ये जकरबर्ग से न हो पाएगा।







फेसबुक से डाटा लिकेज को लेकर पूरी दुनिया में करीब एक हफ्ते से घमासान मचा हुआ है। कैम्ब्रिज अटलांटिका द्वारा करीब पांच करोड़ फेसबुक यूजर का डाटा चोरी कर अमरीकी चुनाव में इस्तेमाल करने की खबर पिछले शुक्रवार को ब्रेक हुई थी। इसने दो दिन से भारत में भी सियासी तूफान खड़ा किया हुआ है। हालांकि हम भारतीयों को इस बात की बहुत ज्यादा चिंता करने की जरूरत नहीं है। फेसबुक का डाटा चोरी कर कितनी भी अडंग-बडंग खबरें हमारे दिमाग में घुसाने की कोशिश की जाए। कोई खास फर्क नहीं पडऩे वाला है। क्योंकि नतीजे पलटने के लिए हमारे पास इनसे कहीं ज्यादा प्रभावी नुस्खे और आजमाए हुए पुश्तैनी पैंतरे हैं। 

इस मामले में अफवाह हमारा सबसे कारगर हथियार है। आप फेसबुक पर एक पोस्ट डालिए, जितनी देर में वह 100-150 लोगों तक पहुंचेगी, उससे कहीं तेजी से एक अफवाह पूरे शहर के हर कान में ठूंसी जा सकती है। अफवाह के इस हथियार से आप बड़े से बड़े काम करा सकते हैं। बस्तियां जलाई जा सकती हैं, धर्मस्थलों को नुकसान पहुंचाया जा सकता है, किसी की हत्या की जा सकती है और मुंडन कर प्रेमी-प्रेमिकाओं का जुलूस निकाला जा सकता है। जंगल की आग भी हमारी अफवाहों के आगे घुटने टेक देती है। ज्यादा पीछे मत जाइये, कुछ महीनों के घटनाक्रम ही खंगाल कर देखेंगे तो अफवाह की ताकत समझ जाएंगे। वह अफवाह ही तो थी, जिसने किसी और विवाद में हुई हत्या को देशभक्ति के नारे लगाने का प्रतिकार साबित कर दिया था। टिफिन और फ्रिज में बीफ का भरोसा दिला दिया था। ट्रेन में बर्थ की लड़ाई सांप्रदायिक हो गई थी। 

फिर खाप पंचायतें सारी समझ और सूचनाओं पर भारी है। सरपंच जी, प्रधान जी, बड़े भैया, नेताओं को भरोसा दिला देते हैं और पूरे गांव के वोट एक कतार में लग जाते हैं। देना है या नहीं देना है और देना है तो किसे देना है, यह तय करने का हक आखिर है कितने लोगों के पास। हमारे यहां वोट से पहले जबान दी जाती है, मूंछ का बाल रख दिया जाता है। पगड़ी की कीमत होती है। खानदानी अहसान होते हैं, जिन्हें पुश्तों तक निभाना होता है। जो अपनी आवाज उठाने की कोशिश करते हैं, उनके हश्र इतिहास तो दूर अखबारों में भी नहीं छपते हैं। बहुत ज्यादा नहीं बस दारू और मुर्गे की पार्टी, कंबल और चंद मुड़े-तुड़े नोट में जनमत बदल जाता है। नौकरी का भरोसा, खेत तक पानी की नहर, पक्की सडक़, स्कूल, कॉलेज, अस्पताल तक अभी बात ही कहां पहुंची है। 

इनसे बच जाइयेगा तो फिर हकीम लुकमान से भी कारगर सियासी पैंतरे तो हैं ही। हवा बदलते देख ही कोई किसी बस्ती में चंद कागज फेंक आएगा और आधी रात को ही बस्ती जलते हुए झोपड़ों से रोशन हो उठेगी। बेघर हो जाएंगे बच्चे और उस पर मरहम की सियासत होगी। किसी धर्मस्थल पर चुपके से कोई एक नारा लिख देगा और पूरे गांव की तकदीर बदल जाएगी। पुश्तैनी दोस्ती और रिश्ते एक पल में हवा हो जाएंगे। बिखर जाएगा अदब और आदर लाठी, गोली और तलवारें निकल आएंगी।

ये भी न हुआ तो फिर किसी मूर्ति पर रंग पोत देंगे। चश्मा उखाड़ देंगे, जूतों की माला पहना देंगे। उसके बाद उन्हें कुछ नहीं करना होगा। जो कुछ करेगी वह भीड़ ही करेगी। वे तो बस मजमा जमने के बाद उसकी पीठ पर भाषण की धौल जमाएंगे और पूरी सियासी जलवायु बदल जाएगी। लोग बंटेंगे, छंटेंगे, कटेंगे और वे उन्हें समेटकर पॉलिंग बूथ ले जाएंगे। उनकी अंगुलियों पर निशान लगवाएंगे और यह भ्रम बनाए रखेंगे कि वोट उन्होंने दिया है। 

बस इतना ही तो करना होता है हमारे यहां। इससे ज्यादा क्या कराएंगे। बाकी जो काम बचता है वह 24 घंटे चलता है। कथा-पुराण, मजलिस और भंडारों के साथ डर परोसे जाते हैं, आबादी नहीं बढ़ाई तो अपने ही घर में अकेले रह जाओगे। ज्यादा पढ़ाओगे बच्चों को तो भाग जाएंगे, वक्त पर हथियार नहीं उठा पाएंगे। विधर्मी सेनाओं के मुकाबले के लिए तैयार होना होगा। ये जहालत परोसने के लिए किसे फेसबुक के डाटा की जरूरत है। यह तो हम वैसे ही बखूबी कर रहे हैं और इन्हीं के खूंटे से बांध रखी है लोकतंत्र की भैंस। वह वहीं पगुरा रही है। 

आप पूछते रहिये सवाल किसे फर्क पड़ता है। कंपनी के अफसर ही चीख रहे हैं, कांग्रेस क्या हमने तो भाजपा और जदयू के लिए भी काम किया है। फिर भी डाटा चोरी कर अमरीका के नतीजे प्रभावित किए जा सकते हैं। फ्रांस, जर्मनी और इटली में भी इस तरह की साजिश की जा सकती है, ब्रेक्सिट में भी इसका इस्तेमाल हो सकता है, लेकिन हमें कोई खतरा नहीं है। डरिये मत वे ऐसा कर के उटपटांग खबरें ही चलाएंगे ना। उन्हें पता नहीं है कि पूरी दुनिया में कोई है जो यह काम हम से बेहतर कर सकता है। 70 साल से यही तो कर रहे हैं।




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