बेरोजगारी के प्रश्न पर चले बहस पर टिपण्णी (भाग १).

The indian Express

फेसबुक पर पिछले दिनों बेरोजगारी से सम्बंधित मांग पर लम्बी एवं दिलचस्प बहस चली. क्या हमें रोजगार की गारंटी और रोजगार गारंटी क़ानून दोनों की मांग करनी चाहिए ? क्या रोजगार गारंटी क़ानून की मांग किसी न किसी रूप में सुधारवाद की ओर ले जाता है? यह विवाद PDYF के साथी खूसबू के उस पोस्ट से शुरू हुआ जिसमे कहा गया था कि रोजगार गारंटी कानून नहीं, रोजगार की गारंटी चाहिए. हालाकि इस पोस्ट में किसी संगठन का नाम नहीं लिया गया था लेकिन बिगुल के साथियों को लगा कि यह पोस्ट उनके द्वारा चलाये जा रहे भगतसिंह राष्ट्रीय रोज़गार गारण्टी क़ानून अभियान के खिलाफ है. देखे लिंक

https://www.facebook.com/comkhushboo/posts/1529441983820331

तो रोजगार गारंटी कि मांग पर सहमती है, विवाद यह है कि क्या रोजगार गारंटी के साथ साथ रोजगार गारंटी क़ानून की भी मांग शुरू से की जाये. उसे प्रोपगंडा का मुख्य एजेंडा बना कर लोगो को आंदोलित किया जाए. PDYF के साथी खूसबू के उस पोस्ट से यह प्रतीत होता है कि ये साथी शुरू से यह मान रहे है कि रोजगार कि गारंटी इस पूंजीवादी व्यवस्था में मुमकिन नहीं है. हम देखेगे कि बिगुल के साथी यह मानते है कि रोजगार गारंटी के साथ साथ रोजगार गारंटी क़ानून का मिलना भी इस पूंजीवादी समाज में मुमकिन नहीं है.

लेकिन, जैसा कि साथी अजय सर्वाहारा ने अपनी टिपण्णी में इशारा किया है कि पूँजीवाद में कानून बनाने की जरूरत स्वयं पूंजीवादियों-सुधारवादियों को पड़ती है, चाहे वे कितने भी अप्रयाप्त हो, अगर बेरोजगारी बड़ा मुद्दा बन जायेगा तो पूँजीवादी व्यवस्था के रहनुमा कोई ऐसा लचर कानून खुद ही ला सकते हैं, वोटों के लिए तो वे आखिर कुछ भी कर सकते हैं, आदि, आदि. लेकिन सवाल उठता है कि क्या इससे रोजगार की गारंटी हो जाए गी?   भारत में रोजगार गारंटी योजना संभवतः  सबसे पहले १९६०-६१ में शुरू किया गया गया था और १९६० से २००५ तक विभिन्न बुर्जुआ सरकारों द्वारा कई योजनायें (लगभग ११) नाम बदल बदल कर लागू किये गए.(देखे लिंक http://shodhganga.inflibnet.ac.in/bitstream/10603/183234/7/07_chapter%205.pdf)
हालाकि ये सारी योजनायें ऊंट के मुहँ में जीरा से ज्यादा कुछ भी नहीं थी, फिर भी इन योजनाओं ने  गरीब मिहनतकस जनता  के एक हिस्से  को बुर्जुआ वर्ग और उसके पार्टी के वोटबैंक और  पीछलग्गू बनने और इस बुर्जुआ राज्य के तथाकथित कल्याणकारी छवि बनाए रखने में एक महत्वपूर्ण योगदान दिया. बीच-बीच  में रोजगार के अधिकार को मौलिक अधिकार में शामिल करने की  मांग या उसे संवैधानिक दर्जा दिलाने की मांग भी उठती रही है. 2004 में THE NATIONAL RURAL EMPLOYMENT GUARANTEE BILL, 2004 जब लाया गया तब वाम दलों के समन्वय समिति द्वारा यूपीए को वाम दलों द्वारा एक नोट भेजा गया था जिसमे बिल के खामियों की तरफ सरकार का ध्यान आकर्षित किया गया था. (लिंक देखे https://www.cpim.org/content/problems-rural-employement-guarantee-bill).  
आखिर में वाम दल-समर्थित संप्रग सरकार ने 25 अगस्त 2005 को ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, 2005 ले कर आयी जो आज महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के नाम से जाना जाता है. जाहिर है कि बुर्जुआ सरकार द्वारा पहले से लागू की गयी योजनायें और रोजगार से सम्बंधित क़ानून बहुत ही अप्रयाप्त साबित हुई. इसमें सारे लोगो के लिये बेरोजगार कि गारंटी की बात नहीं थी बल्कि परिवार के एक सदर्स्य के लिए सिर्फ  १०० दिनों के लिए रोजगार देने के लिए  प्रावधान था. साथ ही इसे एक साथ सारे राज्यों में लागू करने का भी प्रावधान नहीं था. क़ानून खामियों से भरा पड़ा था. कहने का अर्थ है कि बेरोजगारी की विकराल समस्या के सामने इस बेरोजगारी गारंटी क़ानून को तो न प्रयाप्त होना था और न ही यह प्रयाप्त था. रोजगारी समस्या को २००५ के क़ानून से हल करने के प्रयास पहले ही एक दिवास्वप्न साबित हो चूका है. ऐसे में एक नए रोजगार गारंटी क़ानून की मांग करना और उससे यह उम्मीद करना की इससे बेरोजगार की गारंटी मुमकिन हो जाए गी, क्या यह लोगो को दिवा स्वप्न दिखाने जैसा है? 
इन परिस्थितियों में रोजगार गारंटी क़ानून और रोजगार गारंटी दोनो की मांग पर आंदोलित युवा वर्ग के मन में प्रश्न उठाना ही था, इस पर से भरोसा उठाना ही था. PDYF के साथी खूसबू ने जब अपने पोस्ट में लिखा कि हमें रोजगार गारंटी कानून नहीं, रोजगार की गारंटी चाहिए तो यह बहुत अस्वाभाविक नहीं था. यह १९६० से चल रहे रोजगार से सम्बंधित मांगो के प्रति एक reaction भी था, भरोसा उठ जाने का प्रतिफल था. संभवतः इस लिए उसने लिखा कि ‘PDYF, PDSF, विमुक्ता और सर्वहारा जन मोर्चा मिलकर यह अभियान चला रहे हैं कि 100 प्रतिशत रोजगार की गारंटी करो और अगर इस पूँजीवादी व्यवस्था में यह नही हो सकता है तो जिस व्यवस्था में यह सम्भव हो उस व्यवस्था की ओर कुच करने के लिए काम करें, संगठित हो और उन तमाम शक्तियों से एकबद्ध हो जो पूर्ण रोजगार वाली व्यवस्था के लिए लड़ रहे हैं यानी समाजवाद और सर्वहारा जनतंत्र के लिए लड़ रहे हैं।‘
साथी खूसबू का यह बयान क्या दर्शाता है? ऐसा लगता है कि साथी खूसबू का पूँजीवादी राज्य द्वारा दिए जाने वाले रोजगार गारंटी  क़ानून पर से तो भरोसा पहले ही उठ गया है और साथ में सरकार द्वारा पूंजीवादी व्यवस्था में 100 प्रतिशत रोजगार की गारंटी उपलब्ध कराने की क्षमता पर भी संदेह है? इसलिए तो वह कहती है रोजगार गारंटी कानून नहीं, रोजगार की गारंटी चाहिए. १९६० से ले कर अब तक सरकारी रोजगार योजानाओं और रोजगार गारंटी क़ानून के इतिहास को देखते हुए सरकार और पूंजीवादी व्यवस्था से भरोसे का उठना गलत नहीं है. यह तो बहुत ही स्क्भाविक है. और सरकार और पूंजीवादी व्यवस्था से भरोसे के उठने की  अभिव्यक्ति शायद साथी खूसबू का व्यक्तिगत नहीं है, यह उनके संगठन के लोगो का, जो लोग उनके साथ जुड़े है, उन सब की  भावनाओं की यह सामूहिक अभिव्यक्ति है.
लेकिन अगर ऐसा है तो यह तो स्वागत योग्य है, सबसे पहले इस भरोसे के उठ जाने का स्वागत किया जाना चाहिय. एक कम्युनिस्ट होने के चलते पूँजीवाद और पूंजीवादी राज्य पर से इस भरोसे के उठने पर उसकी आलोचना करने का क्या तुक है? हम यही तो चाहते है. अगर इस भरोसे के उठने से कोई या सरकार दंड देती है, जेल देती है तो दे. सरकार के डर से क्या हम सरकार और इस पूंजीवादी व्यवस्था पर अपना संदेह करना बंद कर दे? शायद सरकार भी चाहती है कि आप रोजगार गारंटी के साथ-साथ  रोजगार गारंटी क़ानून की  मांग भी करे,  जब आन्दोलन बढे गा तो वो देखे गी कि  वो क्या दे सकती है, कुछ और दे या न दे कम से कम उत्तेजित भीड़ को शांत करने के लिए रोजगार गारंटी को फिर कोई नया क़ानून का लोलीपोप तो दे ही सकती है, लोगो को अपने तरफ खीचने के लिए सरकार ऐसा कर सकती है. पहले भी दिया है. हो सकता है कि सबको लगे कि ऐसा रोजगार गारंटी क़ानून और रोजगार गारंटी का आन्दोलन सरकार और पूँजीवाद के खिलाफ है, लेकिन इसमें एक खामी है. इसमें सरकार के लिय एक अवसर भी दिया जा रहा है क़ानून का लोलीपोप देने का, आंदोलित जनता को शांत करने का अवसर दिया जा रहा है. बेरोजगार युवाओं के आन्दोलन का मकसद रोजगार गारंटी क़ानून नहीं रोजगार की गारंटी है. तो फिर वे अपने आन्दोलन के चरम में सरकार से रोजगार गारंटी क़ानून का लोलीपोप ले कर भला क्या करेगें? और फिर कितना इन्तजार किया जाए ? और आखिर २००६ के क़ानून कि तरह और कितने रोजगार सम्बन्धित क़ानून का लोलीपोप जीतने के बाद हम लोगो को बताये गें कि रोजगार गारंटी क़ानून पास होने के बाद भी इस पूँजीवाद में रोजगार की गारंटी मुमकिन नहीं है? 
लेकिन फिर भी अगर किसी को अब भी इस पूंजीवादी राज्य और पूंजीवादी व्यवस्था पर भरोसा है और वह इन दोनों मांगो- रोजगार गारंटी और रोजगार गारंटी क़ानून- को उठाना चाहता है तो इसका हम विरोध किस आधार पर कर सकते है? उसका भी भरोसा एक दिन टूटे गा ही, इसमें घबराने या नाराज होने की क्या जरूरत है?. अगर किसी का भरोसा नहीं टूटा है तो उस पर जबरदस्ती करने का क्या मतलब है?  लेकिन एक दूसरी स्थिति भी हो सकती है. हो सकता है कि किसी संगठन के कुछ आगे बढे हुए लोगो का इस पूंजीवादी सरकार से भरोसा उठ गया हो, लेकिन उनके साथ जो जनता है उसका भरोसा नहीं उठा हो. ऐसी स्थिति में या तो वे दोनों मांगो- रोजगार गारंटी और रोजगार गारंटी क़ानून- के साथ आन्दोलन में उतरे और साथ साथ इस भ्रम का भी पर्दाफास करे कि क़ानून पास होने से भी क्यों पूंजीवादी व्यवस्था में रोजगार की गारंटी मुमकिन नहीं है, जनता को अपने प्रचार सामग्री में यह बताये कैसे शिक्षित किया जा सकता है? . लेकिन ऐसी जनता को कैसे कहा जाए कि इस पूंजीवादी व्यवस्था में कुछ नहीं मिलेगा? बिगुल के साथी सत्यानारण सोचते है की अगर आप जनता को बोलेंगे कि लड़ेंगे तो सही पर कुछ मिलेगा नहीं तो जनता बोलेगी कि फिर लड़ ही क्‍यों रहे हैं. उनका यह सोचना है कि कम से कम इस बात की सम्भावना तो है कि उनका भरोसा लड़ने के बाद टूट जाए, संघर्ष के दौरान हुए प्रचार से सीख जाए. विगुल के साथी मुकेश असीम ने बहुत ही स्पष्ट शब्दों में साथी खूसबू के साथ बहस में अपने विचार कुछ इस प्रकार रखा है : 
“पूंजीवाद में सबको रोजगार मिलना मुमकिन नहीं, हम सब सहमत हैं| पूंजीवाद विरोधी क्रांतिकारी संगठनों की ओर से उसमें रोजगार की गारंटी मांगी जाये, गारंटी का कानून माँगा जाये, पूर्ण रोजगार माँगा जाये, गरिमापूर्ण रोजगार माँगा जाये, बेरोजगारी भत्ता मांगा जाये, ये सभी तात्कालिक आर्थिक सुधार की मांगें हैं जो पूंजीवाद में कभी पूरी नहीं हो सकतीं| नहीं पूरा हो सकतीं तो एक क्रांतिकारी पार्टी इन्हें मेहनतकश जनता में पूंजीवाद विरोधी राजनीतिक प्रचार और शिक्षा के लिए प्रयोग करती है| 
पर इनमें से गारंटी कानून की मांग ही क्यों सुधारवादी है और इसके विपरीत रोजगार गारंटी, पूर्ण या गरिमापूर्ण रोजगार की मांग कैसे क्रांतिकारी है, इसका कोई तार्किक आधार यहाँ नहीं रखा गया है|”
बिगुल के साथी मुकेश असीम ने बिलकुल स्पष्ट कर दिया है कि पूंजीवाद विरोधी क्रांतिकारी संगठनों की ओर से उसमें रोजगार की गारंटी मांगी जाये, गारंटी का कानून माँगा जाये, पूर्ण रोजगार माँगा जाये, गरिमापूर्ण रोजगार माँगा जाये, बेरोजगारी भत्ता मांगा जाये, ये सभी तात्कालिक आर्थिक सुधार की मांगें हैं जो पूंजीवाद में कभी पूरी नहीं हो सकतीं| अब मतभेद यहाँ यह है कि बिगुल के साथी मुकेश असीम के अनुसार रोजगार गारंटी क़ानून भी पूँजीवाद में नहीं मिल सकता जबकि, जैसा कि साथी अजय सर्वाहारा ने कहा है कि पूँजीवाद में कानून बनाने की जरूरत स्वयं पूंजीवादियों-सुधारवादियों को पड़ती है, चाहे वे कितने भी अप्रयाप्त हो, अगर बेरोजगारी बड़ा मुद्दा बन जायेगा तो पूँजीवादी व्यवस्था के रहनुमा कोई ऐसा कानून खुद ही ला सकते हैं. ऐसा पहले भी भारत के पूंजीवादी सरकार ने क़ानून पारित किया है. इस तरह साथी खुसबू का उस रोजगार गारंटी क़ानून से भरोसा टूट गया है जो यह पूंजीवादी सरकार लोगो को धोखा देने के लिए संघर्ष के चरमोत्कर्ष के दौरान फिर से ला सकती है, जबकि बिगुल के साथी मुकेश असीम का इस बात का भरोसा ही नहीं है कि गारंटी का कानून माँगने पर सरकार दे भी सकती है. और इस लिए बिगुल के साथी मुकेस असीम के लिए यह बहुत स्क्भाविक है कि वे रोजगार गारंटी क़ानून और रोजगार गारंटी दोनों की मांग के साथ जाए. अब अगर बिगुल के साथी मुकेश असीम को भरोसा नहीं है कि रोजगार गारंटी क़ानून इस पूंजीवादी व्यवस्था में मिल सकता है तो वे तो इसी चेतना से ही नियंत्रित होंगे. और क्योंकि उनके अनुसार ये दोनों मांगे पूंजीवाद में कभी पूरी नहीं हो सकतीं इसीलिए तो एक क्रांतिकारी पार्टी इन्हें मेहनतकश जनता में पूंजीवाद विरोधी राजनीतिक प्रचार और शिक्षा के लिए प्रयोग करती है| तो क्या वे इस बात का प्रोपगंडा करेगे कि इस पूंजीवादी व्यवस्था में रोजगार गारंटी और रोजगार गारंटी क़ानून दोनों क्यों नहीं मिल सकता है? साथी खूसबू की मांग के साथ जाने में एक खतरा भी है, ये रोजगार की गारंटी मागं रही है जिसे देना किसी भी पूंजीवादी राज्य के लिए संभव नहीं है और इस लिए आन्दोलन के बढ़ने की स्थिति में यह मांग सीधे राज्य पर प्रहार करने वाला है, कुछ देने के लिए यह मांग राज्य के लिए कोई अवसर ही नहीं देता, इस लिए अगर यह संघर्ष आगे बढ़ता है तो इसके लिए पूंजीवादी दायरे के चौखटे में सीमित रहना सम्भव् प्रतीत नहीं होता है, क्योकि रोजगार की गारंटी पूँजीवाद में संभव हो ही नहीं सकता. इस लिए संघर्ष के दौरान साथी खूसबू के लिए मार्क्सवादी साहित्य के के आलोक में यह प्रचारित करने के अवसर ही अवसर रहेगा कि पूँजीवाद में रोजगार की गारंटी क्यों मुमकिन नहीं है. जबकि बिगुल के साथी मुकेश के लिए यह यह मुश्किल होगा की इस पूंजीवादी समाज में रोजगार गारंटी क़ानून मिलना क्यों मुमकिन नहीं है. उनका या तो पूरा राजनैतिक प्रोपगंडा गड़बड़ हो जाए गा या फिर वे इस मुद्दे पर कोई राजनीतक प्रोपगंडा करने से बचते रहे गे. बिगुल के साथी मुकेस का चुकि भरोसा है कि पूँजीवाद में रोजगार गारंटी और रोजगार गारंटी क़ानून नहीं मिल सकता. इस लिए उनका आन्दोलन इन दो मांगो - रोजगार गारंटी और रोजगार गारंटी क़ानून - के साथ इस भरोसे से आगे बढेगा कि ये दोनों मांगे इस पूंजीवादी व्यवस्था में मुमकिन नहीं है. लेकिन हम जानते है कि आन्दोलन के बहुत तेज होने पर सरकार कभी भी रोजगार गारंटी क़ानून का लोलीपोप थमा सकती है और फिर इस बात की सम्भावना है कि आन्दोलन बिखर जाए, लोग उस प्रस्तावित रोजगार गारंटी क़ानून की खामियों पर बहस में लग जाये. कहने का अर्थ है कि इस बात की अत्यधिक सम्भावना है कि रोजगार से सम्बंधित मांगो के लिए होने वाला बिगुल का आन्दोलन पूँजीवाद के चौखटे से बाहर जा ही नहीं पाए. इस लिए अगर कहा जाए तो जहां रोजगार सम्बंधित मांगो के लिए बिगुल का आन्दोलन पूंजीवादी चौखटे के भीतर सीमित होने के लिए अभिशप्त है वहीं PDYF के साथी खूसबू का रोजगार से सम्बंधित मांगो के लिए चलने वाला अभियान अगर आगे बढ़ता है तो इस बात की ज्यादा सम्भावना है कि उस अभियान को, उनके संघर्ष को पूँजीवाद के चौखट को लांघना पड़े या फिर राजकीय दमन का शिकार होना पड़े, इस बात की ज्यादा सम्भावना है कि उनका संघर्ष मिहनतकस जनता को शिक्षित कर सके कि क्यों पूँजीवाद में रोजगार की गारंटी मिलना संभव नहीं है, और उन्हें लाजिमी तौर पर समाजवाद के लिए संघर्ष के लिए, पूँजीवाद को सम्पूर्ण रूप से उखाड़ फेकने के लिए कमर कसना ही पड़ेगा.
लेकिन हमे पूरा भरोसा है कि बिगुल के साथी देर सवेर इस बात को समझ लेंगे और फिर जो मतभेद है वो दूर हो जाएगा.
Credit - यह लेख MK आजाद जी के फेसबुक वाल से साभार है.

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