जनता के पास वे पत्रकार बहुत कम हैं जो जनता की फरियाद सुनते हों।




आज जब कोई अपने को पत्रकार कहता है तो सामने वाले को बहुत अधिक प्रभावित नहीं कर पाता। खास कर बात यहां सामान्य लोगों की हो रही है। लोग अपने बच्चों का भविष्य बहुत कम ही पत्रकारिता में देखते हैं। अपवाद को छोड़कर। पत्रकारिता में आये छात्रों से आप मिलिए उनसे पूछिये कैसे आना हुआ? बोलेंगे अपनी मरजी से आया हूँ। माँ-पापा नहीं चाहते थे। कुछ पत्रकारिता प्रोफेसर बनने के लिए करने चले आते हैं। प्रोफेसर न हो पाने पर पत्रकार ही हो जाते हैं। सोचते हैं जहां पेड़ न रुख हुंआ रेणय महापुरुष।

असल में दिन प्रतिदिन पत्रकारों की अहमियत बढ़ रही है लेकिन उसी अनुसार पत्रकारीय फ्रस्टेशन और अविश्वास भी। पहले के पत्रकारों को जनता अपना फरियाद सुनाती थी लेकिन आज जनता के पास वे पत्रकार बहुत कम हैं जो जनता की फरियाद सुनते हों। पत्रकार जनता की वही फरियाद सुनते हैं जिसमें उनका या उसके चैनल का लाभ है। यानी TRP । अखबार भी वही मुद्दा उठाते हैं जिसमें उनकी अपनी राजनीति फिट होती है। पत्रकारिता में आज बड़े स्तर पर व्यापार हावी है या उसकी अपनी राजनीति या उसका अपना प्रोपेगेंडा। 

लेकिन इन्ही के बीच कुछ अखबार और TV चैनल अभी अपने को बचाये रखे हैं। समाजिक सरोकार को बचाये रखे हैं। वो व्यापार के तेज झकोरों को झेल रहे हैं लेकिन पत्रकारिता कर रहे हैं। आज तमाम युवा पत्रकारों की उम्मीद भी वही बने हैं और जनता की उम्मीद तो हैं ही।

अगर बात रवीश कुमार की करें तो हम साफ देखेंगे और पाएंगे कि वह आदमी हिंदी tv मीडिया को किस तरह बचाये रखा है। लगभग 27 एपिसोड यूनिवर्सिटी पर किया गया। तमाम यूनिवर्सिटी सकते में आ गईं कि कहीं हमारे छात्र कोई वीडियो बनाकर भेज न दें। तमाम यूनिवर्सिटीज की हालत दिखी भी नहीं दिखी हो तो यूट्यूब पर है देखिए। आखिर 27 प्राइम टाइम किस न्यूज चैनल में करने की हिम्मत है? जो मजा न्यूज रूम में न्यूज गढ़ने में है वो कहाँ घूम-घूम खबर खोजने में। कुछ बदलने में।

अब वही रवीश कुमार बेरोजगारी पर प्राइम टाइम करना शुरू किया तो सरकार सकते में आ गई। 4 साल पूरे कर लेने वाली, हर साल दो करोड़ युवाओं को रोजगार देने वाली मोदी सरकार मुह छिपाने की जगह खोजने लगी न मिलने पर तरह तरह से गेम खेलने लगी। आईटी सेल को लगा दिया गया, रवीश को रोको। रवीश को जबतक रोका जाता आईटी सेल के वाहक बेरोजगार युवा रोड पर आ गए। SSC को घेर लिया। दिल्ली से शुरू हुई बेरोजगारी की कहानी पूरे भारत में फैल गई। जिस रास्ते से आईटी सेल का मैसेज सप्लाई हो रहा था उसी रास्ते यूट्यूब से रवीश का प्राइम टाइम थोक में सप्लाई होने लगा। सच समाने आ गया। सच वीभत्स था। रूम में रोजगार के लिए लूसेन्ट से जद्दोजहद कर रहा प्रतिभाशाली बेरोजगार युवा अपनी प्रतिभा को मारने वाले रावण को खोजने लगा। खोजते-खोजते वे तमाम युवा आज सड़कों पर आ गए। दिल्ली से लेकर उत्तर-प्रदेश तक। उत्तर-प्रदेश से लेकर बिहार तक। बिहार से लेकर पता नहीं कहाँ से कहाँ तक के युवा अभी उस रावण को खोजेंगे। लेकिन जबतक उसकी तलाश पूरी नहीं हो जाती यानी जवानी, रोजगार, प्रतिभा चबाने वाला रावण नहीं मिल जाता तबतक सड़कों पर ही। तबतक  होली दीपावली सब सड़कों पर ही।

ये है समाज में बदलाव लाने वाली पत्रकारिता की ताकत। इसी का सपना सजाये तमाम युवा आज पत्रकार बनना चाहते हैं। सत्ता से लड़ना चाहते हैं। जन के लिए लिखना चाहते हैं जन के लिए लड़ना चाहते हैं।




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