नारी सशक्तीकरण की ओर तेजी से बढ़ते कदम कहीं न कहीं समाज को महिला विरोधी बना रहे है।




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मैं अच्छे से जानती हूँ समाज में औरतों के बारें में क्या राय दी जाती है और अधिकतम लोग उनके बारें में क्या सोचते है। इस महिला दिवस इस बारे में थोड़ी सी चर्चा करते है। नारी सशक्तीकरण की ओर तेजी से बढ़ते कदम कहीं न कहीं समाज को महिला विरोधी बना रहे है। आगे बढ़ती महिलायें किसी के गुरुर को चोटिल कर रही है। ये चोट ही महिला विरोधी मानसिकता को जन्म दे रही है।

बलात्कार और दहेज़ प्रताड़ना जैसे अपराध अब झूठे लगने लगे है।कहीं न कहीं इन सबके पीछे महिला समाज ही जिम्मेदार है। कुछ महिलाओं और युवतियों के द्वारा लगाये गए झूठे आरोपों तथा अपनी ही गलती को बलात्कार का नाम देकर एक ऐसी मानसिकता को जन्म दे दिया है जो समूचे महिला समाज पर ऊँगली उठा रही है। वो मानसिकता ही अब बलात्कार जैसे घिनोने अपराध पर खिल्लियाँ उड़ाने को मजबूर कर रही है। लेकिन कुछ महिलाओं की गलती समूचे महिला समूदाय पर प्रश्न चिन्ह क्यों लगा रही है? इस सन्दर्भ में थोड़ी सरलता और सहजता की आवश्यकता है। 

आखिर इतनी फुरसत क्यों है कि महिलाओं के कपड़ों और चाल ढाल पर ध्यान देकर इतना समय बर्बाद किया जाए। यदि अपना अंग प्रदर्शन करना उन्हें पसंद है तो करने दीजिये न।ये दलील क्यों दी जाती है कि उनके अंगप्रदर्शन से पुरुष आकर्षित होते है और बलात्कार होता है। क्या अंगप्रदर्शन करने से वो स्त्री आपके पुरखों की जायदात बन जाती है जो आप उसके शरीर पर अपना अधिकार समझ बैठते है। एक और दलील जो कहती है कि प्रकृति का नियम है अपने से विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण होना। तो मैं उन लोगो से पूछती हूँ कि क्या प्रकृति का नियम एक छोटे बच्चे (बॉय चाइल्ड) का यौन शोषण करने की इज़ाज़त देता   है ? क्या वो नियम 8 माह की बच्ची का बलात्कार करने की इज़ाज़त देता है? जिन दलीलों के द्वारा सभी स्त्रियों को समाज की नजरों में गिराने का प्रयास किया जाता है उन दलीलों में ही जबाब छुपा हुआ है। 

कुछ महिलाओं के शराब पीने से सभी महिलाएं शराबी नही हो जाती।महिलाओं का शराब पीना बहुत गलत है जबकि उनका काम तो अपने पति का गिलास भरने का होता है। क्या महिलायें अपने पति को शराब के नशे में बेरहमी से मारती हैं। नहीं न। तो यह दलील ही क्यों? क्या स्त्री इस समाज में बस इन दलीलों तक ही सीमित है। नही।। वो तो अनन्त है।प्रत्येक इंसान को इस धरती पर लाने वाली एक स्त्री ही होती है। 9 माह की पीड़ा सहने वाली स्त्री ही होती है। अपना घर छोड़ कर अनजान घर में जाकर जीने वाली एक स्त्री ही होती है। उस स्त्री का महत्त्व इन बेतुकी दलीलों से कम नही हो जाता। एक स्त्री अपने पति, पिता और पुत्र तीनों से मार खा सकती है लेकिन उन्हें अपनी आखों के सामने मार खाते नही देख सकती। उसके जीवन के इन तीनो किरदारों की वह हर परिस्थिति में  इज़्ज़त करना जानती है उन्हें माफ़ करना जानती है। 


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उस स्त्रीं पर ये दलीलें काम नही आएँगी। होगी कुछ महिलाये इस समाज में कीचड मचाने वाली लेकिन प्रत्येक स्त्री को उस नजर से देखना गलत है। क्या दुनिया बनायीं है भगवान ने समाज में स्त्री का इतना महत्त्व है कि गालियां भी उसी के नाम से दी जाती है। जहाँ बात महिला विरोधी बनने की है वो केवल इस लिए क्योकि जमाना बदल गया है परिस्तिथियाँ बदल गयी है औरतों के प्रति रूढ़ियाँ विसंगतियां और कुटिलता समाप्त हो चली है। महिलायें आगे बढ़ने लगी है जो चन्द लोगों को स्वीकार नही जिनके अंदर की कुटलता अभी बाकी है। ये बदलती हुई सोच ज्यादातर भारतीय युवाओ में देखने को मिल रही है जो बलात्कार या महिला प्रताड़ना का नाम सुनकर तिलमिला उठते है और पुरुष के बेचारेपन की दुहाई देते है। 

लोगो की मानसिकता कुछ ऐसी हो गयी है की यदि कोई नारी पर हो रहे अत्याचार के बारें में तर्क दें तो महिला प्रधान कहला जाता है और यदि पुरुषों पर लगे झूठे केसों की बात करें तो महिला विरोधी बन जाता है। तात्पर्य यह निकलता है कि एक ओर कुआ है ओर दूसरी ओर खाई। यहाँ कोई सन्दर्भ एकतरफा नही है,और न ही भारत देश एकतरफा विचारधारा वाला है। भारत को न तो पुरुष प्रधान कहा जाय और न ही महिला प्रधान कहा जाय। हमारा ये भारत संस्कृति प्रधान माना जाए। वह भारत जो संस्कारों की जननी है वहां न कोई नारी प्रताड़ित हो और न ही कोई पुरुष।

भारत में प्रत्येक महिला और पुरुष एक दुसरे के कंधे से कन्धा मिला कर चले।महिला और पुरुष एक गाड़ी के दो पहियों के सामान होते है जिनकी आपस में तुलना नही होनी चाहिए क्योंकि ये दोनों एक दुसरे के पूरक होते है।यहाँ आकर चर्चा समाप्त होती है अब आप तथ्य मांगों या तर्क मांगों वो अलग बात है क्योंकि कुछ लोगो की सोच ऐसी है कि बेटी यदि खुद की हो तो ही गर्व होता है बाकि दुसरे की बेटी पर अकसर उँगलियां ही उठाई जाती है।


अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की शुभकामनाएं।।




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