चला गया रंगरेज।


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साल 2014 का जुलाई महीना, झीलों के शहर भोपाल में मेरा दूसरा दिन और बारिश की शुरुआत हो रही थी। एक सीनियर के साथ बारिश में भीगते हुए रवींद्र भवन गया सूफी गायक वडाली ब्रदर्स को सुनने। लेकिन जब उन्होंने गाना शुरू किया तो ना ही भेजने का ख्याल रहा न ही इस बात का कि एक ने शहर में मेरा दूसरा दिन है। 

तू माने या ना....  रंगरेज मेरे ....... एक के बाद एक फरमाइशें होती रहीं और उनके साथ सारे श्रोता भी गाते रहे, ऐसा माहौल बन गया था की बयां करना मुश्किल है। जब पूरन सिंह वडाली अपनी मूछों के नीचे से मुस्काते हुए गाते तो सब झूमने लगते। 

संगीत हमें एक नई दुनिया में ले जाता है और हमारे मन के सबसे कोमल क्षेत्र को छूता है और हम धीरे धीरे उसमें डूबते जाते हैं। और जब गाने वाला ऐसा हो की गाते वक्त वो ऐसे रमे जैसे किसी के इश्क़ में डूबा है तो संगीत का मज़ा दोगुना हो जाता है। 

रंगरेज मेरे और तू माने या ना माने। ..... उनके गाए ये गाने ना जाने कितनी बार सुना हूँ लेकिन हर बार नया लगता है और जब जब सुनता हूँ कहीं खो सा जाता हूँ। आज उनमें से एक ने साथ छोड़ दिया, अब मंच पर एकसाथ जो दो कातिल मुस्कान दिखती थी उसमें से एक जुदा हो गई। हमारे बीच से सूफी गायकी की दुनिया से मोहब्बत करने वाला एक साथी किसी और दुनिया का रहवासी बन गया आज, जिसकी आवाज़ के कायल लाखों लोग हैं। 

उनके जाने का दुःख तो बहुत है साथ ही एक तसल्ली भी है मैनें उनको अपने सामने बैठे हुए सुना है और उनकी आवाज़ के जादू को महसूस किया है जिसकी महसूसियत और ज़ेहन में अब भी मौजूद है।  


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