महिलाओं की चुप्पी और फिर चुप्पी के बाद उपजे क्रोध का विश्लेषण: शमी-हसीन जहां मामला।

By - संकर्षण 


Credit - Indiatimes.com


क्रिकेटर के बागों में भी ऐसी बहार होती है, ऐसा चिंतन के स्तर पर तो समझते थे मगर कभी देखे-सुने-पढ़े न थे। टीम इंडिया के पूर्व के धाकड़ गेंदबाज और अभी के स्टैंड बाय या 'आया राम - गया राम' टाइप गेंदबाज शमी क्रिकेट के पिच पे भले ही बदरंग साबित हुए हो मग़र घिनौनी अय्याशी की पिच पे उनके रंगीनियत अब किसी व्हाट्सअप चैट, स्नैप चैट की मोहताज़ नही।

कुछेक महीने पहले जब क्रिकेटर मोहम्मद शमी ने अपनी पत्नी संग बिना हिजाब के फ़ोटो डाला था तो लोगों ने उनकी प्रगतिशीलता को हाथोंहाथ लिया था मानो सऊदी अरब के प्रिंस के वो कोलकाता संस्करण हो। शमी की प्रगतिशीलता की ज्वाला अभी ठंडी न हुई थी कि उनकी बेगम साहिबा ने उन पर 72 हूरों के संग इश्क़ फ़रमाई का ज्वालामुखी आरोप चिपका दिया। 

नारियों से सम्बंधित मुद्दे उठाए जाने पर कुछेक लोग जो ये कहते है कि ये गुजरे जमाने की बातें है, हाल-फ़िलहाल तो नारियां एकदम पुरुषों के संग कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है। उन्हें हसीन जहां के इस अविलम्बित विद्रोह से महिलाओ की वर्तमान हालत का सबब समझना चाहिए। जब इतनी पढ़ी-लिखी, ऊंचे रूतबे वाली महिला दो बरसों तक जुल्म को सहती है ओर फ़िर जब ज़ुल्म की इंतहा हो जाती है तो वो एकदम से पब्लिकली मीडिया में आकर अपनी बात रखती है। तो ऐसे में एक सामान्य महिला को आप अभी कैसे सशक्त कैसे कह सकते है, वो तो इन जुल्मों के साये में जिंदगी गुजार देती होगी।

हसीन जहां के पास शमी के जिन अश्लील संदेशों, अश्लील सोशल एकाउंट की कई पन्नों की पोथी है, वो उसे भी केवल उन चैटों का दस फीसदी बताती है। उनका कहना है कि मियां साउथ अफ्रीका के टूर से वापिस लौटने से पहके दुबई में एक स्टे ले लेते थे। ऐसे में उन्हें शमी की इन काली करतूतों का काला चिट्ठा उसकी कार ड्राइविंग सीट के नीचे इंतफाकन मिल जाता है। अब अगर उन्हें ये ठोस सबूत न मिलता तो उन पर किया जाने वाला अत्याचार बदस्तूर जारी रहता है। 

शमी तो उन्हें तलाक़ देने की धमकी भी देता था। ऐसे में अगर कुछ और समय तक हसीन चुप रहती तो उनका भी हाल शाह बानो जैसा हो जाता। वो भी किसी भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन जैसे मंच के तहत अपनी बात रखती। 

अगर महिलाओं के खिलाफ़ होने वाले इन धोखों या अपराधों  की जड़ में जाएं तो एक बात साफ है कि इन सबके सामान्य तौर पर चलते रहने का कारण महिलाओ की चुप्पी है। और ये चुप्पी भी उनके द्वारा घर-परिवार यानि मायके से सिखाये गए उन संस्कारो के बरक्स है जो उन्हें ये कहते है कि लड़की अपनी ससुराल डोली में जाती है मगर वापिस वहां से अर्थी में ही आती है मने कितना भी कष्ट हो ससुराल में, चुपचाप मन मे ही घोंटते रहो। 

इसलिए लड़कियों के पालन-पोषण के स्तर पर ही ऐसी कंडीशनिंग देनी चाहिए कि वो मजबूत बने और जीवन के हरेक मोड़ पे ऐसे फ़ैसले ले सकें जो उनके जीवन को खुशहाल और सुरक्षित बना सकें। वर्ना फ़िर एक हसीन जहां के मजबूत कदम पर पीठ थपथपा के खुश हो जाएंगे और अगले दिन फ़िर हजारों हसीन जहां जैसी दबी-कुचली-सताई गयी लड़कियों की कहानियां सुनने को मिलेंगी।






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