पश्चाताप करो कि आपने लेनिन की प्रतिमा तोड़ दी!

By - त्रिभुवन

Credit - Aajtak


हद है! अरे आपने तो त्रिपुरा के बेलोनिया  कॉलेज स्क्वेयर से उसी लेनिन की प्रतिमा ढहा दी, जिसके रास्ते पर आप चल ही नहीं रहे, बल्कि दौड़ रहे हैं। क्या कहा? वह विदेशी था? कम्युनिस्ट था? और आपकी और उसकी राहें अलग-अलग थीं।

अब विदेशी-विदेशी छोड़िए, जरा समझिए तो सही। वह लेनिन ही तो था, जिसने वह राह निकाली थी, जिस पर चलने के लिए आप छटपटा रहे हैं। आप आज भारत को वन पार्टी हिन्दू स्टेट बनाने को छटपटा रहे हैं और लेनिन ने ही तो सोविएत यूनियन को वन पार्टी कम्युनिस्ट स्टेट बनाया था। इसे रशियन कम्युनिस्ट पार्टी गवर्न करती थी और भारत को आजकल आपकी पार्टी गवर्न कर रही है! 

और वे भी लेनिन ही थे, जिन्होंने कहा था कि एक झूठ बार-बार बोलते जाओ तो वह सच हो जाता है, जैसा कि आजकल हो ही रहा है। लेनिन ने यह भी कहा था कि एक छोटे से पिस्टल से आप सौ लोगों को कंट्रोल कर सकते हो और इसका ठीक से इस्तेमाल करो। आप आजकल एक सेलफोन से हजारों लोगों को कंट्रोल कर रहे हो। 

लेनिन ने कहा था कि मुझे सिर्फ़ चार साल आप अपने बच्चे हर रोज़ कुछ देर के लिए सौंप दो। मैं उसमें ऐसा बीज बो दूंगा कि वे आधी सदी से जमी-जमाई सत्ता को उखाड़ फेंकेंगे। और आप भी तो यही कर रहे हैं। इसी राह पर चले हैं। और नतीजे भी ठीक वैसे ही हैं, जैसे लेनिन ने निकाले थे। 

आज श्रीमान् आपके पास देश भर में 5000 से ज्यादा पूर्णकालिक प्रचारक और इतनी सारे क्षेत्रों में काम करने वाली संस्थाओं का जो विशालकाय जाल फैलाकर संघ परिवार का निर्माण किया है, संगठन के उस थॉट के जनक वलादिमिर इलियिच लेनिन नामका व्यक्ति ही था। सारे के सारे कम्युनिस्ट हॉलटाइमर कहां से आए? आपने उन्हीं से पूर्णकालिक प्रचारक की थियरी ली। आपने कम्युनिस्ट संगठनों की हूबहू नकल करके ही तो अपना संगठन खड़ा किया है। और आज जो आपके पन्ना प्रमुख और बूथ कवर करने की थियरी है, वह पुराने मार्क्सवादी नेताओं के जीनियस माइंडसेट की ही तो उपज है, जिसे आप बहुत प्रभावशाली ढंग से लागू कर रहे हैं और मार्क्सवादियों की नामाकूल संतानें कोरी लफ्फाजियां कर रही हैं। भगवान् राम ने भी मरते समय रावण के बौद्धिक प्रभामंडल का सम्मान किया था और लक्ष्मण को उनसे सीखने और उन्हें अंतिम प्रणाम करने को कहा था। इसलिए कृतघ्नता का स्तर इतना भी नीचे नहीं जाने देना चाहिए प्रभु! 

एक और बात जो है तो लेनिन की, लेकिन लगता है उसे भारतीय कम्युनिस्ट सरकारों और उनके नेताओं से कहीं अधिक सटीक ढंग से आपने लागू किया है। लेनिन ने कहा था, दॅ बेस्ट वे टू डेस्ट्रॉय दॅ कैपिटलिस्ट सिस्टम इज टू डिबाउंच दॅ करंसी! बताइए, आप इस पर अक्षरश: नहीं चले हैं क्या? 

और आपकी केंद्र में सरकार आने के बाद आपने जो फ़ैसले लिए हैं, उससे तो यही लगता है कि लेनिन को आपने ही कम्युनिस्टों से ज़्यादा समझा। लेनिन ने कहा था : दॅ वे टू क्रश बॉर्ज्वीज इज़ टू ग्राइंड देम बिटवीन दॅ माइल स्टॉन्स ऑव टेक्सेशन ऐंड इन्फ्लेशन। वे त्राहिमाम्-त्राहिमाम् भी करते रहेंगे और आपसे उनका प्रेम भी बढ़ता जाएगा! और एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात जो लेनिन और आपमें साम्य दिखाती है, वह उनका यह कथन है : कम्युनिज्म इज सोविएत पावर प्लस दॅ इलेक्ट्रिफिकेशन ऑव दॅ हॉल कंट्री! अपने समादरणीय मोहन भागवत भी तो जो कहते हैं, उसका मर्म यही तो होता है : हिन्दुत्व ही भारतीय शक्ति है, जिसके माध्यम से हमने पूरे देश की धमनियों में बहते रक्त का इलेक्ट्रिफिकेशन कर दिया है। 

लेनिन भले सोविएत रूस की सत्ता में कितने ही ताक़तवर हो गए थे, लेकिन वे इतने सहज और साधारण थे कि उनकी सादगी किसी असामान्य हस्ती का बोध नहीं होने देती थी, जैसा कि आपके बहुतेरे स्वयं सेवक भी करते हैं। उनके हृदय में जार के प्रति वैसी ही अग्नि धधकती थी, जैसी कि आपके मनों में कांग्रेस के प्रति धधकती है। वे मार्क्स, एंगल्स और निकोलाई चेर्निशेव्स्की से वैसी ही मुहब्बत करते थे, जैसी आप हेडगेवारकर, गुरु गोलवलकर और दीनदयाल उपाध्याय के प्रति ममत्व रखते हैं। लेनिन ने मार्क्स की तरह कभी धर्म की आलोचना नहीं की और न ही कभी उसे अफ़ीम बताया।आपकी ही तरह लेनिन भी कभी अपनी ग़लतियों को सार्वजनिक तौर पर स्वीकार नहीं करते थे। मार्क्स ने कभी नहीं कहा था कि पार्टी बनाओ और सत्ता पर कब्जा कर लो, लेकिन लेनिन ने पार्टी बनाई और मार्क्सवाद को एक नया बुर्का पहनाकर राष्ट्रवादी बना दिया। ठीक वैसे ही जैसे आपने हिन्दुत्व के साथ किया है। तुलसीदास हों तो आपके हिन्दुत्व को देखकर फूटफूट कर रो पड़ें, जैसे मार्क्स भी अपने इस शिष्य और माओ के कारनामों को सुन-सुन कर कलपते होंगे। स्टालिन के कारनामे सुनकर तो वे अपनी मुटि्ठयां ही भींचते होंगे। 

ऋषितुल्य मार्क्स ने दुनिया से दुःख-तकलीफ़, ग़ुरबत और गै़रबराबरी के तुख़्म को नष्ट कर देने की ठानी थी और वे वसुधैव कुटुंबकम जैसे एक अन्तरराष्ट्रीयवाद के यथार्थवादी स्वप्नद्रष्टा थे। वे दुनिया भर के परिश्रमी और पसीना बहाने वाले नेकनीयत लोगों और चालाक भूसम्पत्तिवानों की लूट से पीड़ितों को एक कर उन्हें मुक्ति का मंत्र बांट रहे थे। उन्होंने कहीं नहीं कहा कि पार्टी बनाओ; लेकिन वह लेनिन ही साहसी पुरुष था, जिसने साम्यवाद के महामंत्र को राष्ट्रवाद के ताबीज़ में बांधकर एक पार्टी में बदल दिया और दुनिया भर के कम्युनिस्टों की भुजाओं पर इसे गंडे की तरह बांध दिया! लेनिन का साम्यवाद एक संकीर्ण राष्ट्रवाद पर आधारित साम्यवाद था। वह महामना मार्क्स के साम्यकामी दर्शन पर नहीं टिका था। 

यह ठीक वैसा ही था, जैसे भारतीय ऋषिमुनियों ने वसुधैव कुटुंबकम का स्वप्न देखा और उसे विकसित किया; लेकिन कालांतर में जो धर्म के ठेकेदार बने, उन्होंने इसे बहुत संकीर्ण बना दिया। इसमें वर्णवाद पैदा किए। इसमें ब्राह्मण और शूद्र बना दिए। और जब ये पश्चिम से प्रभावित हुए तो उन्होंने इसे एक संकीर्ण, धर्मान्ध और दकियानूसी राष्ट्रवाद के साथ जोड़ दिया। क्या यह ख़ूबी भी आपको लेनिन के साथ कुछ विचित्र साम्यता से नहीं जोड़ती है?

आपमें और उनमें एक और ग़ज़ब की समानता है। वे फिज़िकल फिटनेस पर आपकी ही तरह बहुत ध्यान देते थे। हालांकि उनका ध्यान फिटनेस पर ज़्यादा था, आपकी तरह लाठी पर कम। लेनिन में और आपमें एक और समानता और है, वह यह कि उसे भी कुछ खास तरह के साहित्य और कलाएं नापसंद थीं; हालांकि आपके यहां कला-साहित्य जैसा खाना ही खाली है। आप तो पॉलिटिकल बीट देखने वाले पत्रकार को अंतरराष्ट्रीय कला केंद्र सौंप देते हैं और एक तबला बजाने वाले को ललित कला की अकादमी। हालांकि यह तथ्य ऐसा है, जिसे पढ़कर  मेरे लाल और भगवा दोनों तरह के दोस्त मुझ पर टूट पड़ेंगे। 

यह भी एक अनूठा संयोग है कि लेनिन को रूस से ज़्यादा जर्मनी मुग्ध करता था और आपके हृदय में विराजित देव प्रतिमा भी उसी महान् देश से आती है! सोविएत समाज में लेनिन की स्थिति भी आप जैसी ही है। लेनिन को उस देश में वैसे ही लोग अंधभक्तों की तरह पूजते हैं, जैसे आपको। और उस देश की एक बड़ी आबादी में लेनिन के विचारों और उससे जुड़े व्यक्तित्वों के प्रति वैसा ही गहन घृणा का भाव है, जैसा कि आपके प्रति। लोग या तो उसकी तारीफ़ों के पुल बांधते हैं या फिर उसकी निंदा में जुटे रहते हैं। वह श्रमिकों की डिक्टेटरशिप चाहता था और आप हिन्दुत्ववाद की। 

एक और बात उन कूढ़मग़ज सो कॉल्ड लेफ्टिस्टों के लिए, जो आपके खेमे के प्रतिभाहीन लोगों की ही तरह न तो पढ़ते हैं और न ही किसी बड़े विचारक से सीखने के लिए घरों से बाहर निकलते हैं और जो कैप्स्यूल खिला दिया, उसी के असर में आंय-बांय करते हैं। भाषा का संयम भूल जाते हैं और प्रश्न करने लायक भी बुद्धि का इस्तेमाल नहीं करते। 

मार्क्स बिना किसी सरकार और बिना किसी पैसे के भी इस पूरी दुनिया के दिलों पर पूरे सौ साल तक पूरे वैभव के साथ शासन कर चुका है। और शायद जब तक दुनिया में राजनीतिक सिद्धांतों का दर्शन और इतिहास पढ़ाया जाएगा, उन्हें कपिल, कणाद, जैमिनी जैसे दार्शनिकों की तरह याद किया जाता रहेगा। लेकिन लेनिन रूसी सत्ता के सहारे पूरी दुनिया में स्थापित हुए। मार्क्स और लेनिन में दिन-रात का अंतर है। उन्होंने मार्क्सवाद को लेनिनवाद की एक नई थियरी के माध्यम से विचलित करने की कोशिश की। 

कभी अपनी पार्टी के धुरंधर रहे लेनिन ने स्टालिन को जॉर्जियन एफेयर्स पर उसी तरह बचाया था, जैसे आडवाणी जी ने मोदी को गुजरात मामले में। लेकिन जब समय बदला और लेनिन कमज़ोर हुए तो सत्ता हाथ में आते ही स्टालिन ने लेनिन के बुढ़ापे, अतीत और काबिलियत की परवाह किए बिना उन्हें मार्गदर्शक जैसा बनाकर छोड़ दिया। यह अलग बात है कि उस हालत में भी स्टालिन के बजाय एचजी वेल्स, बर्ट्रेंड रसेल, एम्मा गोल्डमैन, अलेक्जेंडर बर्कमैन जैसी हस्तियां मिलने आती थीं, जो कि कदाचित बहुतेरे लोगों के भाग्य की बात नहीं होती। बस एक मामलू सा फर्क यह है कि आपको युद्ध बहुत प्रिय हैं और लेनिन ने पहला विश्व युद्ध टालने के लिए पूरी दुनिया को सिर पर उठा लिया था। अलबत्ता,  आखिरी समय में लेनिन की कई साल तक वैसी ही हालत रही, जैसी कि आजकल वाजपेयी जी की है। लेनिन गए तो बर्तोल्त ब्रेख्त ने कहा था : मानो वृक्ष ने अपने पत्तों से कहा, मैं तो चला और यहां हालत यह है कि पत्ते वृक्ष से कह रहे हों कि आप तो चलो। सिर्फ़ हमें ही रहने दो!!!

कैसा अद्भुत साम्य है प्रभु आपमें और लेनिन में! और आपने लेनिन की प्रतिमा तोड़ दी!






यह लेख त्रिभुवन जी की फेसबुक वॉल से साभार है।

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