मंदी का शिकार होते हैं।

सर्वहारा और कम्युनिस्ट सम्बन्ध

कम्युनिस्ट दूसरी मजदूर पार्टियों के विरुद्ध अपनी कोई अलग पार्टी नहीं बनाती है
समग्र रूप से सर्वहारा के हितों के अलावा इनके और कोई पृथक हित नहीं हैं।

कम्युनिस्ट पार्टियों का तात्कालिक लक्ष्य वही है जो अन्य सर्वहारा पार्टियों का है अर्थात सर्वहारा एक वर्ग में गठन , बुर्जुआ प्रभुत्व का तख़्ता पलटना और सर्वहारा द्वारा राजनैतिक सत्ता का जीत जाना।

* बुर्जुआ से मतलब आधुनिक पूंजीपति वर्ग से अर्थात सामाजिक उत्पादन के साधनों के स्वामियों , उजरती श्रम का उपयोग करने वालों से है।

* सर्वहारा से मतलब आधुनिक उजरती मजदूरों से है जिनके पास अपना कोई उत्पादन का साधन नहीं होता। इसलिये जो जीवित रहने के लिए अपनी श्रम शक्ति बेचने के लिए विवश रहते हैं  ( 1888 में एंगेल्स की टिपण्णी)

लोकतंत्र समाजवाद का रास्ता है।
~ कार्ल मार्क्स

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