संसार की सबसे सुंदर कविताएं लिखी नहीं पढ़ी जाती हैं।

By - अमित मंडलोई

क्रेडिट - गूगल

शाम को घर लौटते धूल-धुसरित मजदूर के चेहरे पर दिनभर के पसीने की रेखाएं शब्द नहीं पूरा महाकाव्य गढ़ते हैं। उसी की स्त्री जब रात को स्नेह से निहारते हुए उसके सामने खिसकाती है थाली तो पूरी सृष्टि उसके लय में आ जाती है। सुबह वही जब पति के लिए पोटली में बांधती है रोटियां और बच्चों को लंच बॉक्स बनाकर देती है। उन्हें स्कूल के लिए ऑटो में बैठातेे वक्त उसकी आंखों से उम्मीदों के छंद झरते हैं। 

किसी घर के पिछवाड़े बर्तन घिसती बुढिय़ा के हाथों की मिटी हुई लकीरें जब बगल में अपने पोते को साहब के बेटे के साथ फुटबाल खेलते देखती है। उस वक्त पेशानी की झुर्रियों के भीतर जो दीया टिमटिमाता है, उसकी रोशनी एक नया विन्यास रचती है। तमाम उपमाएं तब पानी भरने लगती हैं जब सांझ को स्कूल से लौटती बिटियां भैंसों के लिए घास काटती अम्मा को फर्राटे के साथ ए फॉर एप्पल और बी फॉर बॉल सुनाती है। पहाड़े तो उसने भी खूब पढ़े थे, लेकिन जब बेटी टेबल सुनाती है तो न जाने क्यों उसके हाथों में खून की रफ्तार बढ़ जाती है। सांझ को शराब पीकर आए पति के सामने जब बेटा हाथ अड़ा कर खड़ा हो जाता है। उसकी अतुकांत जिंदगी रस में डूब जाती है। 

मंदिर में मन्नत की आस में लगी कतार के बीच हाथ जोड़ते ही जब देव प्रतिमा से कोई फूल गिर जाता है। उठ जाती हैं, उसी वक्त कई आंखें, उनके भीतर नेह का तारतम्य जुड़ जाता है। बाहर बैठे भिक्षुकों की आंखों में भी ठीक उसी वक्त बढ़ जाती है चमक, जब मंदिर से लौटते किसी चेहरे पर वह देखता है, उसी फूल का रंग। खुशबू से सराबोर हो उठते हैं मंदिर के कंगूरे, जब जयकारों में भरोसा गमक ने लगता है। नाचते हैं शब्द जब तालियां गडग़ड़ाती हैं, उछल पड़ते हैं भाव जब घंटे और घडिय़ालों के साथ गूंथ दिए जाते हैं। कर्पूर की लौ में चमकते चेहरे, देवत्व से एकाकार हो उठते हैं, जब दो जोड़ी हाथ बाहर बैठे किसी भूखे की ओर चार रोटियां बढ़ाते हैं। 

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कविता रेगिस्तान में पानी को तरसते, किसी भटके हुए राही के स्वेद कण से उपजी घास की फुनगी पर उगे फूल में खिलती है। तीन साल से कर्ज में डूबे किसान की फसल के साथ लहलहाती है। सूखी नदी के गले लगती है, पहली बारिश में और बाढ़ के साथ उसके आंलिगन में डूब जाती है। खेतों की मेढ़ से जब बहकर निकलती है कुएं के पानी की धार तो धरती में गड़े हर बीज के साथ वह भी उग आती है। कैंसर के इलाज के लिए अस्पताल में लेटी दादी के कान में जब पोती मानस की चौपाइयां सींचती है तो कायनात की सारी विरासत शब्द पा जाती है। हाथ का बोझ लेकर जब दौड़ पड़ता है पोता, दादा की हर डांट से आशीष का छंद निकलता है। उनकी फुर्सत में जब नन्हे कंठ की हुंकार शामिल हो जाती है, जीवन की कविता के एक बड़े अध्याय का सुखद अंत सुनिश्चित हो जाता है। 

शाम को स्टेशन के बाहर पेड़ पर लौटते हैं तोते। इर्द-गिर्द संकोरों में पानी और दाने भरे पाते हैं तो उनके कंठ से खुद ब खुद सुर फुटते हैं। रोटी लेकर गाय के पीछे भागती बहू जब डरते-डरते उसे निवाला खिला देती है, तब उसके चेहरे के सुकून में सारे भाव छलक पड़ते हैं। नतीजों के दिन बेसब्र पिता बार-बार चश्मे की धूल झाड़ते हैं। जब दरवाजे की दराज से भीतर आते अखबार में देखते हैं बेटे की तस्वीर। उसी क्षण आंखों से खुशी बनकर बह निकलती है। सूरज उगता है, डूबता है, चांद आता है और चला जाता है। मौसम, ऋतुएं अपने क्रम में आती-जाती हैं। अपने मन के दरीचे खोलकर हम जब-जब उनसे तुक मिला लेते हैं, जिंदगी के सफहे पर एक नया बंध पाते हैं। 

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संसार की सबसे सुंदर कविताएं लिखी नहीं, बल्कि पढ़ी जाती है। वक्त अपने पन्नों पर क्षण शब्दों के नए-नए पद गढ़ रहा है। बादलों की गडग़ड़ाहट से लेकर बूदों की धार तक से टपक रहे हैं छंद। नदियों की धार के साथ बह रहे हैं पद। कचरे के ढेर में खिलौना पाकर बच्चों के नाच में झूम रही है कविता। बस इन कविताओं को पढऩे के लिए मन की भाषाओं की जरूरत है। रूह के अहसासों की गरज है। उनके साथ तुक हमें ही मिलाना होगा। 

इसलिए कविताओं का जिंदा रहना जरूरी है, क्योंकि उन्हीं के साथ पनीली है मन की धरती और बाकी है जिंदगी में फूलों का सुवास। इंसानियत के रिश्ते और आज से बेहतर सुबह का विश्वास। 





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