कर्नाटक : अमित शाह की कहानी रट्टू तोते की तरह हैं।

By - अमित मंडलोई 




रटने वालों की हकीकत समझाने के लिए मेरे टीचर एक कहानी सुनाया करते थे। एक साधु बाबा थे, जिन्होंने आश्रम में खूब सारे तोते पाल रखे थे। बाबा अकेले थे, इस वजह से तोतों की सुरक्षा को लेकर चिंतित रहते थे। उन्होंने सभी को पढ़ा दिया था कि शिकारी आएगा, जाल फैलाएगा, दाना डालेगा, दाना खाना नहीं और जाल में फंसना नहीं। सारे तोते हरदम दोहराते रहते। बाबा कुछ निश्चिंत हो गए। एक बार किसी काम से वे कुछ देर के लिए बाहर गए और शिकारी ने अपना काम दिखा दिया। बाबा लौटे तो देखा सारे तोते, जाल में फंसे हुए हैं और वही दोहरा रहे हैं। शिकारी आएगा.... दाना खाना नहीं, जाल में फंसना नहीं।

कभी-कभी लगता है कि ये कहानी हम भारतीय मतदाताओं पर पूरी तरह फिट बैठती है। हम सभी सियासी दलों को लेकर लगातार इसी तरह के जुमले दोहराते हैं, लेकिन जैसे ही चुनाव का बिगुल बजता है, सारा तोता रटंत धुल जाता है। ये तोते हमारी विवशता का प्रतिबिंब हैं या हम उनकी कहना मुश्किल है, लेकिन यही हकीकत है। कर्नाटक चुनाव की घोषणा और उसके पहले के एक वर्ष पर नजर डालेंगे तो समझ जाएंगे कि किस खूबसूरती के साथ दोनों ही प्रमुख दल कैसे मतदाताओं पर दाने डाले बैठे हैं। धु्रवीकरण के लिए ऐसे-ऐसे पैंतरे आजमाए जा रहे हैं कि अच्छे-अच्छों का सिर घूम जाए।

भाजपा नव कर्नाटक निर्माण के नाम से परिवर्तन रैली निकाल चुकी है। 75 दिन की इस रैली के जरिये सभी 224 विधानसभा सीटों पर पहुंचने की कोशिश की गई। समापन पर आए प्रधान सेवक ने कांग्रेसी मुख्यमंत्री सिद्धारमैया करारा तीर चलाया। कहने लगे पूरी दुनिया इज ऑफ डूइंग बिजनेस पर काम कर रही है, कर्नाटक की कांग्रेस सरकार इज ऑफ डूइंग मर्र्डर पर काम कर रही है। जो सरकार की आलोचना करेगा उसका मर्डर हो जाएगा। समझ सकता हूं बयान आपके भीतर कैमिकल लोचा कर रहा होगा। सोशल मीडिया पर ट्रोल और देशद्रोही के तमगे याद आ रहे होंगे, लेकिन यही राजनीति है।

साहेब कर्नाटक में यह भी बोल चुके कि हम भ्रष्टाचार और गंदी राजनीति से प्रदेश को मुक्त कराना चाहते हैं। उस समय शायद वे यह भूल गए होंगे कि उनके मुख्यमंत्री प्रत्याशी येदिरप्पा को भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण ही कुर्सी गंवाना पड़ी थी। साहब का कहना है, यह सीधा रुपया सरकार है। कमिशन गवर्मेंट है, जिसका काम सिर्फ अपना हिस्सा लेना है। साहब वहां पर मैसूर से उदयपुर तक हमसफर एक्सप्रेस को हरी झंडी दिखा चुके हैं। 6400 करोड़ रुपए के बेंगलुरु-मैसुर हाइवे प्रोजेक्ट को मंजूरी दे चुके हैं। मैसूर में 800 करोड़ रुपए के सैटेलाइट स्टेशन का भरोसा भी दिलाया है। यानी आचार संहिता से पहले सारी संहिताओं का आचार बनाया जा चुका है।

हालांकि कांग्रेस भी पीछे नहीं है, उसने भी कई बम फोड़े हैं। सबसे बड़ा बम तो भाजपा के लिंगायत वोट बैंक में सेंध की कोशिश है। 84 फीसदी हिंदू आबादी वाले कर्नाटक में 17 फीसदी लिंगायत है, जो भाजपा के वोटर माने जाते हैं। ये लोग लंबे समय से अलग धर्म के दर्जे की मांग करते आ रहे हैं। सिद्धारमैया ने प्रस्ताव बनाकर केंद्र के पास भेज दिया है। अब भाजपा सांप-छछुंदर वाली स्थिति में है। प्रस्ताव मान लिया तो कांगे्रस की जीत मानी जाएगी और टाल दिया तो सरकारी अडंगा।

फिर यहां कांग्रेस पहले से ही भाजपाई अंदाज में काम कर रही है। कन्नड़ अस्मिता का सवाल खड़ा कर दिया गया है। पिछले वर्ष वहां कन्नड़ को लेकर बड़ा आंदोलन चला और मेट्रो से लेकर तमाम साइन बोर्ड से हिन्दी को नमस्ते कर दिया गया। सिद्धारमैया इसके अगुवा रहे और स्टॉप हिन्दी इम्पोजिशन कैम्पेन ने उन्हें हीरो बना दिया। कर्नाटक के युवा मतदाता सवाल खड़े रहे हैं कि आप बताइये कन्नड़ के लिए क्या करेंगे। 4.9 करोड़ में से 15.4 लाख युवा मतदाता हैं।

कर्नाटक के अलग झंडे की मांग को भी सिद्धारमैया मंजूरी दे चुके हैं। यह मुद्दा येदिरप्पा के समय भी उठा था। बताते हैं येदि इसके पक्ष में भी थे, लेकिन कांग्रेस ने ये मुद्दा छीन लिया। सिद्धा साहब को जवाब भी देने की कोशिश कर रहे हैं। भ्रष्टाचार के सवाल पर उन्होंने पूछा है कि यदि इतने पारदर्शी हैं तो बताएं गुजरात के सीएम रहते हुए नौ साल तक लोकायुक्त क्यों नहीं बनाया था। केंद्र से पर्याप्त मदद नहीं मिलने का भी मसला उठा रहे हैं। उनका दावा है कि प्रदेश को 14वें फाइनेंस कमिशन के अनुसार राज्य को तीन साल में 95 हजार 200 करोड़ रुपए मिलना चाहिए, लेकिन मिले सिर्फ 84 हजार 500 करोड़।

प्रदेश में दैवेगौड़ा की जेडीएस भी है, पिछले चुनाव में उसे 20.19 फीसदी वोटों के साथ 40 सीट मिली थी। वोटों का प्रतिशत भाजपा से ज्यादा था, हालांकि सीट उससे 4 कम थी। लोकसभा चुनाव में जरूर 2 सीटों पर सिमट गई थी। कांग्रेस भी 9 पर आ गई थी और भाजपा ने 28 में से 17 पर परचम फहराया था।

बहरहाल इस सियासी पृष्ठभूमि पर चुनावी दंगल अब थोड़ा ऑफिशियल हो गया है और आने वाले समय में नए-नए दाव-पेंच देखने को मिलना स्वाभाविक है। घोषणा को लेकर ही भाजपा घिर चुकी है उनके आईटी सेल प्रभारी अमित मालवीय ने इलेक्शन कमिशन से पहले चुनाव की सही डेट और मतगणना की गलत तारीख जारी कर दी थी। सफाई दे चुके हैं, शाह भी गलती से ही सही येदि को भ्रष्टाचार में नंबर वन भी कह चुके हैं। उधर, तमिलनाडु ने चेता दिया है कि चुनावी झोंक में आकर कावेरी पर कुछ उट-पटांग मत कर बैठिएगा।

कुल मिलाकर शिकारी आ चुका है, जाल डाल चुका है, दाने डाल रहा है, अब कर्नाटक की जनता को तय करना है कि वह किसका दाना खाए और जाल में फंस जाए।







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